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महाराष्ट्र में बढ़ते खनन के खिलाफ बढ़ रहा है आदिवासियों का विरोध

पूर्वी कुलकर्णी,

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यह तस्वीर दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र में गढ़चिरौली जिले की है। जिले के सूरजगढ़ गांव में वार्षिक फसल त्योहार के लिए एकत्रित हुए हैं मेडिया गोंड आदिवासी। इस साल इस उत्सव के दौरान महाराष्ट्र सरकार द्वारा किए जा  रहे खनन को लेकर आदिवासी उद्वेलित दिखे

 

इटापल्ली और भमरागढ़ तालुक, गढ़चिरौली (महाराष्ट्र): दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र के जनजातीय समुदाय से आने वाले माडिया गोंड आदिवासी फसलों की कटाई से ठीक पहले जश्न मनाते हैं। हर साल यह जश्न जनवरी की शुरुआत में होता है। सारे लोग दो रातों के लिए एक जगह इकट्ठा होते हैं। वे साथ मिलकर अपने देवता ठाकुर देव की पूजा करते हैं, खुशी के गीत गाते हैं, नाचते हैं और मांसाहार ग्रहण करते हैं।

 

इस साल इस जश्न में इलाके के 70 गांवों से लगभग 1,000 आदिवासी एकत्र हुए। इस वर्ष के उत्सव के दौरान लोगों  के बीच महाराष्ट्र सरकार द्वारा किए जाने वाला खनन चर्चा का विषय बना रहा। हम बता दें कि सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के अनुसार महाराष्ट्र भारत का सबसे समृद्ध राज्य है।

 

समाचार पत्र टेलीग्राफ की रिपोर्ट की इस रिपोर्ट के अनुसार त्योहार स्थल से 20 किमी की दूरी पर 23 दिसंबर, 2016 को 80 ट्रकों को जला दिया गया था। इस घटना को कथित तौर पर माओवादियों ने खनन परियोजनाओं के विरोध में अंजाम दिया है। वर्ष 2016 में, सूरजागढ़ और मेडिया गोंड गांव में नक्सल हमलों के डर से राज्य ने खनन के काम पर रोक लगा दी थी।

 

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त्योहार स्थल से 20 किमी की दूरी पर 23 दिसंबर, 2016 को 80 ट्रकों को जला दिया गया था। इस घटना को कथित तौर पर माओवादियों ने खनन परियोजनाओं के विरोध में अंजाम दिया है।

 

गढ़चिरौली जिले में स्थित है सूरजगढ़ । यह गांव महाराष्ट्र की उस महत्वपूर्ण पट्टी पर है,  जिसमें राज्य का 60 फीसदी खनिज  है। इस इलाके में कोयला, चूना पत्थर, लौह अयस्क और मैग्नीज सहित 17 तरह के खनिजों का 5,75.3 करोड़ टन अनुमानित संचित भंडार है, जो भारत के कुल संचित खनिज भंडार का 22.56 प्रतिशत है।

 

सामाजिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन’ द्वारा जिला खनन कार्यालय से छह महीने पहले ली गई जानकारी के मुताबिक जिले के छह तालुका (उप प्रभागों) भर में 18,000 से अधिक एकड़ में 25 नए खनन परियोजनाओं के लिए पूर्वेक्षण लाइसेंस जारी किए गए हैं। इसी कारण आदिवासी ज्यादा चिंतित हैं।

 

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क्षेत्र में नए खनन परियोजनाओं के संबंध में गढ़चिरौली जिले में सूरजगढ़ में वार्षिक फसल उत्सव में बांटा गया पैम्फलेट।

 

स्थानीय आदिवासी नेताओं के भाषण से यह आशंका झलकती है कि खनन से उन्हें विस्थापन झेलना पड़ सकता है। भंरागढ़ तालुका में बेजूर गांव के 40 वर्षीय भूमिया (गांव पुजारी) राम महाका कहते हैं, “हम मानते हैं कि लोग, जानवर और अन्य जीवित और निर्जीव चीजे जंगलों, पहाड़ों, नदियों और बारिश में रहते हैं। यदि प्रकृति के इन चीजों को हम छेड़ते हैं तो जिस दुनिया में हम रहते हैं, वह समाप्त हो जाएगा।” गढ़चिरौली का संघर्ष, भारत के आदिवासी इलाकों में चल रही बड़ी लड़ाई का उदाहरण है।

 

गढ़चिरौली और अन्य आदिवासी भूमि लुभाते हैं खनिकों को

 

कोयला समृद्ध इलाकों और मध्य और पूर्वी भारत के जंगलों में संसाधन विरोध में तेजी एक सर्वविदित घटना बन चुकी है। हम बता दें कि देश की कुल ऊर्जा उत्पादन में कोयले का योगदान 60 फीसदी है। संसाधनों को लेकर करीब हर महीने होने वाले इस संघर्ष के संबंध में कुछ ही ग्रामीण भारतवासी जानते हैं या सोचते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी सितंबर 2014 में विस्तार से बताया है।

 

भारत के शीर्ष खनन क्षेत्रों में से आधे गढ़चिरौली  जैसे आदिवासी भूमि पर हैं। वर्ष 2011 से 2014 के बीच केन्द्रीय खान मंत्रालय द्वारा देश भर में 48 खनन पट्टों को आदिवासी क्षेत्रों में अनुमोदित किया गया है। भारत की खनिज उत्पादक जिलों में वनों का औसत अनुपात 28 फीसदी है। यह आंकड़ा 20.9 फीसदी के राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक है।

 

सूरजगढ़ के आदिवासियों की तरह ही छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले, आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले और ओडिशा के खंदादर हिल्स के आदिवासी समुदाय खनन परियोजनाओं के खिलाफ एकजुट हुए हैं। उन्होंने खनन से रोजगार सृजन और विकास को बढ़ावा मिलने के तर्क को नकार दिया है। खनन लाइसेंस देते समय ग्राम सभाओं द्वारा सलाह-मशविरा नहीं के जाने पर भी इन्होंने नाराजगी जताई है।

 

खनन के लिए विस्थापन: भारत में चालाकी भरा डेटा


 

मई, 2014 में केंद्र में आई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार ने कानून में बदलाव कर खनन और औद्योगिकीकरण को तेजी से बढ़ावा देना शुरू किया है। हम बता दें कि कानून में बदलाव करते समय स्थानीय सरकारी संस्थाओं से राय मशविरा नहीं की गई है।

 

ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी ने पदभार ग्रहण के बाद जो पहला काम किया, वह यह है कि खनन के मामले में ग्राम सभा की राय को और जनवरी 2014 में संप्रग द्वारा पारित भूमि अधिग्रहण कानून में सामाजिक प्रभाव के आकलन के प्रावधान को कमजोर करना है।

 

पिछले साल जिला कलेक्टर के माध्यम से महाराष्ट्र के राज्यपाल को इटापल्ली तालुका के 70 ग्राम सभाओं द्वारा भेजे गए एक संकल्प के अनुसार, “हम सरकार से अपील करते हैं कि हमारे पारंपरिक समुदाय संसाधनों और जैव विविधता को, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार सृजन के नाम पर हमारे जंगलों में खानों और पहाड़ियों खुदाई करके नष्ट न करें।”

 

Resolution of the Gram Sabha of Surjagad, Etapalli (Gadchiroli district)

पिछले साल जिला कलेक्टर के माध्यम से महाराष्ट्र के राज्यपाल को इटापल्ली तालुका के 70 ग्राम सभाओं द्वारा भेजा गया एक संकल्प पत्र

 

जल, जंगल और जमीन हो तो फिर घर हो

 

त्योहार के दौरान इलाके में आ रही ताजा परियोजनाओं के संबंध में पर्चे बांटे गए। सरकार की निंदा करने वाले बैनर भी लगाए गए थे।

 

आंदोलन के संयोजक महेश राउत ने कहा कि, “हमें बताया गया है कि इन परियोजनाओं के लिए नीलामी तय की गई है और सहमति पत्रों (समझौता ज्ञापनों) खनन कंपनियों के साथ हस्ताक्षर किए गए हैं। वे अब पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरी के विभिन्न चरणों में हैं।”

 

आदिवासियों ने जल, जंगल, जमीन और लोगों की जरूरत के जीवन के बीच नाजुक कड़ी और लोगों के जीवन को संरक्षित करने की जरूरत के संबंध में भी बात की।

 

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महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के सूरजगढ़ की मेडिया गोंड आदिवासी गांव में त्योहार के दौरान लगा एक बैनर। बैनर में खनन की निंदा की गई है।

 

त्योहार के दौरान, विभिन्न गांवों से आए गायतास,जो पारंपरिक आदिवासी प्रणालियों में गांव की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होते हैं, ने जंगलों को संरक्षित करने करने की जरुरत को दोहराते हुए भाषण दिया।

 

भंरागढ़ पट्टी गोतुल समिति की अध्यक्ष राजश्री लेकामे ने कहा “यह पहली बार है कि त्योहार में हम आजीविका और अधिकारों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।”

 

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भंरागढ़ पट्टी गोतुल समिति की अध्यक्ष राजश्री लेकामे ने कहा “यह पहली बार है कि त्योहार में हम आजीविका और अधिकारों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।”

 

गौण खनिज मामलों में ही समुदायों से परामर्श करती है सरकार

 

पिछले साल पारित किए गए ग्राम सभा के प्रस्तावों पर सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। गढ़चिरौली कलेक्टर एएसआर नाइक ने कहा कि उन्हें कुछ ठीक से याद नहीं है। इंडियास्पेंड को मोबाईल के जरिए दिए गए एक जबाव में वह कहते हैं कि, “विभिन्न संस्थाओं को संबोधित करते हुए कई पत्र और प्रस्ताव हो सकते हैं। मुझे उन सभी की जांच करनी होगी।”

 

पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विस्तार) (पेसा) अधिनियम, 1996 के धारा 4 (के) के अनुसार, कार्यक्रम क्षेत्रों में गौण खनिजों के खनन पट्टा देने से पहले ग्राम सभाओं से सलाह करना अनिवार्य है।

 

महाराष्ट्र सरकार के खनिजों के विनियमन के मुताबिक गौण खनिजों में घरेलू के बर्तन बनाने पत्थर, बजरी, संगमरमर, कंकड़ के निर्माण, आदि के लिए इस्तेमाल पत्थर शामिल हैं। और प्रमुख खनिजों वे हैं जो अन्य औद्योगिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होते हैं जैसे कि कोयला मैगनीज अयस्क, लौह अयस्क, बॉक्साइट आदि।

 

नाइक कहते हैं, खान और खनिज (नियमन एवं विकास) अधिनियम, 1957 के अनुसार सूरजगढ़ में लौह अयस्क खनन एक प्रमुख खनिज है। वे कहते हैं, “मुझे लगता है जिन अधिकारियों को पत्र भेजे गए हैं वे उचित निर्णय लेंगे।”

 

रोजगार और विकास का वादा

 

सरकार ने स्थानीय आदिवासियों से वादा किया है कि खनन शुरू से इलाके में औद्योगिक विकास होगा। इससे आदिवासी परिवारों के लिए ज्यादा से ज्यादा नौकरियां सृजित होंगी और उनकी आय में भी वृद्धि होगी, जैसा कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की 28 अगस्त, 2015 इस रिपोर्ट में बताया गया है।

 

लेकिन आदिवासियों का कहना है कि वन उत्पाद ही उनके लिए काफी है।  वर्ष 2016 में जिले के 1,267 ग्राम सभाओं में तेंदू की बिक्री से 35 करोड़ रुपए की कमाई हुई है। जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के एकाधिकार से तेंदू और बांस की बिक्री को मुक्त कर दिया है।

 

सरकार ने ग्राम सभाओं को वन से आए उपज को निजी खरीदारों को सीधे-सीधे बेचने का अधिकार दे दिया है। इसका मतलब है कि हर परिवार 15 दिन में 30,000 रुपए से 50,000 रुपए तक कमा सकता है।

 

महाराष्ट्र ग्राम विकास जन आंदोलन के एक सदस्य, राम दास जात्रे कहते हैं, “जब परिवार पहले से ही लाख रुपए कमा रहा है तो हमसे नौकरियों और विकास की बात क्यों की जा रही है।”

 

जात्रे का आरोप है कि सरकार इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की स्थापना स्थानीय परिस्थितियों को बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि बड़े कारोबार के लिए आसान रास्ता बनाने के लिए करना चाहती है।

 

वह कहते हैं, “सड़क का निर्माण किया गया, क्योंकि वे सीमेंट बेचना चाहते थे। वे कृषि उपकरणों पर सब्सिडी प्रदान करते हैं, क्योंकि वे अपना उत्पाद बेचना चाहते हैं। वे खनन करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें लाभ और कमीशन मिलता है। ये सरकार और कंपनियां हैं, जिन्हें विकास की वर्तमान धारणा से लाभ मिलता है।”

 

पारंपरिक प्रथाएं आदिवासी समाज को बनाती हैं समृद्ध

 

आदिवासी समुदायों में ‘जैव विविधता के संरक्षण और प्रबंधन के तरीकों के दस्तावेजीकरण पर काम कर रहे शोधकर्ताओं का भी यही मानना है।

 

एक गैर सरकारी संगठन कल्पावृक्ष पर्यावरण कार्य समूह की सदस्य नीमा पाठक ब्रूम कहती हैं, “आदिवासियों के लिए विकास का मॉडल गैर आदिवासियों द्वारा तैयार किया गया है। और यही कारण है कि विश्व स्तर पर दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के देशों में, जहां भी आदिवासियों और उनका व्यवहार गंभीर खतरे में हैं, वहां भी यही पैटर्न पर देखा जा रहा है।”

 

ब्रूम गढ़चिरौली में मेडिया गोंड आदिवासियों को उनकी आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक व्यवस्था के दस्तावेज तैयार करने में मदद कर रही हैं। वह त्योहार के दौरान सूरजगढ़ से मनजिस (गांव प्रमुख) के एक समूह को सम्बोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के विकास के लिए योजना को अनुमति देना ही उदेश्य होना चाहिए।

 

कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि आदिवासी अपने दैनिक जरुरतों के लिए थेले (मछली जाल) और धेनकी (चावल कूटाई) जैसे सरल औऱ साधारण उपकरण का उपयोग करते हैं, जिसे मुख्यधारा के प्रचलन में लाने की जरुरत है।

 

सितंबर 2015 में हर्षित नाम के युवक ने फेसबुक पर ह्यूमन्स ऑफ गोंडवाना नाम से एक पेज बनाया है। हर्षित का कहना है कि “अविकसित कहकर खारिज करने की बजाय उनकी प्रथाओं को समझने और मुख्यधारा में शामिल करने और संरक्षित करने की जरुरत है।”

 

जात्रे का मानना ​​है कि वन अधिकार के साथ-साथ आदिवासियों को सांस्कृतिक अधिकार भी दिया जाना चाहिए। वह कहते हैं, “वस्तु विनिमय और सामूहिक काम की समृद्ध परंपरा है, जो हमारे समाज में प्रचलित है। यह सब मुख्यधारा की आर्थिक प्रथाओं की तुलना में हमारे समाज में भी  पसंद किया जाता रहा है।”

 

यहां के लोग माओवादियों और राज्य के बीच की गोलीबारी में फंस जाते हैं। अहेरी सिविल कोर्ट के वकील लालसु नोगोटी कहते हैं, “यहां अभी स्थिति बहुत तनावपूर्ण है और मुश्किल भरे हालात हैं। हमारे साथ माओवादी भी खनन का विरोध कर रहे हैं।”

 

अपनी ही भूमि पर अब अल्पसंख्यक हैं आदिवासी

 

कई लोगों का मानना ​​है कि यदि जंगलों को नष्ट किया जाएगा, तो अपने घरों से बेदखल होने से पहले ही आदिवासियों को अपनी जगह छोड़नी पड़ेगी।

 

जात्रे कहते हैं, “हमने इतिहास में पढ़ा है कि चंद्रपुर का राजा एक गोंड था। लेकिन ब्रिटिश काल के दौरान कोयला खनन परियोजनाएं शुरु होने के बाद से अब मुश्किल से चंद्रपुर में कोई गोंड आबादी बची है। हमें पता नहीं कि वे कहां गए।”

 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार चंद्रपुर जिले में 9.35 फीसदी से अधिक अनुसूचित जनजाति नहीं है, जबकि गढ़चिरौली की कुल जनसंख्या में से 38.71 फीसदी अनुसूचित जनजातियां हैं।

 

जात्रे कहते हैं,1982 में जिले के गठन के बाद से, गढ़चिरौली में आदिवासियों की आबादी में लगातार गिरावट हुई है, “जिले में आदिवासी आबादी तब 60 फीसदी थी और इसी वजह से गढ़चिरौली को चंद्रपुर से अलग कर एक नया जिला बनाया गया था। लेकिन अब आबादी कम होकर महज 38 फीसदी रह गई है।”

 

Gorga mara khalisi uda jabura khin jangal,Soba uda metta gilga khalisi uda kal kal pong near dodda guda

 

(In the midst of hills and rocks lie forests,Come to see them)

 

Metta dod pollam tipu-tapu nangil puji pantha tendana,Aajrasa saal niche pant tandis pishan

 

(In the midst of the hills flows a river,Come to farm there)

 

Unnees chyanobeta pesa kanoon laago ito,Jal, Jangal, Jameen sathi naate naate garam sapa baneki akal

 

(1996 PESA law is being dismissed by the government,To protect water, forest, land, we will hold a gram sabha)”.

 

(‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ और ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के साथ काम कर चुकीं कुलकर्णी अभी स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं और मुंबई में रहती हैं। साथ ही  वह हकदर्शक के साथ एक शोधकर्ता के रूप में भी जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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