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भारत हासिल नहीं कर सकता राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 का लक्ष्य: पूर्व स्वास्थ्य सचिव

स्वागता यदवार,

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दो दशक तक सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर चुकी पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव के. सुजाता राव कहती हैं कि वह स्वास्थ्य बजट में वृद्धि, तकनीक का बेहतर उपयोग, स्वास्थ्य देखभाल के लिए बेहतर नेतृत्व और सुशासन के पक्ष में हैं।

 

स्वास्थ्य कभी राष्ट्री की प्राथमिकता नही रही है और यही कारण है कि हमारे देश में बच्चे के जन्म के दौरान माताओं की सबसे अधिक मृत्यु और पांच वर्ष से कम आयु के भीतर बच्चों की मृत्यु दर सबसे अधिक है। ऐसी टिप्पणी पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव के. सुजाता राव ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘डू वी केअर? इंडियाज हेल्थ सिस्टम ’में की है।

 

दो दशक तक राज्य और केंद्रीय दोनों स्तरों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाली के. सुजाता राव स्वास्थ्य बजट में वृद्धि, तकनीक का बेहतर उपयोग और बेहतर स्वास्थ्य देखभाल के लिए नेतृत्व और सुशासन प्रदान करने के पक्ष में हैं।

 

इंडियास्पेंड के साथ एक ईमेल साक्षात्कार में राव ने कहा कि स्वास्थ्य के लिए कम फंड के साथ भारत राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाएगा।

 

भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी ) का 1.16 फीसदी है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) जीडीपी का 5 फीसदी खर्च करने की सिफारिश करता है। नई नीति में 2025 तक चरणबद्ध तरीके से कुल जीडीपी का 2.5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च करने का लक्ष्य हासिल करने की बात है। लेकिन हम वर्ष 2010 के जीडीपी के 2 फीसदी खर्च करने लक्ष्य को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। आखिर भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य कोष कम क्यों रहता है?

 

भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च तीन कारणों से कम है। पहला है राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और राजनीतिक दर्शन की अनुपस्थिति, जो किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य, कल्याण और शिक्षा को विकास प्रक्रिया के केंद्र के रूप में रखती है। हमारी मानसिकता अभी भी फ्लाई ओवर और स्पीड ट्रेनों से साथ ही जुड़ी हुई है।

 

दूसरा है विकेंद्रीकरण की दिशा में सुधार नहीं । और धन को तेजी से जबाबदेही के साथ खर्च करने की आदत नहीं।  तीसरा है मैक्रो-स्तर पर हम पर्याप्त करों का संग्रह नहीं कर रहे हैं और प्रतिस्पर्धा की मांग और देनदारियों के कारण स्वास्थ्य के लिए संसाधनों को बढ़ाने के लिए हमारे पास जगह सीमित है।

 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 में वर्णित स्वास्थ्य लक्ष्यों में से ज्यादातर वर्ष 2002 के समान हैं, जिन्हें 2010 में पूरा किया जाना था, जैसा कि Factchecker  ने 16 मार्च 2017 को बताया है। अधिकांश लक्ष्यों को नई समयसीमा के साथ पुनर्प्रेषित किया गया है। ऐसा करने के पीछे कारण क्या है? कहां गलती हो गई और हम यह कैसे सुनिश्चित कर पाएंगे कि हम 2017 के लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे?

 

हम इन लक्ष्यों को भी पूरा नहीं कर सकेंगे। प्रस्तावित धन के स्तर पर ऐसा संभव नहीं हैं। ऐसे महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को निर्धारित करने से पहले हम अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाते हैं

 

मैं रणनीति में कोई बदलाव नहीं देख पा रही हूं जो समय-सीमा के भीतर लक्ष्य हासिल करने की प्रक्रिया को गति प्रदान कर सकता है। कई मांगें पूरी करने के लिए हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत कमजोर है।

 

जैसा कि 2016 में ब्रुकिंग्स इंडिया की रिपोर्ट में पता चला है कि देश की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के 75 फीसदी तक निजी परामर्श प्रणाली की पहुंच है। तो इसे विनियमित करना कितना महत्वपूर्ण है?

 

1980 के दशक के बाद आर्थिक संकट के क्रमिक उदय के साथ वाणिज्यिक निजी क्षेत्र को प्रवेश की अनुमति के अलावा भारत के पास कोई विकल्प नहीं था।

 

1993 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ऋण के बाद संरचनात्मक समायोजन ने गंभीर बजट में कटौती के कारण प्रक्रिया को गति दी।

 

अन्य क्षेत्रों के विपरीत स्वास्थ्य बाजार विफलताओं से भरा है। यह विशेषताएं बाजारों की क्षमता पर राज्य हस्तक्षेप को समान रूप से अनिवार्य बनाने के लिए सीमाएं डालती हैं। विनियमन मरीजों के हितों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं और सुनिश्चित करते हैं कि प्रदाता द्वारा या अस्पताल प्रबंधन द्वारा रोगी का किसी तरह से शोषण तो नहीं किया जा रहा है?

 

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राव की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘ डू वी केयर? इंडियाज हेल्थ सिस्टम’ का कवर पेज

 

12 वीं योजना (2015-17) में स्वास्थ्य बजट में कटौती की बात करते हुए, आपने कहा है: “… स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च और सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) को खिसकाना एक खतरनाक कॉकटेल है।” फिर भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति -2017, ‘सार्वजनिक सेवाओं में विशिष्ट अंतर को ठीक’ करने के लिए निजी क्षेत्र से भागीदारी के बारे में कहता है। क्या भारत पीपीपी से सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा?

 

पीपीपी तब काम करते हैं जब जोखिम साझा किए जाते हैं। यह विफल तब होता है जब यह एक तरफा होता है जैसे लाभ किसी एक पार्टनर द्वारा उठाए जाएं और जोखिम किसी दूसरे को द्वारा झेला जाए। स्वास्थ्य क्षेत्र में पीपीपी का दूसरा मामला अधिक लगता है।

 

स्वास्थ्य सेवाओं की खरीद एक अनुबंध पर आधारित है, जो एक कानूनी दस्तावेज है। इसलिए, जब आपने बजट और संविदात्मक दायित्वों को प्रतिबंधित कर दिया है तो खर्च की प्राथमिकताएं कानूनी प्रतिबद्धताओं से प्रभावित होती हैं। जो लोगों के तत्काल हित में नहीं आते।

 

यहां पायवेट सेक्टर और पब्लिक सेक्टर के बीच के अंतर को भी हमें समझना होगा। यह अंतर नुकसान की वजह भी है। पायवेट सेक्टर प्रमुख प्रदाता है। इसलिए अगर स्वास्थ्य के मैदान में एक स्तर पर पीपीपी चाहिए तो सार्वजनिक क्षेत्र को भी मजबूत करना होगा।

 

आपने सार्वजनिक चेतना की कमी की बात कही है। साथ ही माना है कि नीति निर्माताओं में स्वास्थ्य सेवा को लेकर उत्तरदायित्व की भावना में कमी है। इसके क्या कारण हैं और हम इसे कैसे ठीक कर सकते हैं?

 

सार्वजिनक समझ की कमी के पीछे शायद एक अलग किस्म की धारणा भी है कि बीमारी हमारी गलती है। इसके अलावा हम अब भी बुनियादी ढांचे के लिए संघर्ष कर रहे हैं। स्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता नहीं है। हमारे लिए जीवन का मतलब है-पानी, भोजन और कुछ आमदनी।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 15 अप्रैल 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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