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विकलांगो की देखभाल: दक्षिणी राज्य दिखाते हैं रास्ता

निष्ठा भारती,

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मानसिका विकास केंद्रम, आंध्रप्रदेश में विकलांगों को विशेष शिक्षा दी जाती है। अकेले इस गैर सरकारी संगठन की पहुंच 538 लाभार्थियों तक है। यह संख्या गोवा एवं छत्तीसगढ़ के कुल लाभार्थियों से अधिक है।

 

जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, में विकलांगों की संख्या 4.15 मिलियन है।

 

आंध्र प्रदेश को, जहां विकलांगों की संख्या उत्तर प्रदेश की तुलना में 45 फीसदी कम है, केंद्र से उत्तर प्रदेश से तीन गुना अधिक धन प्राप्त होता है। इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में यह सामने आया है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार मजबूत प्रशासन एवं विकलांगता देखभाल अधिकारी-तन्त्र के मार्गनिर्देशन करने की क्षमता वाले राज्यों को सबसे अधिक लाभ मिलता है।

 

आंध्र प्रदेश (तेलंगना सहित) में 84 मिलियन लोग हैं एवं उत्तर प्रदेश में 199 मिलियन लोग हैं।

 

दीनदयाल विकलांगों के पुनर्वास योजना (डीडीआरएस) के तहत गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए जारी अनुदान के रूप में यह राशि दी जाती है। यह सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा प्रबंधित किया जाता है।

 

भारत में विकलांग जनसंख्या: टॉप 15 राज्य

 

 

हमारा विश्लेषण, तीन वित्तीय वर्षों, 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में मंत्रालय द्वारा प्रत्येक राज्य में एनजीओ को डीडीआर के लिए दिए गए धन एवं लाभार्थियों पर प्रकाशित आंकड़ों पर आधारित है।

 

डीडीआरएस के तहत टॉप पांच राज्यों को जारी की गई अनुदान सहायता, (वित्तीय वर्ष 2013 – वित्तीय वर्ष 2015)

 

 

आंध्रप्रदेश में, देश के कुल विकलांगों में से 8.45 फीसदी रहते हैं जबकि डीडीआरएस अनुदान में इसकी हिस्सेदारी 28.63 फीसदी है। इन आंकड़ों के साथ आंध्रप्रदेश का स्थान सूची में सबसे उपर है।

 

राष्ट्र स्तर पर, आंध्रप्रदेश में डीडीआरएस लाभार्थियों की संख्या भी सबसे अधिक है। आंध्रप्रदेश के लिए यह आंकड़े 16.82 फीसदी है, उत्तर प्रदेश से लगभग दोगुना, उत्तर प्रदेश के लिए यह आंकड़े 8.93 फीसदी है।

 

डीडीआरएस तहत टॉप 15 राज्यों में लाभार्थी, (वित्त वर्ष 2013 से वित्तीय वर्ष 2015)

 

 

मानसिक रूप से विकलांग शमशेर के मिली मदद

 

मानसिक रूप से विकलांग शमशेर के मिली मदद
 

शमशेर मोहम्मद अशरफ कुरैशी (11) गंभीर मानसिक विकलांगता से जूझ रहा है। कुरैशी के माता-पिता मजदूर हैं। इसलिए उनका आए दिन मजदूरी छोड़ कर बच्चे की देखभाल करना मुश्किल है।

 

उनकी अनुपस्थिति में कुरैशी कहीं भटक न जाए, इस आशंका में उन्होंने कुरैशी के हाथ पर अपने संपर्क नंबर चिह्नित करा दिया। यह चार साल पुरानी बात है।

 

शमशेर की देखभाल एवं उसे आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण अब अहमदाबाद स्थित गैर सरकारी संगठन, चिन्मय, विशेष शिक्षा, व्यवहार थेरेपी और संगीत चिकित्सा के माध्यम से दे रहा है। वह बीच-बीच में अपने माता-पिता के साथ रहता है एवं सामाजिक संबंधों में उल्लेखनिय सुधार देखा गया है।

 

किस प्रकार विकलांगों के लिए केंद्र सहायता कार्य करती है

 

1999 में, नि:शक्त व्यक्ति अधिनियम (1995) के प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सभी मौजूदा योजनाओं को एक कार्यक्रम में विलय कर दिया गया  जिसे विकलांग व्यक्तियों के लिए स्वैच्छिक कार्रवाई के नाम से जाना जाता है।

 

कार्यक्रम – स्वैच्छिक संगठन जो विकलांगता सेवाओं में शामिल हैं उनकी आर्थिक रुप से सहायता करता है, हस्तक्षेप से रोजगार तक – को 1 अप्रैल, 2003 में संशोधित किया गया एवं इसका नाम बदल कर दीनदयाल विकलांगों के पुनर्वास योजना (डीडीआरएस) कर दिया गया।

 

केरल, झारखंड: समान संख्या, असंगत वित्त पोषण

 

डीडीआरएस के तहत केरल को दूसरा सबसे अधिक वित्त पोषण मिला है लेकिन यहां भारत के विकलांग आबादी की 2.84 फीसदी से अधिक नहीं रहती है।

 

राष्ट्रीय विकलांग आबादी में 2.87 फीसदी की समान हिस्सेदारी के साथ, डीडीआरएस राशि में झारखंड की हिस्सेदारी 0.13 फीसदी है जबकि केरल की 10.13 फीसदी हिस्सेदारी है और झारखंड टॉप 15 राज्यों में नहीं आता है।

 

लाभार्थियों के मध्यनज़र भी झारखंड टॉप 15 राज्यों में नहीं हैं: कुल लाभार्थियों की संख्या 0.28 फीसदी है जबकि केरल के लिए यह संख्या 4.52 फीसदी है।

 

केरल और झारखंड की कहानियां, जहां की आबादी लगभग समान है – 33 मिलियन या 32 मिलियन – और समान विकलांगों की संख्या, देखभाल और प्रभावी प्रशासन के महत्व को प्रकट करते हैं।

 

दीपक कालरा , जयपुर स्थित उमंग संस्था के निदेशक- जो मस्तिष्क पक्षाघात , आत्मकेंद्रित और कई विकलांग लोगों के लिए काम करता है, कहते हैं, “असमानता के लिए एक बुनियादी कारण कुछ राज्य सरकारों का भावुक दृष्टिकोण है।”

 

इसी तरह, ओडिशा और तमिलनाडु में 4.64 फीसदी और 4.40 फीसदी के साथ राष्ट्रीय विकलांग आबादी में समान हिस्सेदारी है।

 

हालांकि, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में , तमिलनाडु को ओडिसा द्वारा प्राप्त राशि का केवल आधा ही प्राप्त हुआ है।

 

जबकि तमिलनाडु में विकलांगों की संख्या, ओडिसा की संख्या (5.89 फीसदी) से दोगुना से भी अधिक, 12.13 फीसदी, तक पहुंच गया है।

 

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चिन्मय, अहमदाबाद में एक संगीत- चिकित्सा सत्र। संवेदनशील अधिकारी, अधिकारी-तन्त्र से बातचीत कर सकते हैं – ज़िला से केंद्र तक – विकलांग कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिए जिम्मेदार, दिल्ली से राशि मिलने के लिए महत्वपूर्ण है

 

शिवाजी कमार, पटना स्थित समर्पण के संस्थापक, एक एनजीओ जो पुनर्वास एवं विकलांग लोगों की सहायता करती हैं, बताते हैं कि किस प्रकार अधिकारी तंत्र का मार्गदर्शन में शामिल होना योग्यतम राज्य प्रशासन हासिल करने का कारण बनता है।

 

डीडीआरएस के तहत अनुदान के लिए कोई भी आवेदन अधिकारी तंत्र पदानुक्रम के माध्यम से गुज़रता है। यहां तक की आवेदन को ऑनलाइन जमा करने के लिए राज्य के अनुदान सहायता समिति की सिफारिश की आवश्यकता होती है।

 

कुमार कहते हैं, “यह लालफीताशाही एक अधिकारियों की असंवेदनशीलता का ही परिणाम है की प्रस्तावों को आगे बढ़ने में अनुचित देरी होती है। और जब तक यह आवेदन दिल्ली तक पहुंचता है, उनकी वैधता पर समय-सीमा समाप्त हो जाती है और हमारे पास अगले साल तक इंतज़ार करने और फिर आवेदन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता है।”

 

इसलिए, कमजोर प्रशासन के साथ राज्यों में विकलांगों को अधिक भुगतना पड़ता है।

 

क्यों बिहार असफल और आंध्रप्रदेश हुआ सफल

 

बिहार, जहां विकलांग लोगों की भारत की तीसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है , का नाम केंद्र से मिलने वाली राशि एवं डीडीआरएस लाभार्थियों की सूची में टॉप 15 में नहीं है।

 

टॉप 10 वित्त पोषित राज्यों की सूची में एक आश्चर्य उपस्थिति मणिपुर है, जहां पर विकलांग लोगों की संख्या केवल 54,110 (कुल राष्ट्रीय संख्या का 0.2 फीसदी) है।

 

सफल स्वैच्छिक संगठनों और संवेदनशील अधिकारियों को समझना महत्वपूर्ण है कि क्यों कुछ राज्य बेहतर प्रदर्शन करते हैं और कुछ बुरा प्रदर्शन करते हैं।

 

पिछले तीन वित्तीय वर्षों में, सभी राज्यों के लिए आवंटित धन में से आंध्रप्रदेश , केरल, उत्तर प्रदेश और ओडिशा की कुल हिस्सेदारी 56.98 फीसदी रही है। हालांकि इन राज्यों में कुल विकलांग लोगों की संख्या, देश की कुल विकलांगों की संख्या का 31.44 फीसदी है।

 

आंध्र प्रदेश में स्वैच्छिक संगठनों की सफलता इस तथ्य से परिलक्षित होता है कि 2014-15 में, एक गैर-सरकारी संगठन, विजयवाड़ा के मानसिका विकास केंद्रम, से  538 लाभार्थियों को मदद मिली है। यह गोवा और छत्तीसगढ़, दोनों को मिलाकर, डीडीआरएस लाभार्थियों की संख्या (465) से अधिक है।

 

आंध्रप्रदेश को, दूसरी सर्वोच्च रैंकिंग राज्य, केरल की तुलना में 18.50 फीसदी अधिक धन प्राप्त हुआ है।

 

2014 में, सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर एक संसदीय स्थायी समिति ने डीडीआरएस पर “सख्त निगरानी” की सिफारिश की है “ताकि योजना के तहत केवल योग्य गैर सरकारी संगठनों को ही अनुदान मिले।”

 

मंजुला कल्याण, सिकंदराबाद- स्थित स्वंयकृषि की निदेशक, संस्था जो मानसिक रूप से विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाने की ओर बढ़ावा देता है, सुझाव देते हैं कि एनजीओ अनुदान आवेदनों की जांच के लिए भारत को कड़े निगरानी करने वाले की आवश्यकता है।

 

(भारती एक स्वतंत्र अजमेर, राजस्थान स्थित शोधकर्ता है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 29 जनवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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