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राजस्थान में सीखने के स्तर में गिरावट, मध्याह्न भोजन कम, महिला साक्षरता दर काफी नीचे

खुशबू बलानी,

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हाल ही में राजस्थान ने सरकारी स्कूलों में छात्रों के सीखने के स्तर में सुधार करने के लिए टाटा ट्रस्ट  और एक वैश्विक गैर लाभकारी संस्था खान अकादमी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किया है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि देश में सबसे कम साक्षरता दर के मामले में राजस्थान चौथे स्थान पर है।

 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राजस्थान की कुल साक्षरता 67 फीसदी और देश के सबसे कम महिला साक्षरता दर करीब 52.66 फीसदी  दर्ज की गई है। राजस्थान की कुल साक्षरता दर कैमरून, मिस्र और घाना जैसे देशों से भी कम है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में महिला साक्षरता दर अरब देशों और “संघर्ष से प्रभावित” देशों के औसत से भी बद्तर है।

 

राजस्थान सबसे ज्यादा आबादी वाला भारत का सातंवा राज्य है। राजस्थान की आबादी 6.85 करोड़ है और 24 फीसदी लोगों की आयु 6 से 14 वर्ष के बीच है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के संख्या भी ज्यादा है। करीब 5 फीसदी।

 

राजस्थान के शिक्षा संकेतक

 

इस लेख श्रृंखला के पहले भाग में हमने बताया है कि वर्ष 2020 तक विश्व भर में भारत की कामकाजी आबादी सबसे ज्यादा होगी, करीब 86.9 करोड़, लेकिन चार राज्यों में साक्षरता, स्कूल में नामांकन, सीखने के परिणामों, और शिक्षा के खर्च के संकेतक पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि युवा आबादी को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए भारत तैयार नहीं है। हम बता दें कि चार राज्यों में 5 से 14 वर्ष की उम्र के बीच भारत में स्कूल जाने का प्रतिशत 43.6 फीसदी है।

 

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों के दौरान राजस्थान की कुल साक्षरता दर में 6.6 प्रतिशत अंक का सुधार हुआ है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 9.2 प्रतिशत अंक का सुधार पाया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर साक्षरता दर 64.8 फीसदी से 74.04 फीसदी हुआ है।

 

सीखने के स्तर में गिरावट से सरकारी स्कूल नामांकन में भी गिरावट

 

राज्य के प्राथमिक स्तर पर छात्र शिक्षक अनुपात 17,  उच्च प्राथमिक स्तर पर 10 है। प्राथमिक स्कूल स्तर पर कक्षा-शिक्षक अनुपात 21 है, जो राष्ट्रीय औसत से बेहतर हैं। फिर भी लेकिन सीखने के नतीजे में सुधार नहीं हुआ है

 

वर्ष 2014 शिक्षा पर वार्षिक स्थिति के रिपोर्ट (एएसईआर) के अनुसार, ग्रामीण राजस्थान में सरकारी और निजी स्कूलों, दोनों में कक्षा 2 से 5 के बीच के छात्रों में पढ़ने और गणित के स्तर में गिरावट हुई है।

 

सरकारी स्कूलों में, कक्षा 2 के ऐसे बच्चे जो कम से कम अक्षर पढ़ सकते हैं, उनके प्रतिशत में गिरावट हुई है। इस संबंध में वर्ष 2010 में ये आंकड़े 80.5 फीसदी थे, जो वर्ष 2014 में गिर कर 56.2 फीसदी हुए हैं। वर्ष 2010 में निजी स्कूलों में यह प्रतिशत 93.8 फीसदी था। वर्ष 2014 में यह गिरकर 81.5 फीसदी हुआ है।

 

राजस्थान में कक्षा 5 के ऐसे छात्र, जो कम से कम शब्द पढ़ सकते हैं, उनके प्रतिशत में भी गिरावट हुई है। वर्ष 2007 में ऐसे छात्रों के आंकड़े 51 फीसदी थे, जो वर्ष 2014 में गिरकर 27 फीसदी हो गए। एएसईआर के आंकड़ों के मुताबिक इसी अवधि में निजी स्कूलों में पढ़ने का स्तर 78 फीसदी से घटकर 64 फीसदी हुआ है।

 

राजस्थान के सरकारी स्कूलों में सीखने का स्तर, वर्ष 2007 – 2014

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Source: ASER Trends over Time Report (2006-14)

 

ग्रामीण सरकारी स्कूलों में नामांकन में लगातार गिरावट देखी गई है, जो निजी स्कूल नामांकन में वृद्धि से आंशिक रूप से मेल खाते हैं। वर्ष 2014 में 6 से 14 वर्ष के आयु के कम से कम 42 फीसदी बच्चों ने निजी स्कूलों में दाखिला लिया है। वर्ष 2006 में यही आंकड़े 25 फीसदी थे। एएसईआर – टाइम की रिपोर्ट पर रुझान के अनुसार, सरकारी स्कूलों में नामांकन वर्ष 2006 में 63.6 फीसदी से गिरकर वर्ष 2014 में 52.2 फीसदी हुआ है।

 

एएसईआर के एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2010 में एआसईआर के स्वयंसेवकों द्वारा कक्षा में उपस्थिति रजिस्टर को देखे जाने के आधार पर सार्वजनिक और निजी स्कूलों में कक्षा 1 में औसत उपस्थिति 65.9 फीसदी थी। एएसईआर टीम के दो दिनों के स्कूलों का दौरा किए जाने के गणना के आधार पर नियमित शिक्षक उपस्थिति 72.55 फीसदी थी।

 

सीखने के स्तर में गिरावट वर्ष 2010 से वर्ष 2014 के बीच मामूली बदलाव का संकेत दे सकते हैं। इसी अवधि के दौरान हाल ही में एएसईआर द्वारा सर्वेक्षण आयोजित किया गया है।(एएसईआर 2016 सर्वेक्षण के परिणाम 18 जनवरी, 2017 को जारी होने के लिए तैयार हैं।)

 

हम बता दें कि राजस्थान के छह जिलों में लिंग और सामाजिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बगैर नवीन शिक्षण प्रणाली के साथ औसत स्कोर में वृद्धि हुई है। आंकड़ों में देखें तो हिंदी में 45 फीसदी, अंग्रेजी में 26 फीसदी और गणित में 44 फीसदी, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2016 में विस्तार से बताया है।

 

राजस्थान में ऐसी महिलाओं की संख्या ज्यादा, जो कभी नहीं गई स्कूल, स्कूल न जाने वाले बच्चों की भी संख्या ज्यादा

 

वर्ष 2015 डिजिटल जेंडर एटलस फॉर एडवांसिंग गर्ल्स एडुकेशन के अनुसार, राजस्थान में, वर्ष 2013-14 में प्राथमिक स्तर पर बच्चों के स्कूल छोड़ने का आंकड़े 5 फीसदी थे। कभी स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों के आंकड़े 18 फीसदी थे। जबकि स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के आंकड़े 27 फीसदी थे। 3 फीसदी लड़कों  की तुलना में  7 फीसदी  लड़कियों ने स्कूल छोड़ा है।

 

‘रिव्यू ऑफ डेवलपमेंट इकॉनॉमिक’ में प्रकाशित वर्ष 2001 के इस पेपर के अनुसार, माता-पिता की शिक्षा का प्रभाव बच्चों की स्कूली शिक्षा पर पड़ता है। स्कूल नामांकन में सुधार के लिए माता-पिता का शिक्षित होना जरुरी है। एएसईआर 2014 के अनुसार, राजस्थान में स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं करने वाली माताओं की संख्या सबसे ज्यादा है, करीब 69.7 फीसदी।

 

माता-पिता की शिक्षा के अलावा एक और कारक सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति को प्रभावित कर सकता है । वह है सुचारू रूप से चलने वाला मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम। वर्ष 2016 के इस अध्ययन के अनुसार, लगातार मिलने वाले मध्यान्ह भोजन का  स्कोर में योगदान होता है। एक वर्ष के लिए मध्यान्ह भोजन मिलने वाले बच्चों की तुलना में पांच साल तक मध्यान्ह भोजन मिलने से बच्चों की पढ़ने के स्कोर में 18 फीसदी का सुधार हुआ है। जबकि गणित परीक्षण स्कोर में 9 फीसदी का सुधार देखा गया है।

 

एएसईआर-2014 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 में जब एएसईआर की टीम ने राजस्थान के स्कूल का दौरा किया, तब दोपहर के भोजन की सेवा में कमी देखी गई।

 

सरकारी स्कूलों में वर्ष 2010 में मध्यान्ह भोजन की सुविधा 94.8 फीसदी थी, जो गिरकर  वर्ष 2014 में 82.7 फीसदी हो गया। हालांकि, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता (जैसे कि रसोई घर) वर्ष 2010 में 83.8 फीसदी थी तो बढ़ कर वर्ष  2014 में 89.8 फीसदी देखी गई।

 

राजस्थान के छात्रों के लिए स्कूलों तक पहुंच भी कम है। ‘डिजिटल जेंडर एटलस’ में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013-14 में हर मौसम में सड़कों द्वारा प्राथमिक विद्यालयों तक पहुंच के संबंध में 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राजस्थान 31वें स्थान पर था। हर मौसम में सड़कों द्वारा केवल 76.5 फीसदी प्राथमिक विद्यालयों की पहुंच थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 89 फीसदी था।

 

लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, देश भर के सरकारी स्कूलों में 60 लाख शिक्षण पदों में से 900,000 प्राथमिक विद्यालय और 100,000 माध्यमिक स्कूलों में शिक्षण पद (दोनों मिलाकर 10 लाख) रिक्त हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 में विस्तार से बताया है। राजस्थान के सरकारी स्कूलों के सभी प्राथमिक शिक्षण पदों में से करीब 13.2 फीसदी (लगभग 37,500) रिक्त हैं।

 
इंडिया स्पेंड की ओर से पांच भागों वाली श्रृंखला का यह अंतिम लेख है। इस श्रृंखला में हमने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति पर चर्चा की है। पहले के लेख आप यहां एक, दो, तीन और चार पढ़ सकते हैं।
 

(बलानी स्वतंत्र लेखक हैं और मुंबई में रहती हैं। बलानी की दिलचस्पी विकास के विभिन्न मुद्दों में है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 11 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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