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विश्व के बड़े सबसे प्रदूषित शहरों में दिल्ली भी: डब्लूएचओ

एलिसन सलदनहा,

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देश की राजधानी दिल्ली का नाम दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से शुमार है। इस बात की पुष्टि हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने भी की है। गौर हो कि इंडियास्पेंड की वायु गुणवत्ता वाले सेंसर #breathe नेटवर्क से भी पता चलता है कि दिल्ली की हवा जान के लिए खतरनाक है। रिपोर्ट के अनुसार 22 सितंबर 2016 से 28 सितंबर 2016 के बीच औसत रुप से रोज पर्टीकुलेट मैटर  (पीएम 2.5) का स्तर सुरक्षित स्तर से चार गुना अधिक दर्ज किया गया। पर्टीकुलेट मैटर हवा में घुले बेहद छोटे कण होते हैं। जिन कणों का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है, उसे  पीएम 2.5 कहते हैं। जिन कणों का व्यास 10 माइक्रोमीटर होता है, उसे पीएम 10 कहते हैं।

 

लंबे समय तक किए गए अध्ययन में 24 घंटे का स्तर डब्लूएचओ के स्वास्थ्य मानकों से करीब 11 गुना अधिक पाया गया है।

 

मानसून के दौरान  बारिश और हवा की वजह से दिल्ली के वायुमंडल में प्रदूषण का प्रभाव कम देखा गया था। हवा अपेक्षाकृत स्वच्छ थी। लेकिन मौसम बदलने के साथ ही स्थिति बदल गई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में लगाए गए हमारे पांच सेंसर में से तीन में 22 सितंबर से 28 सितंबर के बीच वायु गुणवत्ता का स्तर ‘बद’ से ‘बदतर’ दर्ज किया गया है। इससे साफ है कि लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने से लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है और बीमार लोगों की जिंदगी तबाह हो सकती है।

 

दिल्ली में औसत प्रदूषण, 22 से 28 सितम्बर, 2016

Source: IndiaSpend’s #Breathe network

 

दिसंबर 2015 में, #breathe के सेंसर उपकरणों से प्राप्त सप्ताह भर के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण स्तर बीजिंग से डेढ़ गुना ज्यादा है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने पहले भी विस्तार से बताया है।

 

2012 में, चीन में पीएम 2.5 और पीएम 10 के प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या बहुत ज्यादा दर्ज की गई थी। रिपोर्ट के मुताबिक वहां इसके प्रभाव से करीब 10 लाख मौतें हुई थी। वैसे तब भारत की स्थिति को भी बदतर ही कहा जा सकता है। भारत में बाहरी और भीतरी वायु प्रदूषण के कारण 6,21,138 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। ये निश्चत रूप से डराने वाले आंकड़े हैं और विश्व के परिदृश्य पर गौर करें तो प्रदूषण के कारण हुई लगभग 65 लाख लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत में से भारत 10 फीसदी के लिए जिम्मेदार है।

 

डब्लूएचओ द्वारा वर्ष 2016 में जारी ग्लोबल ऐम्बीअन्ट एअर पॉल्युशन रिपोर्ट के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि 2011 से 2015 के बीच, 1.4 करोड़ से ऊपर की आबादी के साथ वाले बड़े शहरों की तुलना में दिल्ली के परिवेशी वायु-प्रदूषण का स्तर बीजिंग और शंघाई से भी ज्यादा खतरनाक था।

 

चयनित बड़े शहरों में पीएम 10 का स्तर, 2011-2015

Source: World Health Organisation

 

दिल्ली में पीएम 10 का स्तर 229 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया है। जबकि काहिरा में यह स्तर 179 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। इस हिसाब से प्रदूषित शहरों में ढाका का नंबर तीसरा है। दिल्ली और काहिरा के बाद। वहां  पीएम 10 का स्तर 158 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। विश्व स्तर पर देखें तो इस तीन बड़े शहरों की हवा सबसे अधिक प्रदूषित है। इस सूची में बीजिंग और शंघाई छठे और सातवें स्थान पर है।

 

2012 में, वायु प्रदूषण से मरने वाले लोगों की संख्या चीन में सबसे ज्यादा, लेकिन दिल्ली की वायुमंडल बेहद खतरनाक

 

दिल्ली ही केवल एक ऐसा बड़ा शहर है, जहां का पीएम 10 का स्तर 200 माइक्रोग्राम / घन मीटर के ऊपर दर्ज किया गया है। गौर हो कि डब्लूएचओ के अनुसार हवा की गुणवत्ता का मानक 20 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। जहां यानि दिल्ली का पीएम 10 स्तर, डब्लूएचओ के मानक से 900 गुना अधिक है।

 

यहां तक कि कोलकाता और मुंबई में, जहां 135 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और 117 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पीएम 10 का स्तर दर्ज किया गया है, वहां की हवा भी चीन के बड़े शहरों से बद्तर है।

 

डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश के मुताबिक पीएम 10 के लिए वार्षिक औसत स्तर 20 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होना चाहिए और पीएम 2.5 के लिए 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर । 24 घंटे के लिए पीएम10 का  स्तर 50 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और  पीएम 2.5 का स्तर  25 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ ने भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पर्यावरण डाटा बैंक से आंकड़े लिए थे।

 

पीएम 10, या पीएम 2.5 बढ़ने का मुख्य कारण खेती, कारखानों और सड़कों की धूल और गंदगी है। वायु प्रदूषण से होने वाली अधिकांश मौतें इसी कारण होती हैं। यह कण मानव बाल से 30 गुना अधिक महीन होता है। गहरी सांस लेने से यदि ये प्रदूषण के लिए जिम्मेदार तत्व फेपड़ों तक पहुंचते हैं। इससे दिल का दौरा, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और सांस की बीमारियां हो सकती हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पर्टीकुलेट मैटर का लेवल वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य जोखिम के स्तर का सबसे अच्छा संकेत माना जाता है।

 

भारत में ग्वालियर, इलाहाबाद का स्तर बदतर

 

भारत के अन्य शहरों में  ग्वालियर और इलाहाबाद में वायु प्रदूषण का सबसे खराब स्तर दर्ज किया गया है। यहां बताते चलें कि ग्वालियर में पीएम 2.5 का स्तर 176 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और इलाहाबाद में 170 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की पाया गया है। उत्तरी भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा “संकटपूर्ण” वायु प्रदूषण के क्षेत्र में आता है (वायु प्रदूषण और जनसंख्या के डब्ल्यूएचओ के मानचित्र में पीएम 2.5 का स्तर 70 से अधिक माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की दर्ज किया गया है)

 

डब्ल्यूएचओ का नया वायु गुणवत्ता मॉडल, अब तक का सबसे व्यापक है।

 

यह  दुनिया भर में 3000 से अधिक शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के उपग्रह माप, एयर ट्रांसपोर्ट मॉडल और जमीन-स्टेशन मॉनिटर से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। यह 10 वर्ग किलोमीटर की एक ग्रिड पैटर्न क्षेत्र में जनसंख्या के आंकड़ों के साथ विश्लेषण करती है।यह यूनाइटेड किंगडम के यूनिवर्सीटी ऑफ बॉथ के सहयोग से डब्लूएचओ द्वारा विकसित किया गया था । इस मॉडल से प्राप्त आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि दुनिया की आबादी का 92 फीसदी ऐसे स्थानों पर रहता है, जहां हवा की गुणवत्ता डब्ल्यूएचओ के मानक स्तर को पार कर गया है।

 

खतरे में दिल्ली के प्रति वर्ग किलोमीटर 11,297 व्यक्ति

 

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के 1.68 मिलियन लोगों में से 97.5 फीसदी लोग शहरी क्षेत्र में रहते हैं और शहर में प्रति वर्ग किलोमीटर 11,297 व्यक्तियों का घनत्व है, जिसे देश की सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र कहा जा सकता है।

 

डब्लूएचओ में सहायक महानिदेशक डॉ फ्लाविया बसट्रेओ कहते हैं, “यहां वायु प्रदूषण का प्रभाव सबसे कमजोर आबादी (महिलाओं, बच्चों और बुज़ुर्गों) के स्वास्थ्य पर पड़ना लगातार जारी है।”

 

डब्लूएचओ के मुताबिक, हर साल होने वाली करीब तीस लाख मौतें बाहरी वायु प्रदूषण के खतरों से जुड़ी हैं। डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में (इसमें भारत एक हिस्सा भी आता है) और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में तीन में से दो के आंकड़ों से साथ वायु प्रदूषण से संबंधित मौतों में से लगभग 90 फीसदी ऐसी मौते होतीं हैं, जो कम या मध्यम आय वाले परिवारों से जुड़ी हैं।

 

डब्लूएचओ के अनुसार, परिवहन का अकुशल मोड, घरेलू ईंधन और अपशिष्ट जल, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, और औद्योगिक गतिविधियों वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।

 

(सलदनहा इंडियास्पेंड में सहायक संपादक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 3 अक्टूबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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