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“ मातृ शिक्षा कार्यक्रम से मां के साथ-साथ बाल शिक्षा में सुधार ”

श्रेया शाह,

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माताओं के लिए साक्षरता कार्यक्रम से अगर माताएं शिक्षित होती हैं तो वह समाज की चुनौतियों का सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होती हैं। लेकिन इसका एक और लाभ यह है कि शिक्षित माताएं बच्चों की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देती हैं। यह जानकारी हाल ही में किए गए एक अध्ययन में सामने आई है। यह अध्ययन सबसे कम महिला साक्षरता दर वाले दो राज्यों- राजस्थान और बिहार- के 480 गांवों में एक साल के लिए आयोजित किया गया था।

 

अध्ययन में पांच से आठ साल के बच्चों की माताओं के साथ के लिए तीन तरह के कार्यक्रम बनाए गए थे। पहला होम लर्निंग, यानी घर में सीखना। दूसरा बच्चों की शिक्षा में उनकी भागीदारी, और तीसरा इन दोनों का संयोजन।

 

नतीजा संतोषजनक था। देखा गया कि पहले कार्यक्रम के लिए एक अंक वाली संख्या की पहचान कर पाने में समर्थ मांओं को 11 फीसदी ज्यादा प्वांयट मिले । बच्चों की शिक्षा में भी उनके शामिल होने की अधिक संभावना पाई गई । जहां तक बच्चों का सवाल है, उनके गणित के स्कोर में भी मामूली सुधार हुआ ।

 

यह अध्ययन शिक्षा पर काम कर रहे एक गैर सरकारी संगठन ‘प्रथम’ ,कॉर्नेल यूनिवर्सिटी और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अब्दुल लतीफ जमील पोवर्टी एक्शन लैब (जे-पाल) द्वारा आयोजित किया गया था।

 

माता-पिता की शिक्षा का सहसंबंध औपचारिक स्कूली शिक्षा में उच्च भागीदारी और बच्चों के सीखने में सुधार के बेहतर निर्णय के साथ किया गया ।

 

बिहार और राजस्थान में साक्षरता कार्यक्रम से माताओं को लाभ

Source: The Impact of Maternal Literacy and Participation Programs: Evidence from a Randomized Evaluation in India
Note: ‘No Impact’ refers to no statistically significant impact.

 

देश भर में साक्षरता के नवीनतम उपलब्ध आंकड़े-वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 15 साल की उम्र से ऊपर के लगभग 30 फीसदी भारतीय वयस्क अशिक्षित थे। निरक्षरता महिलाओं में 40.7 फीसदी , अनुसूचित जातियों में 39.6 फीसदी तथा अनुसूचित जनजाति में 48 फीसदी दर्ज की गई थी।

 

जे-पाल के सहयोगी निदेशक और अध्ययन के सह-लेखक मार्क शोटलैंड कहते हैं, “ यदि बच्चे 100 फीसदी स्कूल जाते हैं तो भी हम केवल कुछ घंटे के लिए ही उन्हें देखते हैं। बच्चे, विशेष रुप से छोटे बच्चे कई घंटे घर पर ही मां के साथ बिताते हैं। ”

 

अच्छे परिवारों से और जिनके माता-पिता बेहतर शिक्षित हैं, उन बच्चों के पास सीखने की सुविधा है।तब भले ही स्कूल में जो वे सीखते हैं उन पर जोर न दिया जाए।  शॉटलैंड कहते हैं, “इसलिए  बच्चों की शिक्षा में असमानताओं को कम करने के लिए घर पर नजर रखना जरूरी है।”

 

60 फीसदी माताएं जानती हैं बुनियादी गणित, इसलिए बच्चों के आंकड़े भी 60 फीसदी

 

अध्ययन में पाया गया कि दोनों प्रकार के कार्यक्रमों के संपर्क में आने वाली 58 फीसदी माताएं एक अंक वाली संख्या पहचान सकती हैं। नियंत्रण समूह में, जहां माताओं के लिए ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं नहीं था, 47 फीसदी महिलाओं में गणित का यह कौशल देखा गया ।

 

अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों की माताओं को दोनों तरह के कार्यक्रमों का लाभ मिला, उनमें से 60 फीसदी तक एक अंक की संख्या पहचान सकते थे। जहां माताओं के लिए ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं नहीं था,  वहां के बच्चों के लिए ये आंकड़े 56 फीसदी थे।

 

इस कार्यक्रम के दौरान लेखकों ने पाया कि कुछ बच्चों का अपनी मां के साथ कक्षाओं में जाना और गृह गतिविधियों में भाग लेने सकारात्मक रहा। उन बच्चों के परीक्षण अंकों में सुधार देखे गए।

 

मातृ साक्षरता कार्यक्रम में बच्चों के गणित स्कोर बेहतर

Source: The Impact of Maternal Literacy and Participation Programs: Evidence from a Randomized Evaluation in India
Note: ‘No Impact’ refers to no statistically significant impact.

 

साक्षरता कैप्सूल ने कैसे किया काम

 

अध्ययन के दौरान,  सितंबर 2011 और फरवरी 2012 के बीच गांवों के चार समूहों में से एक को रैन्डम्ली शामिल किया गया था। इनमें से एक माताओं का नियंत्रण समूह था, जिसे हस्तक्षेप नहीं मिला। दूसरे समूह को मातृ साक्षरता कार्यक्रम के लिए दैनिक भाषा और गणित कक्षाओं के साथ संपर्क किया गया था। तीसरे समूह को अपने बच्चों की शिक्षा में शामिल होने के लिए घर में सीखने का अवसर मिला । चौथे समूह को दोनों का लाभ मिला।

 

मातृ साक्षरता कक्षाओं का संचालन ‘प्रथम’ द्वारा प्रशिक्षित स्थानीय स्वयंसेवक द्वारा किया गया था। घर पर सीखने और सहभागिता कार्यक्रम के लिए ‘प्रथम’ द्वारा भुगतान किए गए प्रशिक्षक थे।

 

12.5 कक्षाओं में से एक महीने में तीन से पांच दिनों के बीच की एक औसत उपस्थिति के साथ मातृ साक्षरता कार्यक्रम और संयुक्त हस्तक्षेप में माताओं ने 25 से 27 कक्षाओं में भाग लिया।

 

घर में सीखने और सहभागिता कार्यक्रमों के लिए परिवारों के बीच लगभग 16 बार कार्यक्रम से जुड़े लोग गए। 81 फीसदी दौरे में माताएं उपस्थित थीं, जैसा कि हस्तक्षेप के दूसरे छमाही के दौरान आकलन किया गया था।

 

अल्पावधि में मातृ हस्तक्षेप लागत प्रभावी नहीं

 

अध्ययन की रिपोर्ट लिखने वाले लेखक कहते हैं कि बच्चों के सीखने के परिणामों में सुधार करने के लिए माताओं को लक्षित करने वाला हस्तक्षेप अल्पावधि में लागत प्रभावी नहीं हो सकता है ।

 

कार्यक्रम की लागत प्रति मां 500 रुपए है। उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों का लक्ष्य माताओं के सीखने के स्तर और बच्चों के सीखने के स्तर का एक साथ सुधार है।

 

कार्यक्रम की लागत प्रति मां 500 रुपए है। उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों का लक्ष्य माताओं के सीखने के स्तर और बच्चों के सीखने के स्तर का एक साथ सुधार है।

 

उदाहरण के लिए, मातृ शिक्षा के कारण घर में मौलिक सांस्कृतिक परिवर्तन हो सकते हैं, जिसका स्कूल में बच्चे के नामांकन और / या सीखने पर दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है। अपने बच्चों की शिक्षा में मां की बदलती भूमिका को देखकर कुछ हद तक इन बदलावों को पढ़ा जा सकता है।

 

सीखने वाले समूह की माताएं अपने बच्चों की शिक्षा के लिए अधिक जिम्मेदार

 

हस्तक्षेप और नियंत्रण समूह में अधिकांश माताओं का मानना ​​था कि उनके बच्चों की शिक्षा में उनकी भूमिका है। मातृ शिक्षा, घरेलू भागीदारी और संयुक्त हस्तक्षेप समूहों में माताओं को 4.1, 3, और 4 प्रतिशत अंक मिले थे। इससे पता चलता है कि वे माएं अपने बच्चों की शिक्षा के लिए अधिक संवेदनशील हो सकती हैं।

 

शोधकर्ताओं ने पाया कि घर पर माताओं के द्वारा बच्चों को पाठ पढा कर मदद करने में लगने वाले समय पर हस्तक्षेप का महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा है। लेकिन उन पर दूसरे मामलों में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है – जैसे कि माताओं का पुस्तिकाओं की जांच करना, स्कूल के बारे में अपने बच्चों से बात करना, और अपने बच्चों की पढ़ाई के बारे में दूसरों से बातें करना। घर की भागीदारी और संयुक्त हस्तक्षेप में भाग लेने वाली माताएं दूसरों की तुलना में   अपने बच्चों के गृह-कार्य में ज्यादा मदद करती हैं।

 

सरकार ने कहा-साक्षर भारत कार्यक्रम से 2.27 करोड़ व्यस्क साक्षर

 

1998 में, भारत सरकार ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (एनएलएम) शुरू किया। इ सका उद्देश्य भारत की 75 फीसदी आबादी को 2007 तक साक्षर बनाने का था। लेकिन यह लक्ष्य अब तक हासिल नहीं हो सका है। फिर भी, 2009 तक 12.745 करोड़ भारतीय साक्षर बन पाए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उनमें से 60 फीसदी महिलाएं हैं, 23 फीसदी अनुसूचित जाति के और 12 फीसदी अनुसूचित जनजाति के हैं।

 

वर्ष 2009 में, भारत ने साक्षर भारत कार्यक्रम की शुरुआत की थी। कार्यक्रम का उदेश्य “औपचारिक शिक्षा तक पहुंचने का अवसर खो चुके और ऐसी शिक्षा प्राप्त करने के लिए मानक आयु को पार कर चुकने वाले वयस्कों, विशेष रुप से महिलाओं को शैक्षिक विकल्प प्रदान करना था। ” इसका उद्देश्य 15 साल और उससे अधिक के आयु वर्ग में 7 करोड़ वयस्कों को साक्षरता प्रदान करना था। कार्यक्रम का ध्यान मुख्य रुप से महिलाओं और ग्रामीण क्षेत्रों पर केंद्रित था।

 

शुरू में वर्ष 2012 तक कार्यक्रम समाप्त करना निर्धारित किया गया था। इस योजना को वर्ष 2017 तक बढ़ाया गया, जिसमें 410 जिलों को कवर किया गया था। एक सरकारी दस्तावेज के मुताबिक कार्यक्रम का लक्ष्य साक्षरता को 80 फीसदी तक बढ़ाने और साक्षरता में लिंग अंतर को 10 फीसदी से भी कम करना था।

 

15 वर्ष से ऊपर 30 फीसदी भारतीय हैं निरक्षर

Source: Census 2011

 

दिसंबर 2016 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा साल के अंत की समीक्षा के अनुसार, दिसंबर 2014 और मार्च 2016 के बीच कार्यक्रम के लिए पंजीकृत 3.05 करोड़ वयस्कों में से सरकार ने 2.27 करोड़ व्यस्कों को साक्षर प्रमाणित किया है। इस दावे को सत्यापित करने के लिए कोई स्वतंत्र मूल्यांकन उपलब्ध नहीं हैं।

 

बजट दस्तावेज़ के अनुसार,वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए, केंद्र सरकार ने साक्षर भारत के लिए 320 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। यह राशि 2016-17 के 244 करोड़ रुपए के बजट से 31.1 फीसदी ज्यादा है।

 

(शाह रिपोर्टर / एडिटर हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 29 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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