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वर्ष 2012 में जलवायु परिवर्तन के कारण लखनऊ की आबादी के बराबर भारतीयों की जान गई

डेल्ना अब्राहम,

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मार्च 2016 की रिपोर्ट ‘प्रिवेंटिंग डिजीज थ्रू हेल्दी एन्वाइरन्मन्ट’ में पर्यावरण के खतरों और 194 देशों में वैश्विक स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के जोखिम का विश्लेषण किया गया है।

 

उस साल भारत में हुई कुल मौत में से 30 फीसदी जलवायु परिवर्तन के कारण हुई है। हम बता दें कि, ये मौतें टाली जा सकती थीं, यदि सरकार और नागरिकों ने स्थायी पर्यावरणीय प्रथाओं को अपनाया होता। इस संबंध में यदि पाकिस्तान और बंग्लादेश के आंकड़ों से तुलना की जाए तो जलवायु परिवर्तन से संबंधित मौतों का आंकड़ा 25 और 23 फीसदी रहा है, जैसा कि ग्लोबल हेल्थ अब्जर्वटॉरी के आंकड़ों से पता चलता है। रिपोर्ट कहती है कि कम से कम 23 फीसदी वैश्विक मौतें ( लगभग 1.26 करोड़ ) और पांच साल के कम उम्र के बच्चों में 26 फीसदी मौतों के पीछे पर्यावरण कारक हैं।

 

साल 2012 में, भारत में हुई 29 लाख मौतों में से 17 लाख मौतें हृदय रोग और कैंसर जैसे गैर-संचारी रोगों के कारण हुई हैं।

 

विश्व स्तर पर 31 फीसदी हृदय रोग घरेलू और परिवेश वायु प्रदूषण, दूसरों के तंबाकू का धुआं और पर्यावरण में प्रचलित रसायनों के कारण होता है।

 

जीएचओ आंकड़ों के मुताबिक, विश्व स्तर पर कैंसर की वजह से 49 करोड़ लोग विकलांगता-समायोजित जीवन काल (डीएएलएआई) खो चुके हैं  । 20 फीसदी लोग वायु प्रदूषण, रसायनों के कुप्रबंधन, पराबैंगनी विकिरण आदि के कारण तबाही झेल रहे हैं।

 

‘डीएएलएआई’ समग्र बीमारी बोझ का माप है, जो जल्दी मरने के कारण जीवन के वर्ष खोने और विकलांगता की वजह से वर्ष खोने के के रुप में व्यक्त किया जाता है।

 

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 57 फीसदी बीमारियां जलवायु परिवर्तन के कारण खराब पानी, स्वच्छता, और खराब सफाई व्यवस्था और अवैज्ञानिक कृषि प्रथाओं के कारण होती हैं।

 

सात साल में, प्राकृतिक आपदाओं के कारण 15,000 से ज्यादा भारतीयों की मृत्यु, करीब 67 लाख घरों को नुकसान

 

जलवायु में परिवर्तन से न केवल रोगों का प्रसार होता है,इससे वातावरण का तापमान भी बढ़ता है, जिससे मौसम संबंधी प्राकृतिक आपदाएं- जैसे तूफान, बाढ़ और सूखा पड़ने की संभावनाएं- बढ़ती हैं। सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार, अप्रैल, 2010 से जल और पृथ्वी-आधारित प्राकृतिक आपदाओं के कारण भारत में 15,287 मौतें हुईं हैं। इस संबंध में विस्तार से आप यहां और यहां पढ़ सकते हैं। जीवन की हानि के अलावा 67 लाख घरों को नुकसान हुआ। 360,000 मवेशियों की जान गई। लाखों की आजीविका भी नष्ट हुई।

 

भारत में प्रकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली मृत्यु, वर्ष 2010 से 2017

Source: Ministry of Statistics and Programme Implementation Page 254- 256; Table 3.8.2, Lok Sabha

NOTE: *Provisional; Natural calamities include cyclonic storms, heavy rains, floods, landslides, etc.

 

वर्ष 2012-13 और 2013-14 के बीच, प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली मौतों की संख्या में करीब पांच गुना वृद्धि हुई है।

 

वर्ष 2013 में 5,845 लोगों की मृत्यु हुई थी। इसमें से 61 फीसदी मौतें 2013 में उत्तराखंड में आए बाढ़ के कारण थे। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान द्वारा वर्ष 2015 की इस रिपोर्ट के अनुसार, दो मुख्य घटनाओं के कारण केदारनाथ क्षेत्र में भयानक तबाही आई थी। 16 जून, 2013 को, मूसलाधार बारिश की वजह से केदारनाथ क्षेत्र के पास मिट्टी का क्षरण हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, इस कारण मलबे के साथ भारी मात्रा में पानी पूरे शहर में भर गया। इससे 10,625 लोगों की आजीविका तबाह हुई।

 

पानी में मलबा मुख्य रूप से ‘सड़कों, इमारतों, जल विद्युत परियोजनाओं, नदी के माध्यम से रेत और पत्थर का संग्रह, अनचेक वनों की कटाई आदि के निर्माण के कारण पर्यावरण के त्वरित मूल्यह्रास’ के कारण आया था।

 

अगले दिन हुई दूसरी घटना चौबरी झील में आई दरार के कारण हुई थी। दरार के कारण भारी मात्रा में पानी बाहर आया। बाढ़ से क्षेत्र में बहुत क्षति हुई।

 

वर्ष 2016 में बिहार में आए बाढ़ के कारण 243 से ज्यादा जानें गई हैं। वर्ष 2016 में यह संख्या देश में किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा रहा है। अगस्त 2016 में scroll में छपे इस रिपोर्ट के अनुसार  ” इसके लिए भारत की खराब जल प्रबंधन नीति जिम्मेदार है। पर्यावरण जांच के बिना निर्मित बड़े बांधों पर देश की निर्भरता ने गंगा के स्वाभाविक जल प्रणाली को नष्ट कर दिया है, जिसकी वजह से असमान्य बाढ़ आती है।  “

 

राज्यवार प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली मौतें, वर्ष 2016-17

Source: Lok Sabha

NOTE: Data for Chandigarh, Delhi, Goa, Manipur, Mizoram, Puducherry, Andaman & Nicobar, Lakshyadweep, Daman & Diu and Dadra & Nagar Haveli are not available; Natural calamities include cyclonic storms, heavy rains, floods, landslides, etc. Data as on February 22, 2017

 

ब्रसेल्स स्थित गैर-लाभकारी और आपातकालीन तैयारियों के लिए वैश्विक कार्यक्रम के एक भाग के रूप में डब्लूडब्लूओ का सहयोगी केंद्र ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एपडेमीआलजी ऑफ डिजासटर’ ( सीआरईडी ) के अक्टूबर, 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2015 में आपदाओं से 117 देशों और क्षेत्रों (54 फीसदी) को नुकसान पहुंचा था।

 

वर्ष 2014 की तुलना में वर्ष 2015 में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में 14 फीसदी की वृद्धि हुई थी। हम बता दें कि वर्ष 2014 में ऐसी आपदाओं की संख्या 330 थी, जबकि वर्ष 2015 में यह संख्या 376 थी। सीआरईडी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 के बाद से जलवायु संबंधी आपदाओं की संख्या ज्यादा हुई हैं। इन आपदाओं में सूखा, जंगली आग, अत्यधिक गर्मी शामिल हैं।

 

(अब्राहम इंटर्न हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 06 जुलाई, 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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