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‘मौत गुणवत्ता सूचकांक’ में भारत 67वें स्थान पर

चैतन्य मल्लापुर,

L.D. Chopra

 

80 देशों के ‘मौत गुणवत्ता सूचकांक ’ 2015, में भारत को 67वें स्थान पर रखा गया है। गौरतलब है कि भारत का स्थान दक्षिण अफ्रीका (34 ), ब्राजील (42 ), रूस (48 ), इंडोनेशिया (53) और श्रीलंका (65 ) की तुलना में नीचे है जबकि चीन ( 71 ) से उपर है।

 

अर्थशास्त्री खुफिया इकाई द्वारा परिकलित इस सूचकांक के मुताबिक ब्रिटेन के लोगों को जीवन के अंतकाल में सबसे अच्छी देखभाल मिलती है।

 

हालांकि की इस मामले में भारत की स्थिति, 2010 की सूचकांक की तुलना में काफी बेहतर हुई है। 40 देशों के 2010 के सूचकांक में भारत सबसे निचले स्थान पर था।

 

श्री राजगोपाल , नीति के लिए केंद्र सहयोग विश्व स्वास्थ्य संगठन के निदेशक एवं पैलियम इंडिया (एक राष्ट्रीय पंजीकृत चैरिटेबल ट्रस्ट जो दर्द से राहत और प्रशामक उपचार पर काम करती है ) के संस्थापक एवं चेयरमैन के अनुसार “भारत की आबादी के 1 फीसदी से भी कम लोगों की पहुंच दर्द से राहत एवं प्रशामक उपचार तक है। ”

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रशामक उपचार एक दृष्टिकोण है जो जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे रोगियों एवं उनके परिवार के जीवन गुणवत्ता में सुधार लाती है।

 

मौत गुणवत्ता सूचकांक, 2010 के अनुसार, दक्षिणी राज्यों में केवल केरल की स्थिति बेहतर है। देश के केवल 3 फीसदी जनसंख्या के साथ केरल भारत की दो-तिहाई उपशामक देखभाल सेवाएं प्रदान करती है।

 

2015 सूचकांक में 80 देशों के पाँच श्रेणियों में 20 मात्रात्मक और गुणात्मक संकेतक का उपयोग कर मूल्यांकन किया गया है – उपशामक और स्वास्थ्य पर्यावरण , मानव संसाधन, देखभाल पाने की क्षमता , देखभाल की गुणवत्ता और समुदाय अनुबंध का स्तर।

 

रिपोर्ट से पता चलता है कि अमीर देश उच्च स्थान पर रहते हैं। ब्रिटेन की सफलता का ज़िम्मेदार वहां की प्रभावी राष्ट्रीय नीतियां, एक मजबूत धर्मशाला आंदोलन एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में उपशामक देखभाल की और व्यापक एकीकरण  हैं।

 

सूचकांक में ऑस्ट्रेलिया दूसरे,  न्यूजीलैंड तीसरे,  आयरलैंड चौथे एवं बेल्जियम पांचवें स्थान पर है।

 

ताइवान (6), सिंगापुर (12), जापान (14) और दक्षिण कोरिया (18) ऐसे अमीर एशिया – प्रशांत देश हैं जिनका स्थान टॉप 20 देशों में है।

 

चीन 71वें स्थान, यानि भारत से चार स्थान नीचे है।

 
मौत गुणवत्ता सूचकांक – टॉप 10 देश
 

 

सूचकांक में शामिल टॉप 10 देश उच्च आय वाले देश हैं जो आय और उपशामक देखभाल सेवाओं के बीच मजबूत कड़ी होने का संकेत देते हैं। हर साल, दुनिया भर में करीब 20 मिलियन लोगों को जीवन के अंत काल में उपशामक सेवा की आवश्यकता होती है, इनमें से 6 फीसदी बच्चे होते हैं।

 
विभिन्न संकेतकों पर भारत का स्थान / स्कोर
 

 

उपशामक और स्वास्थ्य वातावरण मामले में भारत 51वें स्थान पर है जबकि उपशामक देखभाल के लिए मानव संसाधन की उपलब्धता के संबंध में भारत का स्थान 67वां है। देखभाल वहन करने की क्षमता में भारत 74वें स्थान पर है।

 

दर्द से राहत दिलाने वाले ओपिअड, 80 में से केवल 33 देशों में आसानी से उपलब्ध है। कई देशों में कानूनी प्रतिबंध , प्रशिक्षण और जागरूकता की कमी के कारण ओपिअड की पहुंच आसान बनाने में बाधा होती है।

 

भारत में कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे करीब एक मिलियन लोग एवं अन्य लाईलाज बीमारी से जूझ रहे अनगिनत लोगों को दर्द से राहत के लिए ओपिअड की आवश्यकता है। दर्द से निपटने के लिए केवल मॉर्फीन ( ओरल ओपिअड ) उपलब्ध है।

 

नारकोटिक ड्रग और सायकोट्रपिक सब्सटांस अधिनियम, 1985 के तहत सख्त नियामक कानून के कारण भारत में ओपिअड की पहुंच आसान नहीं है।

 

अधिनियम में 2014 में हुए संशोधन से ओपिअड की पहुंच कुछ आसान हुई है।

 

यदि दर्द से पीड़ित किसी व्यक्ति को एक दिन में 100 मिलीग्राम ओरल मॉर्फीन की आवश्यकता है तो केवल कैंसर से पीड़ित एक मिलियन लोगों के लिए सालाना 36,500 किलोग्राम मॉर्फीन की आवश्यकता होगी।
 
भारत में मॉर्फीन की बिक्री, 1998-2014
 

 

सरकारी कारखानों द्वारा 2000 और 2004 के बीच भारत में मॉर्फीन की बिक्री की औसत वार्षिक मात्रा 142.32 किलो थी जो कि अनुमानित आवश्यकता का 0.4 फीसदी था।

 

सरकार की अफीम और उपक्षार कारखानों से बेचा गया मॉर्फीन लवण की मात्रा को मापने से ही मॉर्फीन की खपत मापी जा सकती है। क्योंकि इस रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने मॉर्फीन खपत आँकड़ों की रिपोर्टिंग बंद कर दी है।

 

केरल मॉडल है बेहतर

 

केरल में चलाए गए एक कार्यक्रम, प्रशामक देखभाल में पड़ोस नेटवर्क, समुदाय में आवश्यकता आधारित प्रयोगों की एक श्रृंखला पर विकसित परियोजना है ।

यह पहल अब एक समय में 15,000 रोगियों की देखभाल करने वाला, 500 से अधिक सामुदायिक स्वामित्व वाली उपशामक देखभाल कार्यक्रमों का एक विशाल नेटवर्क बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रशामक देखभाल के ग्लोबल एटलस के 2014 की रिपोर्ट के अनुसार इसके श्रम बल में करीब 15,000 से अधिक प्रशिक्षित समुदाय स्वयंसेवक, 50 उपशामक देखभाल चिकित्सक, 100 उपशामक देखभाल नर्सें शामिल हैं।

 

वर्ष 2014 के अंत तक केरल के 170 संस्था के पास ओरल मोर्फीन भंडार था।

 

2015 की मौत गुणवत्ता सूचकांक की रिपोर्ट में नीति में बच्चों के उपशामक देखभाल एवं देखभाल के लिए पैसे निवारक को शामिल करने के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा चलाए गए एक पहल का उल्लेख भी किया गया है ।

 

पिछले साल नासिक के महाराष्ट्र स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय ने घोषणा की थी कि उपशामक देखभाल बाल रोग के लिए पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में शामिल किया जाएगा।

 

( मल्लापुर इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 21 अक्टूबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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