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मेक इन मोजाम्बिक: मोदी के दौरे का असली कारण

अभिषेक वाघमारे,

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यहां की आबादी पंजाब की आबादी के बाराबर है और यहां के लोग तीन गुना अधिक गरीब हैं। लेकिन 34 वर्षों में मोजाम्बिक की यात्रा करने वाले नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री बने हैं क्योंकि आर्थिक रुप से कमज़ोर दक्षिण अफ्रीकी देश के पास कुछ ऐसा है जिसे हर भारतीय चाहता है।

 

दाल।

 

भारत – 22 फीसदी वैश्विक उत्पादन के साथ विश्व का सबसे बड़ा दालों का उत्पादक – ने 2016-17 में मोजांबिक से दालों की 100,000 टन आयात करने के लिए एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किया है, 2020-21 से इसे दोगुना कर 2 लाख टन तक किया जाएगा। फिर भी 2015-16 के आयात के 2 फीसदी और भारतीय खेतों में उपजने वाले 0.5 फीसदी से अधिक नहीं है।

 

लेकिन हर टन मायने रखता है,जैसा कि 60 देशों से होने वाले आयात संकेत देते हैं।

 

एक महत्वपूर्ण प्रमुख भोजन और पोषण का स्रोत, आधी सदी से हर भारतीय के लिए उपलब्ध दालों में 3 किलो से अधिक गिरावट हुई है। दो वर्षों से विफल मानसून, अपर्याप्त सिंचाई, और त्रुटिपूर्ण , अधिक विनियमित विपणन – किसान और उपभोक्ता के बीच कीमतों की 50 फीसदी वृद्धि – के साथ भारत में दालों का उत्पादन , छह साल में निचले स्तर पर है, जो दालों की कमी और बढ़ती कीमतों की ओर इशारा करता है।

 

पहली बार, 2015-16 में दालों का आयात 4 बिलियन डॉलर तक पहुंचा है, जो मांग का एक चौथाई है और भारत के आयात बिल के 1 फीसदी से अधिक है।

 

दालें: सभी आयात का 1 फीसदी

Source: Export Import Data Bank, Ministry of Commerce, Government of India.

 

2015-16 में, भारत ने दालों का एक रिकार्ड 58 लाख टन का आयात किया है, दो वर्ष पहले से 80 फीसदी अधिक है।

 

दालों का आयात : 15 वर्षों के दौरान (मिलियन टन)

Source: Export Import Data Bank, Ministry of Commerce, Government of India (figures in tonnes).

Note: The figures for 2015-16 from Commerce ministry and the Press Information Bureau do not match. The PIB’s data are used for the year 2015-16; while 15-year data in this chart are from the commerce ministry.

 

लेकिन पिछले दो वर्षों में आयात में वृद्धि क्यों हुई है, जबकि 2010 में समाप्त हुए दशक में वे स्थिर रहे हैं (हर वर्ष 2.5 से 3 मिलियन टन के बीच) ?

 

जवाब है : 2010 में समाप्त हुए दशक के लिए दालों के उत्पादन में वृद्धि हुई है, आयात स्थिर है, लेकिन दो वर्ष के सूखे (2014 और 2015) ने सब बदल दिया है।

 

जैसा कि भारतीय अधिक दालें खाते हैं और उत्पादन में गिरावट से कीमतों में वृद्धि होती रहती है।

 

भारतीय चाहते हैं अधिक दाल, लेकिन उपज दुनिया में सबसे कम

 

दालें, अनाज फलियां के रुप में भी जाने जाते हैं, 12 फसलों का एक सेट – दाल से चने तक – जो पोषण में उच्च होते हैं, विशेष रूप से बढ़ती आय के साथ विकासशील देशों जैसे भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

 

लेकिन बढ़ती मांग और गिरते उत्पादन के साथ दालों की कीमतों में वृद्धि हो रही है। आयात खाई को भरने का काम करते हैं।

 

2015 के अंत तक , अरहर की दाल का खुदरा मूल्य प्रति किलो 230 रुपए तक पहुंचा है, 90 रुपए / किलो से 150 फीसदी ऊपर; आज की तारीख में यह 160 से 180 रुपए किलो के बीच है।

 

कई और कारण इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2016 में विस्तार से बताया है।

 

दस महीने में कुछ बदलाव नहीं हुआ है, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि उभरती दुनिया में भारत की दालों की उत्पादकता सबसे कम है। यहां तक कि गरीब म्यांमार भी प्रति हेक्टर दोगुना उपजाता है, मिस्र में चार गुना अधिक उत्पादन होता है। उपज के बावजूद, उत्पादन में गिरावट हो रही है।

 

छह वर्षों में दालों का उत्पादन सबसे कम

Source: Third Advance Estimate of Production, Department of Agriculture and Cooperation; Indian Institute of Pulses Research.

 

आधार रेखा यह है कि, जो दाल आप खाते हैं, उसकी कीमतों में 250 फीसदी की वृद्धि हुई है (महाराष्ट्र में 2015 तक पांच वर्ष के दौरान), जिससे किसान और आयातक लाभान्वित हुए हैं।

 

क्यों सुकेश कोडे को सरकार द्वारा निर्धारित कीमतों से दोगुना मिला है

 

लातूर के शुष्क दक्षिणी महाराष्ट्र जिले में, 32 वर्षीय सुकेश कोडे बेखबर है कि 2015 की तुलना में इस वर्ष उसके 17 एकड़ असिंचित खेत में से चार एकड़ जमीन पर अरहर के उत्पादन में गिरावट हुई है, 42 क्विंटल से गिर कर 38 क्विंटल हुआ है।

 

आखिरकार, मार्च 2016 में एक वर्ष के दौरान 125 फीसदी के रिटर्न के साथ, उन 38 क्विंटल के लिए उसकी कमाई दोगुनी हुई है, ऐसी ही स्थिति राष्ट्रव्यापी नजर आती है।

 

पिछले तीन वर्षों में (2013 से 2015) कोडे को अरहर दाल के प्रति किलो के लिए 45 रुपए मिले हैं। मार्च 2015 में, लातूर कृषि उत्पाद बाजार में में प्रति किलो अरहर दाल के लिए उसे 102 रुपए मिले हैं।

 

अशोक बधिया, वाशी कृषि मुंबई में बाजार का उत्पादन में 50 वर्षों से दालों के एक थोक व्यापारी कहते हैं, 2013 में रिकार्ड दालों का उत्पादन, 2014 में सूखे के प्रभाव को कम किया है, जब ज्यादातर किसानों को प्रति किलो दाल के लिए 32 से 35 रुपए का भुगतान किया गया है, जोकि सरकार द्वार निर्धारित 40 रुपये प्रति किलो के न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे है।

 

बधिया कहते हैं, “2016 में प्रवाह बदल गया है।” आपूर्ति में गिरावट हुई है।

 

इस प्रकार, कोडे, दाल किसान, मार्च 2016 में प्रति किलो अरहर दाल के लिए 102 रुपए मिले हैं, जोकि सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मूल्य से दोगुना है।

 

किसानों से आप तक: कीमत में 50 फीसदी की वृद्धि

 

थोक व्यापारी बधिया कहते हैं, इस साल अप्रैल में, किसानों से प्रति किलो दाल के लिए 102 रुपए का भुगतान किया है। बुधिया से यह दाल अब पीयुष वोरा जैसे खुदरा बिक्रेता तक पहुंचता है। वोरा मध्य मुंबई के लालबाग के पास 250 वर्ग फुट किराने की दुकान के मालिक है।

 

वोरा ने इस वर्ष, 130 रुपए प्रति किलो दाल खरीदा है और 150 रुपए प्रति किलो (अप्रैल 2016) बेचा है। उन्होंने अरहर दाल 205 रुपए प्रति किलो खरीदा और नवंबर 2015 में चरम पर 230 रुपए प्रति किलो बेचा है।

 

वोरा कहते हैं, पिछले वर्ष जब कीमत में वृद्धि हुई थी, तब उपभक्ताओं के तत्काल प्रतिक्रिया थी कि दाल कम खरीदो।

 

वह कहते हैं कि, “कुछ हफ़्ते में, वे इसके आदि हो गए। न तो वहाँ दाल की बिक्री में गिरावट आई है और न ही हमारे लाभ मार्जिन में।” दलहन भारतीय आहार का ऐसा हिस्सा है कि मध्यम वर्ग परिवार इसे खरीदेगा ही और अन्य चीज़ों में कटौती करेगा। गरीबों के पास कम दालों खाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जैसा कि द हिंदू के इस संपादकीय में विस्तार से बताया गया है।

 

अच्छे मानसून, सामान्य रुप से, कीमतो को स्थिर रखता है खराब मानसून से आयात और कीमतों में वृद्धि होती है, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट से स्पष्ट होता है।

 

लगातार मानसून विफलताओं ने दलहन को बनाया महंगा

 

किसानों को अधिक दालें उपजाने के लिए प्रोत्साहित करने और कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार ने 2016-17 की गर्मियों की फसल के लिए, दालों की न्यूनतम समर्थन मूल्य में प्रति किलो 50 रुपए से अधिक वृद्धि की है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8 फीसदी अधिक है।

 

5 जुलाई, 2016 को महाराष्ट्र सरकार से गरीब परिवारों को प्रति महीने, प्रति किलो 120 रुपए की रियायती दर पर (करीब 180 रुपये प्रति किलो एक खुदरा मूल्य के खिलाफ) बेचने का निर्णय किया है।

 

लेकिन यह अस्थायी उपाय हैं। अनिशचित सिंचाई और अधिक दाल उपजाने के लिए अनिच्छुक किसानों के साथ भारत का मोजाम्बिक में रुचि जारी रहेगी।

 

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 18 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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