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मुंबई में टीबी से होने वाली मौत पर सरकार और एनजीओ के बीच आंकड़ों का विवाद

ब्रृंदा मरबनियैंग और स्वगाता यदवार,

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भारत के सबसे समृद्ध बृहन्मुंबई नगर निगम ने गैर-लाभकारी ‘प्रजा फाउंडेशन’ के टीबी से होने वाले मौत के आंकड़ों के मूल्यांकन से इनकार किया है। ‘प्रजा फाउंडेशन’ के अनुसार मुंबई में हर रोज 18 लोगों की मौत टीबी की वजह से होती है। ‘प्रजा फाउंडेशन’ का दावा है कि बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि उनका मूल्यांकन गलत है या नहीं क्योंकि बीएमसी के पास नए सॉफ्टवेयर आने के बाद भी मौत संबंधित आंकड़ों तक पहुंच नहीं है।

 

यह मूल्यांकन रिपोर्ट बृहन्मुंबई महानगर निगम (बीएमसी) से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिले आंकड़ों के आधार पर कुछ हफ्ते पहले जारी किया गया है। बीएमसी मूल्यकांन निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहती है कि आंकड़ों को ‘अवैज्ञानिक ढंग से ’ रखा गया है।

 

‘प्रजा फाउंडेशन’ ने आरोप लगाया है कि बीएमसी ने दिसंबर, 2015 में एक नए सॉफ्टवेयर को अपनाया है,जिसका डिजाइन ऐसा है कि बीएमसी खुद भी मृत्यु दर पर अपने स्वयं के डेटा को संशोधित नहीं कर सकता है और इससे यह जानने का कोई तरीका नहीं बचता है कि प्रजा फाउंडेशन का मूल्यांकन सही है या गलत।

 

क्या कहती है रिपोर्ट ?

 

अपने  ‘द स्टेट ऑफ हेल्थ इन मुंबई’ रिपोर्ट में ‘प्रजा फाउंडेशन’ ने कहा है कि 2016-17 में टीबी के कारण मुंबई में रहने वाले 6,472 लोगों की मृत्यु हुई। यानी हर रोज 18 लोगों की मौत इस बीमारी से हुई है। ये आंकड़े, मुंबई में टीबी मामलों की संख्या में 37 फीसदी की वृद्धि दर्शाते हैं। आंकड़े वर्ष 2012-13 में 36417 थे, जो बढ़ कर वर्ष 2016-17 में 50,001 हुए हैं।

 

मुंबई में टीबी के मामलों में 37 फीसदी वृद्धि

Source: Praja Foundation Report

NOTE: *calculated through predictive model

 

रिपोर्ट में शामिल आंकड़े सूचना के अधिकार के तहत नगर निगम , सरकारी अस्पतालों और दवाखानों से प्राप्त हुए जानकारी से संकलित किए गए हैं।

 

मृत्यु के कारणों पर आंकड़े दिसंबर, 2015 से उपलब्ध नहीं था। डेटा एनालिटिक्स कंपनी ‘हंस स्यूविटी सॉल्यूशंस’ के सहयोग से काम कर रहे ‘प्रजा फाउंडेशन’ ने भविष्य कहनेवाला मॉडल का उपयोग कर जनवरी, 2016 से मार्च 2017 तक मौत के कारणॆ को विस्तार से जानने की कोशिश की है। ‘प्रजा फाउंडेशन’ का दावा है कि यह मॉडल 95.5 फीसदी तक की सबसे सटीक परिणाम देता है।

 

टीबी डेटा अब केंद्रीय मंच पर है, लेकिन उपयोग नहीं किया जा सकता

 

दिसंबर, 2015 तक मृत्यु के कारणों की जानकारी सभी 24 बीएमसी वार्डों में ‘सिस्टम एप्लीकेशन प्रोटोकॉल’ (सैप) सॉफ्टवेयर के द्वारा उपलब्ध कराई जाती थी। लेकिन यह सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्थानीय रूप से प्रबंधित की जा रही है।

 

इसके बाद बीएमसी ‘सैप’ से केंद्र सरकार द्वारा संचालित ‘सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम’ (सीआरएस) में स्थानांतरित हो गया। इस सिस्टम का डिजाइन ऐसा है कि सभी 24 वार्डों के स्वास्थ्य के चिकित्सा अधिकारी मृत्यु दर डेटा का उपयोग करने में असमर्थ हैं।

 

बीएमसी के कार्यकारी स्वास्थ्य अधिकारी पद्मजा केसकर कहती हैं, “हमने दो महीने पहले इस डेटा तक पहुंच की अनुमति देने के लिए केंद्र सरकार को लिखा है। ”

 

‘प्रजा फाउंडेशन’ के कार्यक्रम निदेशक मिलिंद म्हस्के कहते हैं, “स्वास्थ्य के चिकित्सा अधिकारी, जो उप-पंजीयक हैं,  उन तक इस डेटा की पहुंच होनी चाहिए, क्योंकि वह वार्ड में पंजीकृत सभी मौतों और जन्मों के लिए जिम्मेदार है।

 

हालांकि, ‘सीआरएस’ प्रणाली को अपनाने के बाद, उनके पास डेटा तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है और इसे प्राप्त करने के लिए ‘सीआरएस’ के आईटी विभाग के साथ उनका कोई तालमेल नहीं है। ”

 

कम रोगियों का इलाज, कई टीबी कार्यक्रम असफल

 

टीबी के लिए मानक उपचार कार्यक्रम ‘डीओटीएस’ के माध्यम से इलाज किए जाने वाले टीबी मामलों की संख्या चार वर्षों में 50 फीसदी कम हुई है। यह आंकड़े वर्ष 2012 में 30,828 से कम हो कर वर्ष 2016 में 15,767 हुए हैं।

 

इसके साथ ही, डीओटीएस केंद्रों में डिफॉल्टरों (जिन रोगियों के टीबी के इलाज में दो महीने से अधिक समय तक बाधित रहे थे) का प्रतिशत 2012 में 9 फीसदी से बढ़कर 2016 में 19 फीसदी हुआ है। बावजूद इसके कि सरकार ” टीबी हारेगा, देश जीतेगा” जैसे अभियान को काफी बढ़ावा दे रही है।

 

वार्ड के हिसाब से टीबी मामलों की संख्या का संकलन करने से पता चलता है कि वर्ष 2012-13 से वर्ष 2016-17 तक टीबी के रोगियों की संख्या एल वार्ड (कुर्ला) में सबसे अधिक थी। यहां 1,254 टीबी के मरीज थे।

 

रिपोर्ट में विभिन्न स्रोतों द्वारा प्राप्त टीबी से होने वाली मौतों की संख्या में एक विसंगति का पता चलता है। बीएमसी के टीबी नियंत्रण युनिट ने वर्ष 2015 में 1,459 मौतों की सूचना दी है, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने 5,680 मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए। इसमें वर्ष 2016 में 24 वार्डों में मृत्यु का कारण दर्ज किया गया था। इसका मतलब है कि नगर निगम, निजी क्षेत्र और अन्य स्रोतों जैसे ट्रस्ट अस्पतालों से डेटा नहीं मिल पा रहा है। यब तब है, जब 75 फीसदी रोगी निजी उपचार पसंद करते हैं।

 

अन्य स्रोत से सूचित किए गए टीबी के मामले

Source: Praja Foundation Report,

NOTE: *calculated through predictive model

 

प्रजा फाउंडेशन को बीएमसी का लिखित उत्तर

 

बीएमसी ने फाउंडेशन को इसके निष्कर्षों का खंडन करने के लिए पत्र लिखा है।

 

बृहन्मुंबई नगर निगम के कार्यकारी स्वास्थ्य अधिकारी, डॉ. पद्मजा केसकर और सार्वजनिक स्वास्थ्य, उप महानिदेशक आयुक्त सुनील धामने ने ‘प्रजा फाउंडेशन’ के संस्थापक नीताई मेहता को 13 जुलाई को लिखा कि, “….परिणामों की व्याख्या कार्यक्रम के ज्ञान और क्षेत्र की स्थिति और वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने के आधार पर होना चाहिए। लगता है कि आपने विभिन्न स्वास्थ्य सुविधाओं से डेटा का  बेतरतीब संग्रह किया है और उसे जोड़ दिया है। डेटा संदिग्ध है। ”

 

17 जुलाई को बीएमसी को वापस लिखे एक पत्र में ‘प्रजा फाउंडेशन’ ने कहा कि विभिन्न स्वास्थ्य सुविधाओं से आंकड़ों को वैज्ञानिक प्रारूपों में एकत्र किया है क्योंकि अपने पिछले अनुभव में देखा है कि “जब भी हमने एक केंद्रीय विभाग को डेटा / सूचना के लिए आवेदन किया है, हमें हमेशा सूचना के लिए स्थानीय इकाइयों तक जाने की सलाह दी जाती रही है।”

 

फाउंडेशन ने सुझाव दिया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को विभिन्न रोगों और बीमारियों, मृत्यु के कारणों और इसी तरह के डेटा के लिए वार्षिक सांख्यिकीय स्वास्थ्य रिपोर्ट जारी करनी चाहिए।

 

टीबी को लेकर परामर्शदाताओं की चिंता गहरी नहीं

 

टीबी और बढ़ती मौतों के व्यापक प्रसार के बावजूद, ‘प्रजा फाउंडेशन’ की रिपोर्ट कहती है कि, मुंबई के नगर पालिका ने पिछले पांच वर्षों के दौरान अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्रों और घरों में कब्रिस्तान के नामकरण या नाम बदलने के बारे में 68 प्रश्न पूछे हैं, जबकि टीबी के बारे में 45 प्रश्न पूछे गए हैं।

 

“जोगेश्वरी ट्रामा अस्पताल के नाम से संबंधित पांच प्रश्न पूछे गए थे।  नगर निगमों ने पहले हिंदु हृदय स्म्राट शिवसेना प्रमुख माननीय श्री बालासाहेब ठाकरे ट्रामा अस्पताल का नाम सुझाया और बाद में  अन्य नगरसेवकों ने कई प्रश्नों से ‘शिवसेना प्रमुख’ शब्द हटाने की मांग रखी, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने 15 जुलाई, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता है। इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं। मरबनियैंग इंडियास्पेंड के साथ इंटर्न हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 26 जुलाई 17 को indiaspend.com  पर प्रकाशित हुआ है।

 

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