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मध्य प्रदेश में कुपोषण कम करने के छह उपाय

प्राची सालवे,

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महिला सशक्तिकरण, बेहतर स्वच्छता, और मातृ स्वास्थ्य में सुधार, मध्य प्रदेश में बच्चों की पोषण संबंधी स्थिति में सुधार ला सकता है, क्योंकि मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां पांच साल से कम उम्र के 42 फीसदी बच्चे स्टंड या अपने उम्र के लिए कम कद के हैं। यह आंकड़ा देश में पांचवां सबसे ज्यादा है। यह जानकारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) से 2015-2016 के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा विश्लेषण में सामने आई है।

 

पांच वर्ष कम आयु की 6.6 फीसदी बाल आबादी मध्य प्रदेश में रहती है, जो बच्चे भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का 158.7 मिलियन बनाते हैं।

 

पिछले एक दशक में, मध्य प्रदेश में स्टंटिंग दर में गिरावट हुई है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में यह आंकड़े 2005-06 में 50 फीसदी से गिर कर 2015-16 में 42 फीसदी हुई है। जबकि शिशु मृत्यु दर वर्ष 2005-06 में प्रति 1000 जन्मों पर 70 से 2015-16 में प्रति 1000 जन्मों पर 51 हुआ है। वहीं ऐसी महिलाओं का अनुपात, जिन्होंने दस वर्ष या इससे अधिक की शिक्षा प्राप्त की है 2005-06 में 14 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 23.2 फीसदी हुआ है। लेकिन राज्य अब भी देश में सबसे बद्तर राज्यों में से एक है, जैसा कि इसके स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा संकेतक दर्शाते हैं।

 

इसके अलावा, राज्य के 51 जिलों के आंकड़े मातृ, बाल स्वास्थ्य देखभाल और मध्य प्रदेश में महिला सशक्तिकरण के संकेतों में व्यापक बदलाव दिखाते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य को सुधारने के लिए समाधान स्थानीय वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।

 

उदाहरण के लिए,  शिवपुर (52.1 फीसदी) में स्टंटिंग की दर हैती के बराबर है, जो एक गरीब देश है, जो बार-बार प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है। उधर 32 फीसदी स्टंट बच्चों के साथ बालाघाट जिले का दर बोलीविया के समान है, जो कि दक्षिण अमेरिका में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।

 

जिला अनुसार, मध्यप्रदेश में महिला और बाल पोषण ( 2015-16 )

Source: National Family Health Survey 2015-16

 

बेहतर मातृत्व देखभाल कर सकता है बच्चे के पोषण में सुधार

 

राज्य में बाल स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए मध्यप्रदेश को स्तनपान और प्रसवपूर्व देखभाल की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। यह दोनों ही कारक बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जुड़े हुए है।

 

मध्यप्रदेश में, राज्य की 58.2 फीसदी की स्तनपान की दर से नीचे 21 जिलों में से 16 जिलों में वेस्टेड बच्चों का अनुपात राज्य के 9.2 फीसदी के औसत से ज्यादा था।

 

उदाहरण के लिए, भिंड जिले में सिर्फ एक तिहाई महिलाओं (33.3 फीसदी) ने 6 महीने की उम्र तक बच्चों को स्तनपान कराया था, जो राज्य में तीसरा सबसे कम है। भिंड जिले में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की चौथी सबसे अधिक संख्या (30.6 फीसदी) थी, जो गंभीर रूप से वेस्टेड थे।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित छह महीने के लिए विशेष स्तनपान, बच्चों में स्टंटिंग और वेस्टेड स्तरों में कमी के साथ जुड़ा हुआ है, जैसा कि 2013 के इस अध्ययन से पता चलता है।

 

उदाहरण के तौर पर, मध्यप्रदेश में बालाघाट जिले में बच्चों के उच्च अनुपात (67.6 फीसदी) को स्तनपान करवाया गया और वहां राज्य में स्टंटिंग की दर (32.1 फीसदी) सबसे कम थी।

 

मध्य प्रदेश में जिले के आंकड़ों के साथ-साथ शोध के साक्ष्य, मातृ देखभाल और बेहतर बाल मृत्यु दर और बाल पोषण के बीच एक रिश्ता बनाते हैं, जैसा कि जनवरी 2016 में इंडियास्पेंड ने एक रिपोर्ट में बताया था। फरवरी, 2017 से इंडियास्पेंड के इस लेख के अनुसार जन्म के समय की देखभाल से मृत जन्म का जोखिम भी कम होता है।

 

संस्थागत जन्म बच्चों और मां के लिए जन्म के पूर्व और नवजात शिशु की देखभाल सुनिश्चित करते हैं, जैसा कि जुलाई 2015 की रिपोर्ट में इंडियास्पेंड ने बताया है।

 

राज्य के औसत से कम संस्थागत जन्मों की दर वाले 21 जिलों में से 16 जिलों में स्टंटिंग दर राज्य के औसत से अधिक है। इसी तरह, कम संस्थागत जन्म की सूचना देने वाले 21 जिलों में से 9 जिलों में गंभीर रुप से वेस्टेड बच्चों ( कद के लिए कम वजन ) का प्रतिशत राज्य औसत से ज्यादा है।

 

उदाहरण के लिए, संस्थागत जन्मों की सबसे कम (सभी जन्मों का 43.5 फीसदी) दरों में से एक, सिंगरौली में ऐसे बच्चों का अनुपात दूसरा सबसे ज्यादा था, जो गंभीर रुप से वेस्टेड थे। स्टंटिंग की दूसरी सबसे अधिक दर ( 52 फीसदी ) के साथ बारवानी जिले में चिकित्सा संस्थानों में सभी जन्मों के 50.7 फीसदी के साथ राज्य में सबसे कम संस्थागत जन्म दर भी था।

 

दूसरी ओर, 94.7 फीसदी अस्पतालों में जन्म देने वाली महिलाओं की उच्चतम प्रतिशत के साथ, , इंदौर में वेस्टेड बच्चों का दूसरा सबसे कम अनुपात (16.9 फीसदी) था, जैसा कि 2015-16 के आंकड़ों से पता चलता है।

 

वाशिंगटन-डीसी स्थित कृषि और पोषण से संबंधित मुद्दों पर काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) में वरिष्ठ अनुसंधान साथी पूर्णिमा मेनन कहती हैं, “केवल संस्थागत जन्म पर्याप्त नहीं हैं। सरकार को गर्भवती माताओं को प्रदान की जाने वाली देखभाल की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए; राज्य ने सुनिश्चित किया है कि प्रसव पंजीकृत हो, लेकिन सेवा की गुणवत्ता खराब रहती है।”

 

माताओं के माइक्रोन्यूट्रेंट सेवन में सुधार करके, मध्यप्रदेश मां और बच्चे की स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है। उदाहरण के लिए, गर्भावस्था के दौरान लोहे और फोलिक एसिड की खुराक, मां और विकासशील भ्रूण की पोषण आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करती है। इस बारे जनवरी, 2016 में इंडियास्पेंड में प्रकाशित एक लेख में बताया गया है।

 

संयुक्त राष्ट्र बाल निधि द्वारा वर्ष 2016 के इस अध्ययन के अनुसार माताओं द्वारा लोहे और फोलिक एसिड (आईएफए) गोलियों का सेवन और स्टंटिंग का जोखिम कम होने के बीच सकारात्मक संबंध भी मौजूद है। मध्यप्रदेश में, 23.6 फीसदी की राज्य औसत की तुलना में आईएएफए उपभोग करने वाली गर्भवती महिलाओं के कम प्रतिशत वाले 32 जिलों में से 13 जिलों में राज्य औसत की तुलना में उच्च स्टंटिंग दरें थी।

 

ऐसे जिले, जहां अधिक माताओं ने गर्भावस्था के दौरान आईएफए गोलियां लीं, वहां कुछ ही बच्चे स्टंड हैं

Source: National Family Health Survey 2015-16

 

यदि महिलाएं अधिक शिक्षित हैं तो बच्चे रहते हैं स्वस्थ

 

हमने कुछ अप्रत्यक्ष कारकों का विश्लेषण किया है, जैसे कि स्कूली शिक्षा के वर्ष, शादी का समय उम्र, और स्वच्छता तक पहुंच, जो सीधे पोषण को प्रभावित नहीं करते हैं, लेकिन पोषण के पूर्वनिर्धारित या निर्धारक हैं। ये चिकित्सा पद्धतियों की सीमाओं के बाहर स्थित हैं, और पड़ोस में और परिवार के भीतर, समाज के भीतर पाए जाते हैं।

 

बेहतर स्वास्थ्य संकेतकों के लिए, “राज्य को लड़कियों की कम उम्र में विवाह पर रोक, महिलाओं की शिक्षा में सुधार और स्वच्छता के कवरेज में सुधार पर ध्यान देने की जरूरत है,” जैसा कि आईएफपीआरआई के मेनन कहते हैं।

 

एक औरत की शिक्षा के स्तर का बाल स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अधिक शिक्षित महिलाओं के साथ वाले राज्य बच्चों के लिए बेहतर स्वास्थ्य परिणाम दिखाते हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने मार्च 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

मध्यप्रदेश में भी यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। शिवपुर जिला, जहां स्टंटिंग बच्चों की दर ( 52.1 फीसदी ) राज्य में सबसे ज्यादा है और महिलाओं की सबसे कम प्रतिशत (18.7 फीसदी)  जिन्होंने चार दौरे जन्म पूर्व किए हैं और ऐसी महिलाओं का अनुपात भी सबसे कम (11.8 फीसदी)  है जिन्होंने दस वर्ष की स्कूली शिक्षा प्राप्त की है, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है।

 

कम उम्र में होने वाले विवाह पर रोक किशोर गर्भधारण में कमी के साथ जुड़ा हुआ है, जो पोषण संबंधी स्थिति को बेहतर बनाने और महिलाओं के बीच और स्वास्थ्य सेवा का उपयोग करने में मदद करता है, जैसा कि 2015 के अध्ययन से पता चलता है।

 

उदाहरण के लिए, टिकमगढ़ का जिला, जहां महिलाओं की आधी आबादी ( 49.5 फीसदी ) 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह करती हैं ( राज्य में सबसे ज्यादा ) वहां बच्चों में स्टंटिंग की चौथी उच्चतम दर (49.7 फीसदी) थी, आईएफए गोलियों की सबसे कम खपत (14 फीसदी)  और उन महिलाओं का निम्नतम अनुपात ( 18.9 फीसदी ) है जिन्होंने प्रसवपूर्व कम से कम चार दौरे किए हैं।

 

जिले जहां अधिक महिलाओं ने देर से शादी की, वहां स्टंट बच्चों की संख्या कम

Source: National Family Health Survey 2015-16

 

अप्रैल 2017 और सितंबर 2016 में इंडियास्पेंड में प्रकाशित लेखों के मुताबिक स्वच्छता का अभाव, बच्चों में स्टंटिंग और एनीमिया का कारण बन सकता है।

 

उदाहरण के लिए, राज्य में बेहतर स्वच्छता के साथ परिवारों की सबसे अधिक प्रतिशत (74.2 फीसदी)  वाले शहर, इंदौर में वेस्टेड बच्चों की दूसरी सबसे कम दर (17.8 फीसदी) थी।

 

(सालवे विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 16 दिसंबर 2017 में indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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