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वर्षा आंकड़ों में असमानता का प्रभाव महाराष्ट्र के किसानों पर

यशवंतराव यादव,

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महाराष्ट्र के सोलापुर ज़िलें के पंढरपुर इलाके में एक मानव रहित मौसम स्टेशन। चित्र: यशवंतराव यादव

 

बारिश के आंकड़ों में 54 मिलीमीटर ( मिमी ) के मुद्दे पर असहमति का खामियाज़ा महाराष्ट्र के उन किसानों को भुगतना पड़ेगा जिन्हें अब मुआवज़ा मिलने में देरी होगी। साथ ही इस सहमती का असर प्रदेश में भविष्य में होने वाली कृषि निवेश की परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है।

 

वर्षा डेटा में 54 मिमी की असहमति से किसानों को बीमा भुगतान एवं महाराष्ट्र में कम वर्षा में कृषि निवेश में देरी हो सकती है।

 

आधिकारीक रुप से मानसून समाप्ती के साथ महाराष्ट्र सरकार ने 30 सितंबर 2015 को कहा कि राज्य में 1,131 मिमी वार्षिक औसत या सामान्य का 60 फीसदी की बजाए 678.5 मिमी बारिश हुई है।

 

लेकिन भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ( आईएमडी ) के आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में 1007.3 मिमी या सामान्य का 73 फीसदी की बजाए 732.5 मिमी बारिश हुई है।

 

डीएनए में छपे एक खबर के अनुसार, कैबिनेट नोट कहती है कि इस तरह के व्यापक रूप से विभिन्न आंकड़ों के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

 

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Source: Meteorological Department

 

समस्या यह है कि किस के आंकड़े सही हैं – केंद्र सरकार के मौसम विभाग या फिर महाराष्ट्र का राज्य कृषि विभाग?

 

प्रो एम सी वर्शन्या , कृषि मौसम विज्ञानी और कामधेनु विश्वविद्यालय के कुलपति , गुजरात के अनुसार “जहां तक ​​वर्षा डेटा की विश्वसनीयता का सवाल है, अधिक भरोसा केंद्रीय मौसम विभाग (आईएमडी) पर ही किया जा सकता है। वैज्ञानिक और मुआवजा प्रयोजनों के लिए आईएमडी की वर्षा डेटा अधिक भरोसेमंद है।”

 

आंकड़ों में असमानता से सबसे अधिक प्रभाव किसानों एवं राज्य के जिला- गांव नीति निर्माण और योजना, आकस्मिक योजना , निवेश और बीमा भुगतान पर पड़ेगा।

 

किस प्रकार वर्षा आंकड़ों पर निर्भर होती है बीमा भुगतान

 

नासिक के उत्तर-पश्चिमी जिले के अनार की खेती करने वाले किसान चिंतामन बलिराम अहेर ने इंडियास्पेंड से बातचीत करते हुए बताया कि किस प्रकार कम वर्षा, अधिक गर्मी और उमस से हुए बैक्टेरिया के कारण अनार की खेती को नुकसान पहुंचा है।

 

अहेर ने बताया कि, “हमें अपनी फसल को खेतों के बाहर फेंकना पड़ा। हमें अपनी लागता का 25 फीसदी भी वापस नहीं मिल पाया है।” अहेर अपने 2.5 एकड़ जमीन पर अनार की खेती के लिए 2 लाख रुपये खर्च किए लेकिन केवल 17,000 रुपए के ही फल बाज़ार में बेच पाया।

 

अहेर ने देना बैंक से फसल बीमा के लिए 19,000 रुपए का प्रीमियम भरा है लेकिन बीमे में बैक्टेरिया से होने वाले नुकसान को कवर नहीं किया गया है। केवल ओला-वृष्टि और बेमौसम बारिश से होने वाले नुकसान को ही कृषि विभाग के आंकड़ों में शामिल किया जाता है।

 

पिछले वर्ष बेमौसम बारिश से फसलों का नुकसान होने पर अहेर को बीमा के रूप में प्रति हेक्टेयर 30,000 रुपये मिले थे और उसके पहले वर्ष ( 2013 ) ओलावृष्टि से नुकसान के लिए 70,000 रुपए मिले थे।

 

सचिन रेडे, देना बैंक के देओला शाखा में कृषि अधिकारी ने कहा, उन्होंने बीमा कंपनी को अनार उत्पादकों के संबंध में आंकड़े और जानकारी प्रदान की है। बीमा कंपनियां कृषि विभाग की ओर से वर्षा के आंकड़ों पर बीमा भुगतान की गणना करते हैं।

 

इस साल, देओला तालुका , नासिक जिले में 140 अनार किसानों को जनवरी ओर फरवरी में हुए बेमौसम बारिश से हुए फसलों के नुकसान के लिए बीमा भुगतान के रुप में 42 लाख रुपए दिए गए हैं। बीमा की राशि, स्थान के आधार पर प्रति हेक्टेयर 15,000 रुपये से 40,000 रुपये तक दी गई है। प्रत्येक स्थान पर हुई वर्षा के आधार पर कृषि विभाग द्वारा मुआवज़ा तय की गई थी।

 

सोलापुर के दक्षिण – पूर्वी जिले में अंगूर के बागों से दो हेक्टेयर भूमि के मालिक एवं किसान, राजेंद्र महादेव गोडे को फरवरी एवं मार्च में ओला-वृष्टि से नष्ट हुए फसलों के मुआवज़े के तौर पर 50,000 रुपए दी गई थी। कृषि विभाग के आंकड़ों और बीमा कंपनी द्वारा एक दृश्य ” नुकसान के आकलन सर्वेक्षण ” के आधार पर मुआवज़ा तय किया गया था। तालुका कृषि अधिकारी ने ओला-वृष्टि को प्रमाणित किया था।

 

वर्षा आंकड़ों के बगैर बीमा एवं मुआवज़ा तय करना कठिन है।

 

भारत में कृषि – कम से कम बुआई क्षेत्र का 60 फीसदी – वर्षा पर निर्भर है। भारत की कृषि बीमा कंपनी ( एआईसी) के अनुसार करीब 90 फीसदी बीमा दावे वर्षा से संबंधित होते हैं।

 

सर्दी और मानसून फसलों और फलों के लिए फसल विशेष बीमा पॉलिसियां सरकार द्वारा विकसित की जा रही हैं। यह विशेष पॉलिसियां तापमान, आर्द्रता, और वर्षा जैसी विभिन्न कारकों पर आधारित होंगी।

 

लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के अनुमान के मुताबिक यदि वर्षा में 8 फीसदी वृद्धि के साथ तापमान 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो भारत के कृषि शुद्ध राजस्व में 12 फीसदी की गिरावट हो सकती है।

 

कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें फसलों के नुकसान के बावजूद किसानों को बीमा की राशि नहीं मिली है। इसका कारण वर्षा आंकड़ों का उपलब्ध नहीं होना है।

 

वर्शन्या ने बताया की वर्षा का माप  मौसम स्टेशन या बारिश गेज के स्थान पर निर्भर करता है। आईएमडी, राजस्व , कृषि और सिंचाई विभागों से वर्षा आंकड़े प्राप्त होते हैं।

 

भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम के लिए आधिकारिक अवधि 1 जून और 30 सितंबर के बीच है।
 
आईएमडी के अनुसार जिसने ± 4 % की संभावित परिवर्तन के साथ ,  वर्षा में 12 फीसदी गिरावट होने का अनुमान किया था, भारत में 1 जून से 30 सितम्बर, 2015 में मानसून मौसम के दौरान सामान्य से 14 फीसदी कम वर्षा हुई है।

 

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Source: Met Department

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी रिपोर्ट में बताया है कि किस प्रकार महाराष्ट्र में 52 फीसदी कम बारिश के कारण सूखे का संकट गहरा गया है।

 

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Source: Maharashtra Government

 

आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर, 2015 को 91 प्रमुख जलाशयों में पानी क्षमता का 62 फीसदी भरने के साथ मानसून समाप्त हो गया है।

 

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Source: Maharashtra Government

 

डॉ डी एल धने, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र से एक सेवानिवृत्त वैज्ञानिक जो अब सोलापुर जिले के गडेगांव गांव में एक किसान है, ने बताया कि “वर्षा पैटर्न दिन -ब-दिन बदल रहे हैं , और यह वर्षा की भविष्यवाणी करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।”

 

धने ने वर्षा की तेजी से अनिश्चित पैटर्न की ओर इशारा करते हुए बताया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून पहले ही वापस जा चुका है, लेकिन आने वाले दिनों में महाराष्ट्र में वर्षा होने की भविष्वाणी की जा रही है।

 

इसलिए अनिश्चित मौसमी पैटर्न से किसानों की मदद के लिए राज्य सरकार के कृषि विभाग स्थानीय मौसम आंकड़े रिकॉर्ड करना चाहती है।

 

हाल ही में पूरे महाराष्ट्र में 2065 मानवरहित मौसम स्टेशनों को स्थापित करने स्काईमेट मौसम सेवाएं , एक निजी मौसम एजेंसी ने राज्य सरकार के साथ हाथ मिलाया है। प्रत्येक स्टेशन 20 से 30 गांवों के लिए सेवारत होगा।

 

स्वचालित मौसम स्टेशनों विभिन्न मौसम मापदंडों को रिकॉर्ड करेगा जैसे – तापमान, सापेक्षिक आर्द्रता , हवा की गति और दिशा, वर्षा , सौर विकिरण, पत्ती नमी , मिट्टी की नमी और तापमान और वायुमंडलीय दबाव ।

 

ज़्यादातर जानकारियां रिकॉर्डिंग के 10 मिनट के भीतर ही उपलब्ध हो जाएगी।

 

( यादव टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई के साथ डॉक्टरेट स्कॉलर हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 16 अक्तूबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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