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महाराष्ट्र का औद्योगिक कचरा नदियों में परोस रहा है जहर

रैना पॉल और प्रभुप्रीत सिंह सूद,

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कोलक नदी के तट पर एक युवक। मुंबई से करीब 190 किमी उत्तर में कोलक गांव के पास एक शराब फैक्ट्री से निकले अवशिष्टों की वजह से नदी दूषित हो गई है। महाराष्ट्र अपने 75,000- औद्योगिक इकाइयों को प्रदूषण मानदंडों के अनुरूप बनाने में असमर्थ रहा है। भारी संख्या में औद्योगिक कचरा नदियों में गिराया जा रहा है।

 

बेंगलुरु: वह शायद कोई और जमाना था। महाराष्ट्र के रत्नागिरि के तटीय जिले के ढाबोल खादी गांव के मछुआरे हनीफ एस पारकर अपने स्थानीय नदी वशिष्ठी से 25 तरह की मछलियां पकड़ सकते थे। लेकिन शायद अब नदी बदल गई है। वक्त बदल गया है।

 

पास के औद्योगिक बेल्ट लोटे परशुराम के कारखानों से भारी मात्रा में औद्योगिक कचरा नदी में गिर रहा है। इससे नदी की मछलियां मर रही हैं। दूसरे जीव- जन्तु भी प्रभावित हो रहे हैं।

 

नदी अब पारकर और गांव के उन जैसे अन्य लोगों के लिए आजीविका का विकल्प नहीं।

 

पारकर कहते हैं, “अब मैं रोज़ मजदूरी का काम करता हूं। मेरी पत्नी दर्जी का काम करती है। जब मैं मछली पकड़ता था तब मेरा जीवन काफी आरामदायक था। अब मैं जीने के लिए संघर्ष कर रहा हूं। ”

 

पिछले 15 सालों से, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) और महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) के अधिकारियों के साथ मिलकर पारकर क्षेत्र में प्रदूषण के खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

 

जहरीले कचरे से राज्य की नदियां दूषित हो रही हैं और मछली पकड़ने वाले समुदायों की शिकायत है कि उनके रोजाना की पकड़ केवल 10 फीसदी रह गई है।

 

भारत की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला राज्य है महाराष्ट्र। लेकिन यहां प्रदूषित नदियों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है।

 

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 161 की संख्या के साथ प्रदूषित शहरों और कस्बों की संख्या भी सबसे अधिक है।

 

सीपीसीबी के अनुसार, 156 स्थानों में जहां सीपीसीबी ने राज्य में 49 नदियों और सहायक नदियों पर अपनी निगरानी इकाइयां स्थापित की हैं, 153 जगह पानी की गुणवत्ता मानदंडों को पूरा नहीं करती है।

 

एमपीसीबी ने वर्ष 2011 से वर्ष 2017 के बीच गंदे कारखानों के लिए 5,300 से अधिक कारण- बताओ नोटिस जारी किए हैं।

 

एमपीसीबी के पास बेलगाम इकाइयों को अनुशासित करने के लिए सीमित शक्तियां हैं और इसलिए राज्य अपने औद्योगिक क्षेत्रों के साथ नदी के प्रदूषण को नियंत्रित करने में असमर्थ रहा है। बोर्ड नोटिस जारी कर सकता है या छोटा जुर्माना लगा सकता है। लेकिन इन उपायों से नदियों से कचरा नदी में जाने से रोकना संभव नहीं है।

 

इस मामले में इंडियास्पेंड द्वारा किए गए जांच में पता चला कि एमपीसीबी प्रदूषण फैलानेवाली फैक्ट्रियों के लिए कई-कई बार नोटिस जारी कर रहा है लेकिन उसे अनदेखा कर दिया जाता है।

 

इस मामले में एमपीएबीबी के सदस्य सचिव को इंडियास्पेंड ने कुछ प्रश्न भेजे हैं। भी तक उधर से कोई जवाब नहीं आया है। अगर हमें कोई प्रतिक्रिया मिलती है तो इस रिपोर्ट में उसे जोड़ा जाएगा।

 

पुणे-चिंचवाड़ क्षेत्र में सबसे ज्यादा कानून तोड़ने वाले

 

महाराष्ट्र राज्य में 75,000 से अधिक विनिर्माण इकाइयां हैं, जिनमें ऑटोमोबाइल, टायर, वस्त्र, रसायन और इस्पात उद्योग शामिल हैं। उनमें से कई पुणे-चिंचवाड़ क्षेत्र में हैं।

 

वर्ष 2011 से वर्ष 2016 के बीच  प्रदूषण फैलाने वाले कारखानों को जारी किए गए 45 फीसदी नोटिस ( 5276 में 2,292) पूणे में भेजे गए हैं। यह संख्या, दूसरे स्थान पर रहे कोल्हापुर (673) से तीन गुना ज्यादा है।

 

क्षेत्र अनुसार उद्यगों को जारी किए गए नोटिस

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Source: Maharashtra Pollution Control Board; Data for the years 2011 to 2016

 

एमपीसीबी और द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट द्वारा वर्ष 2014 में आयोजित पानी की गुणवत्ता पर संयुक्त सर्वेक्षण के मुताबिक, पुणे में राज्य की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियां भी हैं।

 

कोल्हापुर की नवरसवाड़ी के रहने वाले 55 वर्षीय डीपी देसाई कहते हैं कि इस क्षेत्र में चीनी उद्योग सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाता है। वह कहते हैं कि, “चीनी उद्योगों की लापरवाही से रसायन वेदगंगा और उसकी सहायक नदियों में जाते हैं। हमें पीने के लिए दूषित पानी प्राप्त होता है और यहां तक ​​कि फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ”

 

वर्ष 2007 में, राज्य सरकार ने औद्योगिक विकास की सुविधा के लिए राज्य में बुनियादी ढांचा विकसित करने की एक योजना तैयार की थी। इस योजना में पुणे, नासिक, नागपुर, कोल्हापुर और औरंगाबाद शामिल हैं। नवी मुंबई के साथ इस क्षेत्र को एमपीसीबी द्वारा काफी संख्या में नोटिस जारी किए गए हैं और क्राम में देखें तो नोटिस पाने वालों में यह क्षेत्र टॉप छह क्षेत्रों में से एक है।

 

मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र, जिसमें मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे, रायगढ़ और कल्याण जैसे क्षेत्र शामिल हैं, वहां  भी 20 फीसदी फैक्टरियों को नोटिस भेजे गए हैं।

 

ज्यादातर गुनहगार फैक्टिरियां भारी प्रदूषण फैलाते हैं

 

एमपीसीबी एक प्रदूषण सूचकांक के आधार पर कारखानों को वर्गीकृत करता है, जो कि उनके संचालन से हवा और पानी को प्रदूषित करते हैं और खतरनाक कचरे उत्पन्न करते हैं। फिर उन्हें लाल, नारंगी और हरे रंग की श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। लाल का मतलब अत्यधिक प्रदूषिण से है।

 

वर्ष 2011 और वर्ष 2016 के बीच एमपीसीबी द्वारा जारी 5,276 नोटिस में, 65 फीसदी (3,445) लाल श्रेणी में कारखानों के पास गया। नारंगी में 1,599 और हरे रंग में 232 नोटिस जारी किए गए हैं।

 

दोषी कंपनियों की सूची पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि बड़े पैमाने की इकाइयां के लिए 47 फीसदी नोटिस लाल श्रेणी के साथ भेजी गई हैं। बाकी मध्यम और छोटे पैमाने के उद्योगों के लिए भेजा गया है।

 

प्रदूषण के लिए उद्योगों को जारी किए गए नोटिस

Source: Maharashtra Pollution Control Board; Data for the years 2011 to 2016

 

कोल्हापुर में दोषी फैक्ट्रियों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। यहां 64 फीसदी मध्यम और छोटे पैमाने की इकाइयों को लाल रंग वाले नोटिस भेजे गए हैं। सबसे ज्यादा नोटिस वाला तीसरा क्षेत्र  नवी मुबंई का इलाका है। यहां जिन 282 कारखानों को लाल श्रेणी में नोटिस भेजे गए हैं, उनमें से 80 फीसदी मध्यम और छोटे पैमाने के हैं।

 

एमपीसीबी के पूर्व सदस्य सचिव डीबी बोरलकर ने बात चीत के क्रम में इस पर प्रकाश डाला कि बड़ी संख्या में मध्यम और छोटी इकाइयां दोषियों की सूची में क्यों आईं? बड़े पैमाने की इकाइयों के पास अपने स्वयं के अनूठे उपचार संयंत्र (ईटीपी) हैं, लेकिन छोटे एक आम ईटीपी पर निर्भर हैं।अगर सामान्य ईटीपी काम करना बंद कर देता है तो उस पर निर्भर सारी कंपनियों को नोटिस भेजा जाता है।

 

एमपीसीबी द्वारा गड़बड़ कंपनियों को जारी निर्देशों की प्रतियां बताती हैं कि कई कारखानों ने अपना कचरा नदियों में फेंका है। कोल्हापुर में वारणा, सोनपत और पंचगंगा, नवी मुंबई में घोट, रायगढ़ में सावित्री, नाशिक में गोदावरी और सतारा में कृष्णा जैसी नदियों में कचरा विसर्जित किया गया।

 

औद्योगिक कचरे से नदियों के जल का ऑक्सीजन कम होता जाता है। ऑक्सीजन के स्तर में यह गिरावट नदी में मछली और अन्य जीवों को मारता है।

 

एक खराब प्रवाह वाले संयंत्र से पूरे क्षेत्र में प्रदूषण

 

राज्य में जल प्रदूषण के लिए कम निगरानी और अभियोजन का मतलब है कि आम प्रचलित उपचार संयंत्र (सीईटीपी) नियमित रूप से नदी के नजदीक अनुपयोगी प्रवाह का निर्वहन करने के लिए पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं।

 

कारखानों के प्रबंधन पानी के प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि वे ईटीपी के ईटीपी के निचले स्तर के कामकाज की अनुमति देते हैं। पुणे में पिंपरी चिंचवाड औद्योगिक क्लस्टर में भूजल प्रदूषण पर वर्ष 2014 की एक एमपीसीबी अध्ययन कुछ ऐसा ही बताती है।

 

जैसा कि बोरलकर ने बताया, मध्यम और छोटे पैमाने के उद्योग उनके रासायनिक कचरे के अनिवार्य उपचार के लिए आम प्लांट पर निर्भर करते हैं। लेकिन एक का भी काम नहीं करना सीईटीपी पर निर्भर सभी इकाइयों से प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगता है। वर्तमान में, महाराष्ट्र में 24 सीईटीपी हैं। पांच और आने के लिए तैयार हैं।

 

सीपीसीबी द्वारा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को मार्च 2016 में प्रस्तुत हलफनामे के अनुसार, डोंबिवली-अंबरनाथ बेल्ट में पांच सीईटीपी में से चार काम नहीं कर रहे थे। इससे तीन साल पहले 2013 में, पुणे में उपचारित प्रवाह में प्रदूषकों का स्तर सीईटीपी में खतरनाक रूप से उच्च पाया गया था।

 

24 संयंत्रों में से 11 पर्यावरण मानदंडों का पालन नहीं कर रहे हैं। एमपीसीबी की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध सीईटीपी की स्थिति की नवीनतम रिपोर्ट से यह पता चलता है। एक संयंत्र के लिए आंकड़े उपलब्ध नहीं थे।

 

गुनहगारों को ढेरों नोटिस लेकिन कोई फर्क नहीं

 

विशेषज्ञों का आरोप है कि एमपीसीबी ठीक से नियमों को कार्यान्वयन नहीं करते हैं। समय-समय पर, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों ने पर्यावरणीय मानदंडों को लागू करने में ढील के लिए बोर्ड को दोषी ठहराया है।

 

इंडियास्पेंड ने एमपीसीबी द्वारा भेजे गए 150 नोटिस नोटिस का विश्लेषण किया है। हमने पाया कि कई मामलों में, एक ही कंपनी को कई निर्देश जारी किए जाने थे, क्योंकि उन्होंने पहले की चेतावनी का जवाब नहीं दिया था। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नोटिस भेजने से कुछ प्रभाव नहीं पड़ेता।

 

मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस), में सहायक प्रोफेसर गीतांजय साहू, जो भारत में पर्यावरण कानूनों के अनुपालन और प्रवर्तन पर शोध कर रहे हैं, कहते हैं, “इंडस्ट्रीज को पता है कि वे जो करना चाहते हैं, वह जारी रख सकते हैं। हालांकि एमपीसीबी ने दोषी इकाइयों के निर्देश जारी कर दिए हैं, लेकिन उन्होंने उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई कभी नहीं की गई है।”

 

इंडियास्पेंड ने पाया कि, प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों को केवल एमपीसीबी को आश्वासन देने की जरूरत थी कि वे मानदंडों का पालन करेंगे और उन्हें एक छोटा जुर्माना देना होगा। लेकिन कानून के मुताबिक परिवेश को प्रदूषित करने के लिए किसी भी कंपनी को दंडित किया जाना चाहिए और निर्धारित समय के भीतर पर्यावरण को बहाल करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

 

ज्यादातर नोटिस किए जाते हैं नजरअंदाज

 

मुंबई उच्च न्यायालय ने भी दिसंबर 2011 में जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के बाद पारित आदेश में इस तरह के उल्लंघन का नोट लिया है। उच्च न्यायालय ने यह पाया था कि जब भी एमपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी एमआईडीसी में प्रदूषणकारी इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग करते थे तो बोर्ड के अध्यक्ष महाद क्लोजर नोटिस में बदलाव के लिए कहते थे।

 

कोर्ट ने पाया कि इसके बाद अध्यक्ष कंपनी पर कुछ शर्तों को लागू कर देते थे और कंपनी का अपना संचालन जारी रखने के लिए जुर्माना लगाते थे। ऐसे में दोषी कंपनियों का प्रदूषण नियंत्रण मानदंडों का उल्लंघन करना जारी रहता है।

 

उच्च न्यायालय ने एमपीसीबी अध्यक्ष को एक कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा कि, “यह समस्या से निपटने का एक संतोषजनक तरीका नहीं है। प्रदूषणकारी उद्योगों द्वारा नदियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। ”

 

रायगढ़ के निवासी निजामुद्दीन जलाल ने अपने क्षेत्र के एमआईडीसी फैक्ट्रियों की वजह से प्रदूषण पर मुंबई उच्च न्यायालय में दो जनहित याचिकाएं दायर की हैं। उन्होंने कहा कि सरकार विकास के रास्ते से भटक गई है।

 

महाराष्ट्र के लिए वर्ष  2015 की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी-शिवसेना सरकार की 15 साल पुरानी रिवर्स रेग्युलेशन जोन पॉलिसी के अंत के साथ हुई थी। इसे “मेक इन महाराष्ट्र” अभियान के तहत विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार के एक कदम के रूप में देखा गया।

 

इस कदम ने सभी उद्योगपतियों को नदियों के पास अपने कारखानों को स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। जाहिर है इससे जल प्रदूषण की आशंका बढ़ी। व्यापक विरोध और जनहित याचिकाओं के अलावा, यहां तक ​​कि एनजीटी ने भी राज्य से कहा कि क्यों नहीं इस निर्णय को अमान्य माना जाना चाहिए?

 

महाराष्ट्र में औद्योगिक इकाइयां-75,000, प्रदूषण बोर्ड के कर्मचारी -565

 

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास 840 कर्मचारियों के पद हैं। 01,जनवरी  2017 तक इनमें से 275 पद रिक्त थे। वार्षिक रिपोर्टों के अध्ययन से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में औसतन प्रत्येक वर्ष 150 पद खाली रहे हैं। 840-मजबूत कर्मचारियों की श्रम-शक्ति में से केवल 350 तकनीकी और वैज्ञानिक टीमों से हैं।

 

बोरालकर कहते हैं कि तकनीकी दल विशेष रूप से अधिक काम कर रहे हैं और उनके काम की गुंजाइश और मात्रा को देखते हुए उनकी संख्या कम है।

 

कानून के अनुसार, एमपीसीपी को 20 दिनों के भीतर नए कारखानों के संचालन के लिए सहमति देने या अस्वीकार करना आवश्यक है।

 

यदि बोर्ड इस अवधि में अपना निर्णय नहीं देता है, तो इसे सहमति समझा जाता है। बोर्ड के अपने रिकॉर्ड के मुताबिक, जनवरी 2013 तक, 120 से अधिक दिनों के लिए 17,500 से अधिक सहमति लंबित थी।

 

टीआईएसएस के साथ सहायक प्रोफेसर, साहू कहते हैं, “यह एक खतरनाक स्थिति है। ये 17,500 कारखाने बोर्ड से अनिवार्य पर्यावरण संरक्षण दिशानिर्देशों के बिना परिचालन शुरू कर सकते हैं। ”

 

चीनी कारखाने का कचरा गन्ना खेतों के लिए जहर

 

बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त जिला पर्यावरण समिति ने चीनी मिलों और मध्यम और लघु उद्योगों द्वारा जल प्रदूषण को रोकने में नाकाम रहने के लिए नवंबर 2016 में एमपीसीबी की आलोचना की है।

 

मानकों का उल्लंघन करने के लिए बंद की गई कुछ इकाइयों को परिचालन फिर से शुरू करने की अनुमति दी गई थी । समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अनुउपचारित कचरा नदी में छोड़ा जा रहा है।

 

43 वर्षीय महादेव सावंत सांगली के तसगांव शहर में चार एकड़ जमीन पर गन्ने का उत्पादन करते हैं। वे कहते हैं कि प्रदूषित पानी से उनकी फसलों की सिंचाई होती है। “कस्बों से आने वाले गन्ना कारखानों, रेत खनन और मानव अपशिष्ट ने कृष्णा नदी प्रदूषित कर रखा है। नमकीन पानी ने क्षेत्र में फसलों को नष्ट कर दिया है। ”

 

अप्रैल 2016 में, एनजीटी ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को यह कहते हुए हस्तक्षेप करने के निर्देश दिए थे कि  एमपीसीबी मुम्बई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में उल्हास नदी में अनुपचारित प्रवाह की जांच करने में असफल रहा है। एमपीबीसी की काम करने में असमर्थता को देखते हुए, सीपीसीबी ने महाराष्ट्र की सीईटीपी निगरानी की अनुमति मांगी थी।

 

एमपीसीबी के अपने रिकॉर्ड से पता चलता है मई 2016 में, 24 सीईटीपी में से सात अनुरूप नहीं थे।

 

कंपनियां अपशिष्ट उपचार पर लागत नहीं लगाती

 

नाम न बताने की शर्त पर नियंत्रण बोर्ड के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने इंडियास्पेंड को बताया कि तरल कचरा का उपचार किसी भी कारखाने के लिए एक महंगा मामला है, और खास कर एक रासायनिक इकाई के लिए। उन्होंने बताया कि रिश्वत लागत कम रखने में मदद कर सकता है।

 

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में 1,726 औद्योगिक इकाइयों द्वारा प्रदूषित होने की संभावना है। इन इकाइयों में अपशिष्ट कचरे के उपचार के लिए केवल आंशिक सुविधाएं हैं।

 

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने अपने औद्योगिक क्षेत्रों में सीईटीपी स्थापित करने की आवश्यकता की जांच के लिए विभिन्न राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को एक स्थायी निर्देश दिया है।

 

कैग की 2011 की रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि एमपीसीबी के पास कारखानों को संचालित करने से रोकने का कोई अधिकार नहीं है।

 

रायगढ़ निवासी जलाल कहते हैं, “सबसे ज्यादा यह हो सकता है कि कंपनियां तीन दिनों के लिए बंद कर दें और फिर काम शुरू करें या वे शटर नीचे खींचते हैं लेकिन अंदर काम जारी रखते हैं। ”

 

वह पांच वर्षों में एमपीसीबी द्वारा औद्योगिक इकाइयों को 5000 नोटिस जारी करने के बारे में नहीं सोचते । कहते हैं, “पांच हजार या पांच लाख, समस्या यह है कि कोई जवाबदेही नहीं है। ”

 

(पॉल एंड सूद स्वतंत्र पत्रकार हैं और बेंगलुरु में रहते हैं। ये दोनों वह 101Reporters.com के सदस्य भी हैं। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का राष्ट्रीय नेटवर्क है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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