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लड़कियों से अधिक लड़कों की भ्रूण हत्या: सरकारी आंकड़े देते हैं कम रिपोर्ट दर्ज होने का संकेत

चैतन्य मल्लापुर,

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2014 में लड़कियों से अधिक लड़कों के भ्रूण हत्या के मामले दर्ज हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध डेटा के यह नवीनतम उपलब्ध आंकड़े इस संबंध में कम मामले दर्ज होने के संकेत देते हैं।

 

2014 में कम से कम 53 लड़कों के भ्रूण हत्या के मामले दर्ज हुए हैं जबकि लड़कियों के 50 भ्रूण हत्या के मामले सामने आए हैं। यह जानकारी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में सामने आई है। चार भ्रूण के लिंग अज्ञात पाए गए हैं।

 

चूंकि लिंग चयन पर कानून अपराधीकरण 20 वर्ष पहले, 1996 में आया था,इस संबंध में  350 लोगों को दोषी करार दिया गया है, यानि की हर वर्ष 18 का आंकड़ा रहा है। यह जानकारी अगस्त 5, 2016 को लोकसभा के जवाब में सामने आई है।

 

यह न्यून प्राक्कलन भारत के बढ़ते बाल लिंग अनुपात से स्पष्ट है,जो 1991 में 945 से गिर कर 2011 में 918 हुआ है।

 

भारत का गिरता बाल लिंग अनुपात,1951-2011

Source: United Nations Population Fund

 

बिजनेस स्टैंडर्ड में उद्धृत, कामिनी लालू, 2014 में एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,के बयान के अनुसार “भारत में पैदा हुए 12 बिलियन लड़कियों में से एक लाख लड़कियां अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाती हैं। इसके परिणाम स्वरुप, देश के विभिन्न राज्यों में मानव तस्करी आम हो गया है, जहां किशोर लड़कियों के गरीब परिवारों द्वारा थोड़े से पैसे के लिए बेचा जा रहा है और इनमें से आधे मामले दर्ज नहीं किए जाते हैं।”

 

1996 और 2012 के बीच, केवल दक्षिण दिल्ली में कम से कम 238 भ्रूण और नवजात शिशुओं को छोड़ा गया है; अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के अनुसार, इनमें से 115 लड़के थे, 110 लड़कियां थीं और 13 भ्रूण के लिंग पता नहीं चल सका था, जैसा कि 17 अगस्त, 2016 को इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट बताती है।

 

डॉ सी बेहरा, रिपोर्ट के सह-लेखकों में से एक कहते हैं, “इनमें लड़के प्रमुख थे लेकिन नज़दीक से जांच करने पर पता चलता है कि पांच महीने के गर्भावधि (20 सप्ताह) के बीच लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में अधिक है।” बेहरा आगे कहते हैं, “पुरुषों के पक्ष में सामाजिक पूर्वाग्रह के कारण, इसका अर्थ हुआ कि चयनात्मक कन्या भ्रूण हत्या इस अवधि के दौरान हुआ। भारत में चिकित्सा गर्भपात केवल 20 सप्ताह के गर्भावधि के दौरान की अनुमति है और आपराधिक गर्भपात और प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण के बाद चयनात्मक कन्या भ्रूण हत्या गर्भावस्था के 20 सप्ताह से पहले अधिक होने की संभावना है। “

 

5 अगस्त , 2016 में लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार,  2014 में, सबसे अधिक कन्या भ्रूण हत्या के मामले मध्यप्रदेश (15) में दर्ज हुए हैं, जबकि राजस्थान में 11, पंजाब में 7 , उत्तर प्रदेश में और हरियाणा में 4-4 मामले दर्ज हए हैं। 2015 के लिए अस्थायी आंकड़ों के अनुसार कन्या भ्रूण हत्या के 52 मामले दर्ज हुए हैं और इनमें मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लिए आंकड़े सबसे अधिक है, प्रत्येक राज्य में 12।

 

सरकार ने संसद को बताया कि मार्च 2016 तक, भारत भर में अवैध लिंग- निर्धारण परीक्षण के लिए कम से कम 2,296 मामले दर्ज हुए हैं।

 

2015 में, देश भर में दर्ज की गई 107 भ्रूण हत्याओं में से – एनसीआरबी राज्य अनुसार पुरुष और महिला भ्रूण हत्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं कराता है – मध्य प्रदेश में सबसे अधिक (30), राजस्थान (24), उत्तर प्रदेश (11), पंजाब (10) और इसके बाद महाराष्ट्र (7) में दर्ज की गई है।

 

2014 में भ्रूण हत्या, टॉप पांच राज्य

Source: National Crime Records Bureau

 

सरकार ने संसद को बताया कि एनसीआरबी ने केवल 2014 से ही कन्या भ्रूण हत्या के लिए आंकड़े इकट्ठा करना शुरू किया है।

 

लिंग चयन मामले प्री-कन्सेप्शन और प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स एक्ट, 1994 के तहत दायर होते हैं।

 

लिंग निर्धारण के लिए चल रहे 626 अदालत / पुलिस मामलों के साथ राजस्थान सबसे पहले स्थान पर है। इस संबंध में महाराष्ट्र (554) दूसरे, पंजाब (192) तीसरे, हरियाणा (165) चौथे और उत्तर प्रदेश (139) पांचवे स्थान पर है।

 

राष्ट्र स्तर पर दर्ज की गई कुल यौन – निर्धारण परीक्षण में से 73 फीसदी हिस्सेदारी इन पांच राज्यों की है, जो कि स्वतंत्र अध्ययन द्वारा रिपोर्ट की गई भ्रूण हत्या की संख्या को देखते हुए ज़ाहिर तौर पर न्यून प्राक्कलन है, जैसा कि हमने बताया है।

 

लिंग चयन मामले, टॉप पांच राज्य

Source: Lok Sabha; Figures as on March 2016.

 

कुल मिलाकर 350 अभियुक्तों को दोषी करार दिया गया है और द्श भर में 100 चिकित्सा पंजीकरण रद्द किया गया है।

 

महिलाओं के लिए उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार सबसे बद्तर राज्य हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जुलाई 2016 में बताया है। इन राज्यों में महिलाओं का गर्भपात होने की संभावना अधिक होती है, राज्यों में महिलाओं की कम साक्षरता दर है, लड़कियों की कम उम्र में शादी होती है, गर्भवति के दौरान अधिक मृत्यु की संभावना होती है, सबसे अधिक बच्चों को सहन करतीं है, महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक अपराध और सबसे कम कार्यरत होने की संभावना है।

 

29 अप्रैल, 2016 को संसद में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण (MOHFW) मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 2010-12 में, भारत में जन्म के समय लिंगानुपात 908 था जो 2011-13 में सुधर कर 909 हुआ है। भारत के 21 बड़े राज्यों में, प्रति 1,000 पुरुषों पर 864 महिलाओं (2011-13) के आंकड़ों के साथ, हरियाणा की स्थिति बद्तार है।

 

पंजाब (867), उत्तर प्रदेश (878), दिल्ली (887), राजस्थान (893) और महाराष्ट्र (902) अन्य राज्यों में से हैं जिनका प्रदर्शन खराब है। प्रति 1,000 पुरुषों पर 970 महिलाओं के आंकड़ों के साथ छत्तीसगढ़ का जन्म के समय भारत में सबसे अनुकूल लिंग अनुपात है। इस संबंध में इसके बाद केरल (966) और कर्नाटक (958) का स्थान है।

 

MOHFW वार्षिक रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में, बाल लिंग अनुपात में जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और हरियाणा में सबसे बद्तर गिरावट हुई है।

 

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत का लिंग अनुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 943 महिलाओं का है। प्रति 1000 पुरुषों पर 879 महिलाओं के आंकड़ों के साथ, 28 राज्यों में हरियाणा का प्रदर्शन सबसे बद्तर है। इस संबंध में इसके बाद जम्मू-कश्मीर (889), सिक्किम (890), पंजाब (895) और उत्तर प्रदेश (898) का स्थान रहा है।

 

कुल मिलाकर भारतीय लिंग अनुपात प्रति 1000 पुरुषों पर कम से कम 950 महिलाओं होना चाहिए (प्रकृति महिलाओं से अधिक पुरुषों पैदा करता है, जैसा कि लड़कियों के मुकाबले लड़के अधिक शिशु रोगों की चपेट में आते हैं।)

 

हरियाणा में 17 ज़िले ऐसे हैं जिन्हें लिंग संकटमय घोषित किया गया है, जिनमें से एक रोहतक है – जहां प्रति 1,000 पुरुषों पर 867 महिलाओं का अनुपात है – और इसी राज्य ने ओलंपिक 2016 में भारत को पहले पदक दिया जब साक्षी मलिक ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनी, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।

 

(मल्लापुर इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 30 अगस्त 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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