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राज्य के फंड में 55% वृद्धि, लेकिन राज्य नहीं हैं तैयार

सौम्या तिवारी,

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वर्ष 2015-16 में, बिना किसी शर्तों के दिल्ली से भारत के राज्यों तक स्थानांतरित होने वाली कर राशि में 55 फीसदी की वृद्धि हुई है – केंद्रिय नियंत्रण के 68 वर्ष की परंपरा तोड़ते हुए – लेकिन एक नए पेपर के अनुसार, शुरुआती संकेतों से पता चलता है कि राज्य 5.24 लाख करोड़ रुपए (831.7 बिलियन डॉलर) के लिए तैयार नहीं थे।

 

पैसों का यह प्रवाह “हस्तांतरण” का एक परिणाम है – दिसंबर 2014 में की गई एक सिफारिश एवं पिछले साल के बजट में लागू किया गया – राज्यों के लिए राजस्व संबंधी ज़िम्मेदारियां संचलन करने की प्रक्रिया है। पहले यह राशि, लागू शर्तों के साथ राज्यों द्वारा “केंद्र प्रायोजित योजनाओं” पर खर्च किया जाता था।

 

करों द्वारा उत्पन्न राशि के बिना शर्त हस्तांतरण से – आधिकारिक भाषा में “अनटाइड फंड” – योजना बजट के तहत सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों, विशेष कर शिक्षा, कृषि, और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के केन्द्रीय धन में 19 फीसदी की कटौती हुई है। हस्तांतरण, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा किया गया वादा है, जैसा कि पिछले साल इंडियस्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया था। राज्यों द्वारा खर्च में मामूली वृद्धि होने जैसी कुछ चेतावनी भी दी गई थी।

 

अब यह साफ प्रतीत होता है कि, कटौती के संदर्भ में, यह चेतावनी अपरिपक्व थी। हालांकि की कई राज्य राशि संभालने के लिए तैयार नहीं हैं, एवं स्वास्थ्य कार्यक्रमों के केन्द्रीय धन की वापसी से कुछ गरीब राज्यों की सबसे अधिक प्रभावित होते दिखाई देते हैं।

 

एकाउंटिब्लीटी इनिशिएटिव, एक थिंक टैंक, द्वारा वित्तीय वर्ष 2015-16 में सामाजिक क्षेत्र में व्यय पर हाल ही में प्रकाशित पेपर के अनुसार, “अटाइड फंड में वृद्धि के बावजूद, राज्यों का अभी तक, निवेश के पैटर्न को बदलने के लिए, पाए गए नए स्वायत्तता को दर्शाने वाले बजट का पुनर्गठन करने के लिए गंभीर प्रयास का प्रदर्शन बाकि है। 14 वीं एफसी (14 वें वित्तीय आयोग जिसने हस्तांतरण की सिफारिश की है) एक विवर्तनिक परिवर्तन है या खोया हुआ मौका है? यह तो वक्त ही बताएगा।”

 

राज्य किस प्रकार 5.24 लाख करोड़ रुपए का संचलन करते हैं, इसका विश्लेषण करने के लिए 2016-17 तक का समय लगेगा। कुछ राज्यों ने केंद्र के हस्तांतरण स्वीकार करने से पहले ही अपने बजट को पारित कर दिया था जबकि अन्य राज्यों ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए पर्याप्त पैसा नहीं प्रदान नहीं किया है क्योंकि बदले हुए खर्च के बंटवारे के दिशा-निर्देशों के बाद में जारी किए गए थे।

 

राज्यों को बिना शर्त स्थानान्तरण में 55% की वृद्धि

 

“अनटाइड” स्थानान्तरण में 55 फीसदी की वृद्धि हुई है, कर हस्तांतरण के रूप में 2014-15 में 3.38 लाख करोड़ रुपए से 2015-16 में 5.24 लाख करोड़ रुपए हुए हैं। यह आंकड़े अक्टूबर- नवंबर 2015 में जारी किए गए बजट के संशोधित अनुमान (आरई) में दर्ज की गई है। आय अनुमानों का उपयोग कर बजट तैयार किया गया है, जो वास्तविक प्राप्त कर के हिसाब के लिए आमतौर पर छह महीने के बाद संशोधित किया जाता है।

 

बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु (जहां मामूली वृद्धि हुई) के सिवाय अधिकांश राज्यों में सामाजिक-क्षेत्र व्यय में काफी वृद्धि हुई है।

 

सबसे अधिक वृद्धि छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र में हुई है। एकाउंटिब्लीटी इनिशिएटिव द्वारा बजट अनुमानों (बीई) पर किए गए विश्लेषण के अनुसार, इन सभी सामाजिक क्षेत्र व्यय में 25 फीसदी से भी अधिक वृद्धि हुई है। लेकिन सभी राज्यों में खर्चों में वृद्धि नहीं देखी गई है।

 

कई राज्यों में सामाजिक क्षेत्र के वित्त पोषण में गिरावट क्यों देखी गई है?

 

एकाउंटिब्लीटी इनिशिएटिव के अनुसार, हालांकि राज्यों द्वारा सामाजिक क्षेत्रों पर कुल खर्चों में वृद्धि हुई है लेकिन प्रतिशत के रुप में कुल खर्च के विश्लेषण से पता चलता है कि इस संबंध में कई राज्यों में गिरावट हुई है।

 

अनटाइड फंड में वृद्धि होने के बावजूद, सामाजिक क्षेत्र में खर्च का एक महत्वपूर्ण भाग, भागों में केन्द्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) के माध्यम से होना जारी है क्योंकि 30 सीएसएस की स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) और एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) सहित 17 कोर योजनाओं के लिए फंड बंटवारा बदला गया है।

 

राज्यों में सामाजिक क्षेत्र व्यय में बदलाव

 

 

इससे पहले सीएसएस के माध्यम से सामाजिक कल्याण पर खर्चों का बोझ केंद्र सरकार उठाती थी एवं 75 फीसदी से अधिक राशि प्रदान करती थी। दिल्ली की हिस्सेदारी अब गिर कर 60 फीसदी तक आ गई है। राज्य, सीएसएस के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रदान की गई अनटाइड संसाधनों से संयोजन कर राशि आवंटन करती है। केंद्र सरकार द्वारा सामाजिक क्षेत्र के खर्च को बांधा गया है ताकि अन्य चीज़ों पर खर्च न किया जाए।

 
 
13 राज्यों में से नौ राज्यों को मिली कम राशि, 13 राज्यों को विश्लेषण से बाहर रखा गया    
 

यदि हम 2014-15 के बजट अनुमान (बीई) और 2015-16 के बजट अनुमान के बीच कुल राशि की उपलब्धता की तुलना करते हैं तो पता चलता है कि इस बजट वर्ष में 13 में से नौ राज्यों को कम राशि मिली है। नीचे दिखाए गए टेबल से यह और स्पष्ट होता है। हालांकि, वर्ष 2014-15 के संशोधित अनुमान (आरई) के साथ तुलना करें तो पता चलता है कि ज्यादातर राज्यों, तेलंगाना (-20 फीसदी),  उत्तराखंड (-14 फीसदी), कर्नाटक (-3 फीसदी) और महाराष्ट्र (-3 फीसदी) के अपवाद के साथ, सीएसएस में कटौती के बावजूद, केंद्र से उतनी ही या अधिक राशि प्राप्त किया है। जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि पूर्ण विश्लेषण के लिए यह बहुत जल्दी है।

 
 
विजेता एवं परास्त होने वाले: हस्तांतरण के तहत अनुदान में बदलाव  
 

 

एकाउंटिब्लीटी इनिशिएटिव के अध्ययन के अनुसार, “हालांकि देश के 14 वें एफसी सिफारिशों के कार्यान्वयन के बाद से अपने पहले बजट चक्र पूरा करने के करीब है, उपलब्ध आंकड़ों में बड़े अंतराल के कारण इन सिफारिशों के वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन मुश्किल है।”

 

इसके अलावा, पांच राज्यों – उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा (पूर्वोत्तर राज्यों को विश्लेषण से बाहर रखा गया है) –  नई हस्तांतरण प्रणाली के साथ लाइन में अपने बजट का पुनर्गठन नहीं किया था।

 

इन पांच राज्यों के राजस्व पर केंद्र से बदले स्थानांतरण का असर तब तक अनुमानित नहीं किया जा सकता जब तक नया बजट वर्ष शुरु नहीं होता है और  2015-16 का संशोधित बजट अनुमान (आरई) उपलब्ध नहीं हो जाता। इन राज्यों में भी विश्लेषण से बाहर रखा गया था।

 

(तिवारी इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 25 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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