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महाराष्ट्र का गहराता कृषि संकट – अनाज उत्पादन में 41%, दाल में 11% गिरावट

प्राची सालवे,

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महाराष्ट्र के 355 में से 278 तालुकों (जिलों के उप- इकाइयों) में कम बारिश के बाद, वर्ष 2015-16 में, राज्य में कृषि विकास दर 2.7 फीसदी गिरावट होने की संभावना है। अनाज उत्पादन में 41 फीसदी एवं दालों के उत्पादन में 11 फीसदी गिरावट का अनुमान किया गया है। यह आंकड़े महाराष्ट्र 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण में सामने आए हैं।

 

सर्वेक्षण के अनुसार, 2015 में, महाराष्ट्र में वर्षा  सामान्य का 60 फीसदी था और इसलिए राज्य की सर्दियों की फसल (रबी) के लिए खेती क्षेत्र में अक्टूबर 2015 और मार्च 2016 के बीच 16 फीसदी की गिरावट आई है। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब इलाके में सामान्य से कम बारिश हुई है।

 

वर्षा की कमी के कारण अन्य राज्यों में भी संकट उत्पन्न हो गया है: भारत के दस राज्यों के 688 जिलों में से 246 ज़िले – या देश के 35 फीसदी इलाके में – आधिकारिक तौर पर सूखा प्रभावित हैं। यह आंकड़े 10 मार्च को लोकसभा को दिए गए एक जवाब में सामने आए हैं।

 

112 मिलियन लोगों (1120 लाख ) में से 52.7 फीसदी लोगों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर निर्भर होने के साथ, महाराष्ट्र, भारत का दूसरा (उत्तर प्रदेश के बाद) सबसे महत्वपूर्ण कृषि राज्य है। 15.7 लाख करोड़ रुपए (236 बिलियन डॉलर) के साथ, कुल मिलाकर,  महाराष्ट्र की सबसे बड़ी सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) है, जिसमें से 10 फीसदी कृषि से आता है।

 

राज्य के थके हुए अर्थव्यवस्था में से बेहतर स्थिति केवल सेवा क्षेत्र है, जिसमें 44 मिलियन (440 लाख) लोग नौकरी कर रहे हैं और सर्वेक्षण के अनुसार इसकी 10.8 फीसदी बढ़ने की संभावना है, एवं उद्योग क्षेत्र की 5.9 फीसदी बढ़ने की संभावना है।

 

सामान्य की 60 फीसदी बारिश, बद्तर कृषि स्थिति

 

2015 में, महाराष्ट्र में 59.4 फीसदी बारिश हुई है जोकि यहां सामान्य है (औसत 1,131 मिमी के खिलाफ 678.5 मिमी बारिश)।

 

355 तालुकाओं में (मुंबई और इसके उपनगरीय जिले को छोड़कर)से 278 तालुकों में कम वर्षा हुई है -जिसका मतलब है कि जिलों में औसत के 50 फीसदी से 70 फीसदी से भी कम बारिश हुई है- 75 में सामान्य और 2 में (अकोले और महाबलेश्वर) अधिक वर्षा हुई है।

 

कम वर्षा का प्रभाव बुआई पर पड़ा है। 2015 खरीफ (अक्टूबर- अप्रैल) सीजन के दौरान 141.46 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी, पिछले वर्ष से 6 फीसदी (150.97 लाख हेक्टेयर) कम। पिछले वर्ष की तुलना में, खारीफ मौसम में कम वर्षा होने के साथ, रबी मौसम के दौरान खेती क्षेत्र में 16 फीसदी गिरावट होने की संभावना है।

 

2014-15 में, अनाज और दालों के उत्पादन में 18.7 फीसदी और 47 फीसदी की गिरावट हुई है। इस वर्ष, 2015-16 में, अनाजों के उत्पादन में 41 फीसदी की गिरवाट होने की संभावना है, यानि कि 1.81 लाख मीट्रिक टन से 1.05 लाख मीट्रिक टन तक गिरावट हो सकती है। जबकि तिलहन 9 फीसदी बढ़ने की उम्मीद की जा रही है।

 

महाराष्ट्र के 43,000 गांवों में से 27723 गावों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है और 2015 में, नौ किसान रोज़ाना आत्महत्या करते हैं, इंडियास्पेंड ने पहले भी विस्तार से बताया है।

 

जल संरक्षण, सिंचाई परियोजनाएं चल रही हैं लेकिन राज्य का सिंचाई रिकॉर्ड ठीक नहीं

 

सरकार ने  34 जिलों के 6205 गांवों में, 2014 और 2016 के बीच पानी की कमी को समाप्त करने के योजना के हिस्से के रुप में जल-संरक्षण परियोजनाओं – जैसे कि तालाबों, कुओं, चैक डैम और ड्रिप सिंचाई – के निर्माण के लिए 1544 करोड़ रुपये खर्च किया है।

 

सर्वेक्षण के अनुसार, अक्टूबर 2015 के अंत तक , इन गांवों में 130,761 परियोजनाओं को पूरा कर लिया गया है, और 34,989 अन्य परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं।

 

महाराष्ट्र: सिंचाई की स्थिति, 2015

 

 

यह स्पष्ट है कि बनाई गई अधिकांश सिंचाई क्षमता- मतलब भूमि जिसे सैद्धांतिक रूप से या संभावित नई सुविधाओं के साथ सिंचित किया जा सकता है – बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से किया गया है।

 

भारत भर में, प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं के साथ, बनाई सिंचाई क्षमता और उपयोग के बीच की खाई में वृद्धि हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है। सिंचाई क्षमता का उपयोग – खेती के लिए उपयोग किए गए पानी के बनाए गए सिंचाई क्षमता के प्रतिशत के रूप में – 1985 से 1992 तक 85 फीसदी था, 2007 तक यह गिर कर 29 फीसदी हुआ है।

 

मोटे तौर पर 70,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद , राज्य की सिंचाई क्षमता 0.1 फीसदी से अधिक न बढ़ पाने के साथ, सिंचाई के साथ महाराष्ट्र के अनुभव आशाजनक नहीं है, जैसा कि  राज्य के वर्ष 2014-15 के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बिजनेस स्टैंडर्ड की इस रिपोर्ट में कहा गया है।

 

कुल फसल क्षेत्र के प्रतिशत पर सकल सिंचित क्षेत्र पर अंतिम आंकड़ा 2009-10 से उपलब्ध है, और आंकड़ों के अनुसार, केवल 18 फीसदी कुल फसल क्षेत्र सिंचित किया जा रहा है।

 

सिंचाई पर भारी खर्च के बावजूद राज्य, सिंचाई के तहत क्षेत्र में वृद्धि करने में कामयाब नहीं हुआ है, और इसके 82 फीसदी खेत अब भी अनिश्चित बारिश पर निर्भर हैं।

 

महाराष्ट्र का करीब आधा बजट कृषि के लिए अलग

 

महाराष्ट्र बजट में कृषि के लिए अलग से 25,000 करोड़ रुपये (3.7 बिलियन डॉलर ) रखा गया है जो कि कुल 56,997 रुपये करोड़ रुपए (8.5 बिलियन डॉलर) का आधा है।

 

इस समाचार रिपोर्ट के अनुसार, सिंचाई के लिए मुख्य रुप से 7,850 करोड़ रुपए (1.1 बिलियन डॉलर ) खर्च किया जाएगा, 2014-15 की तुलना में 8 फीसदी की वृद्धि है। यह खर्च 38 परियोजनाओं को पूरा करने में लगया जाएगा जो अपनी निर्धारित समय सीमा से देरी से चल रही है।

 

अन्य खर्च इस प्रकार हैं:

 

    • 2,078 करोड़ रुपए (313 मिलियन डॉलर) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में शामिल सात सिंचाई परियोजनाओं पर खर्च किया जाएगा।

 

    • 100,000 खेत तालाबों, 37,500 कुओं और 90,000 बिजली के पंपों पर 2,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

 

    • राज्य के कृषि बीमा के हिस्से के रुप में 1,855 करोड़ रुपए (279 मिलियन डॉलर) का खर्च होगा।

 

    • 1,000 करोड़ रुपए (150 मिलियन डॉलर) जलयुक्त शिवर योजना पर खर्च किए जाएंगे जो पिछले वर्ष की 1,600 करोड़ रुपए (261 मिलियन डॉलर) से कम है। इस योजना को सीमित सफलता मिली है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।

 

सिंचाई का मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार वर्षा में तेजी से अनिश्चित बढ़ने की संभावना है।

 

भारत में 138 मिलियन (1380 लाख) किसानों में से 66 मिलियन किसान (660 लाख) अनिश्चित वर्षा पर निर्भर हैं। कई वैश्विक एवं भारतीय अध्ययनों पर इंडियास्पेंड द्वारा की गई समीक्षा के अनुसार, मध्य भारत में चरम वर्षा की घटनाएं, मानसून प्रणाली की कोर, बढ़ रही हैं और मध्यम वर्षा कम हो रही है जो कि स्थानीय और विश्व मौसम में हुए बदलाव का परिणाम है।

 

(सालवे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 11 अप्रैल 2016 को  indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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