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मध्यप्रदेश में पिछले चार वर्षों में पठन-पाठन का स्तर 80फीसदी से गिरकर हुआ 32 फीसदी

खुशबू बलानी,

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मध्यप्रदेश के छात्र पढ़ने और गणितीय कौशल में भारत के दूसरे राज्यों के छात्रों से सबसे पीछे हैं। यहां प्राथमिक कक्षाओं से उच्च कक्षाओं में जाने का दर राष्ट्रीय औसत से कम है। राज्य के स्कूलों में एक कमरे को अलग-अलग कक्षाओं के छात्र साझा करते हैं।

 

साथ ही सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 17.6 फीसदी शिक्षकों की कमी है। यह जानकारी कई तरह के सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है।

 

जैसा कि इस लेख श्रृंखला के पहले भाग में हमने बताया है कि, वर्ष 2020 तक भारत की कामकाजी युवा आबादी विश्व भर में सबसे ज्यादा होगी। करीब 86.9 करोड़। लेकिन कुछ बीमारु राज्यों (बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान) में साक्षरता, स्कूल में नामांकन, सीखने के परिणामों, और शिक्षा के खर्च के संकेतक पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि युवा आबादी को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए भारत तैयार नहीं है। हम बता दें कि चार राज्यों में 5 से 14 वर्ष की उम्र के बीच भारत में स्कूल जाने का प्रतिशत मात्र 43.6 फीसदी है।

 

भारत की पांचवी सबसे बड़ी आबादी, 7.26 करोड़ के साथ, वर्ष 2011 में मध्यप्रदेश की साक्षरता दर 70.6 फीसदी रही है। वर्ष 2001 की तुलना में इन आंकड़ों में 6.86 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार बीमारु राज्यों में यह दूसरी सबसे कम वृद्धि दर है।

 

मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सीखने का स्तर भारत में सबसे बद्तर है। वर्ष 2014 शिक्षा रिपोर्ट (एएसईआर) की वार्षिक स्थिति के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में सर्वेक्षण किए गए बच्चों में से कक्षा पांच के केवल 34 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा की किताबें ठीक से पढ़ सकते हैं। यह दूसरा सबसे कम आंकड़ा है। सबसे कम आंकड़े असम के हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा पांच के केवल 31 फीसदी छात्र हैं, जो गणित में घटाव कर सकते हैं। ये आंकड़े देश में सबसे कम हैं।

 

सरकारी स्कूलों में कक्षा तीन के ऐसे छात्रों के अनुपात में गिरावट हुई है, जो कम से कम शब्दों को पढ़ सकते हैं। वर्ष 2010 में ये आंकड़े 80 फीसदी थे, जो वर्ष 2014 में गिरकर 32 फीसदी हुए हैं। इस संबंध में गिरावट निजी स्कूलों में भी देखी गई है। वर्ष 2010 में ये आंकड़े 88 फीसदी थे, जो वर्ष 2014 में गिरकर 74 फीसदी हो गए।

 

मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में सीखने का स्तर, वर्ष 2010 से वर्ष 2014

Source: Annual Status of Education Report, 2014

 

एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (यू-डीआईएसई) फ्लैश सांख्यिकी 2015-16 के अनुसार, मध्य प्रदेश में प्राथमिक (कक्षा पांच) से उच्च प्राथमिक (कक्षा 6) में जाने वाले छात्रों का दर 88.67 फीसदी है। यह राष्ट्रीय औसत के 90 फीसदी के आंकड़ों से कम है।

 

उच्च प्राथमिक स्तर पर, सीखने का स्तर भी बदतर है। सातवीं कक्षा के केवल 18 फीसदी छात्र अंग्रेजी के वाक्य पढ़ने में सक्षम हैं। यह आंकड़ा देश में सबसे कम हैं। जो छात्र अंग्रेजी के वाक्य पढ़ सकते हैं, उनमें से केवल 43 फीसदी वाक्य का अर्थ बता पाने में सक्षम हैं। इस मामले में भी मध्यप्रदेश देश भर में सबसे पीछे है।

इससे एक बात साफ है कि छात्र उच्च प्राथमिक कक्षा में जाने के बावजूद अन्य राज्यों के छात्रों की तुलना में खराब प्रदर्शन कर रहे हैं।

 

मध्यप्रदेश में शिक्षकों में भारी कमी,शिक्षा के बुनियादी ढांचे की हालत बदतर

 

लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, देश भर के सरकारी स्कूलों में 60 लाख शिक्षण पदों में से 900,000 प्राथमिक विद्यालय और 100,000 माध्यमिक स्कूलों में शिक्षण पद (दोनों मिलाकर 10 लाख) रिक्त हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 में विस्तार से बताया है। मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों के सभी प्राथमिक शिक्षण पदों में से करीब 17.6 फीसदी (लगभग 64,000) रिक्त हैं।

 

एएसईआर-2014 की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण किए गए स्कूलों में से करीब 78 फीसदी स्कूलों में कक्षा दो के छात्र किसी और कक्षा के साथ पढ़ने का कमरा साझा कर रहे थे। हम बता दें कि वर्ष 2010 में ये आंकड़े 67 फीसदी थे।

 

इसी तरह ऐसे स्कूलों की भी संख्या बढ़ी है, जहां कक्षा 4 के छात्र अन्य कक्षा के छात्रों के साथ पढ़ने का कमरा साझा कर रहें हैं।वर्ष 2010 में ऐसे स्कूलों का अनुपात 57 फीसदी था, वहीं वर्ष 2014 में यह बढ़ कर 69 फीसदी हुआ है।

 

एएसईआर -2011 की रिपोर्ट कहती है कि अगर कई कक्षा के छात्र एक ही कमरे में, एक ही शिक्षक या कई शिक्षकों द्वारा पढ़ते हैं तो हर बच्चे तक पहुंचने के लिए अधिक प्रशिक्षण कौशल की जरूरत है। साथ ही अध्यापन के विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल भी जरूरी है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम एक साथ विभिन्न  कक्षाओं के लिए किसी भी नियम को निर्दिष्ट नहीं करता है और यह संभव है कि स्कूल विभिन्न कक्षाओं को एक साथ पढ़ाने के लिए कुछ ही शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान करता हो।

 

हालांकि कुछ शिक्षक ही सेवाकालीन प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। वर्ष 2013-14 में मध्यप्रदेश में अनुबंधित शिक्षकों सहित 7.13 फीसदी से अधिक शिक्षकों को सेवाकालीन प्रशिक्षण नहीं मिला है। यू-डीआईएसई आंकड़ों के अनुसार इस मामले में भारतीय औसत 18.34 फीसदी है।

 

उच्च प्राथमिक विद्यालय में नामांकन में गिरावट

 

प्राथमिक शिक्षा यानी कक्षा 1 से 8 के छात्रों पर वर्ष 2011-12 से 2014-15 के बीच प्रति छात्र सरकारी व्यय में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन यह वृद्धि मुख्य रुप से नामांकन में गिरावट के कारण हुई है, जैसा कि द इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली ने सितंबर 2016 में बताया है।

 

चार वर्षों में प्राथमिक स्तर पर नामांकन (कक्षा 1 से 5) में 18.97 की गिरावट हुई है। यू-डीआईएसई आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010-11 में यह आंकड़ा 107 लाख था, जो वर्ष 2014 में गिरकर 86.7 लाख हुआ है। इसका मुख्य कारण कुछ बच्चों का गलत उम्र में प्राथमिक स्कूल में नामांकन कराना है, जिससे राज्य में प्रति छात्र खर्च बढ़ गया है।

 

वर्ष 2010-2011 में, प्राथमिक विद्यालय सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) (प्राथमिक स्कूल उम्र के बच्चों के अनुपात में नामांकित छात्रों का अनुपात) 136.7 था। यू-डीआईएसई आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में प्राथमिक स्तर पर ये आंकड़े गिरकर 101.11 हुए हैं। यदि प्राथमिक स्कूल उम्र के बच्चे प्राथमिक स्कूल में दाखिला नहीं लेते हैं, तो जीईआर 100 से ज्यादा होता है।

 

उच्च प्राथमिक विद्यालय के लिए, सकल नामांकन 100 फीसदी से नीचे गिर गया है। इसका मतलब है कि उच्च प्राथमिक स्कूल उम्र के सभी छात्रों ने स्कूल में दाखिला नहीं लिया है। यू-डीआईएसई आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010-11 में उच्च प्राथमिक विद्यालय में नामांकन का सकल अनुपात 102.1 था, जो वर्ष 2014-2015 में गिरकर 96.6 हुआ है।

 

गरीबों के लिए आरक्षित 70 फीसदी सीटें हैं खाली

 

मध्यप्रदेश में शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कोटे की कम से कम 70 फीसदी सीटें भरी नहीं हैं, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स ने अक्टूबर 2016 की एक रिपोर्ट में बताया है। आरटीई अधिनियम (2009) के तहत सभी निजी, गैर सहायता प्राप्त प्राथमिक स्कूलों में एक चौथाई सीटें गरीब छात्रों की मुफ्त शिक्षा के लिए होनी चाहिए।

 

वर्ष 2016 में आरटीई कोटे पर केवल 170000 छात्रों का दाखिला कराया गया है, जबकि 420,000 से ज्यादा सीटें आरक्षित थीं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस कमी का कारण ऑनलाइन लॉटरी प्रणाली हो सकती है, जो माता-पिता के लिए उपयोग करना मुश्किल होता है।

 

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया है कि सीटें रिक्त रहीं, क्योंकि माता-पिता कुछ चुनिंदा स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला कराना चाहते हैं।

 

आरटीई के क्रियान्वयन की स्थिति के बारे में इस रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली और महाराष्ट्र में भी निजी स्कूलों में सीटों की एक ऐसी ही केंद्रीकृत ऑनलाइन आवंटन को अपनाया गया है। रिपोर्ट में  अन्य समाचार लेख और रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि, “हालांकि, ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया पारदर्शिता और कार्यकुशलता में सुधार करने के लिए एक अच्छा कदम प्रतीत होता है … लेकिन सभी माता पिता दाखिले के लिए ऑनलाइन आवेदन देने में सक्षम नहीं हैं, विशेष रुप से ऐसे लोग जो समाज के निचले तबके से आते हैं।”

 

मध्यप्रदेश ने भी अक्टूबर 2016 में ‘नो- डिटेन्शन पॉलिसी’ को रद्द कर दिया है, जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने अक्टूबर 2016 की एक रिपोर्ट में बताया है। स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री, दीपक जोशी के अनुसार, राज्य की सरकार शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के कारण सभी सरकारी और निजी स्कूलों में कक्षा 5 के बाद सभी छात्रों को उसी कक्षा में रहने की अनुमति देता है। इससे पहले केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबद्ध स्कूलों को छोड़कर सभी स्कूलों में छात्रों को कक्षा 8 तक ग्रेड दोहराना नहीं पड़ता था।

 

इंडिया स्पेंड की ओर से पांच भागों वाली श्रृंखला का यह चौथा लेख है। इस श्रृंखला में हम बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति पर चर्चा कर रहे हैं। पांचवे भाग में राजस्थान में शिक्षा की स्थिति पर नजर डालेंगे। पहले के लेख यहां  एक, दो और तीन पढ़ सकते हैं।

 

(बलानी स्वतंत्र लेखक हैं और मुंबई में रहती हैं। बलानी की दिलचस्पी विकास के विभिन्न मुद्दों में है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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