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शिवराज चौहान के 12 साल: आय में वृद्धि, लेकिन मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा

संजुक्ता नायर,

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वर्ष 2014-15 में, प्रति व्यक्ति आय के मामले में मध्य प्रदेश (एमपी) भारत का चौथा सबसे गरीब राज्य था। वर्ष 2015-16 में, मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु दर (प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 51 बच्चों की मृत्यु) और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (5 वर्ष की आयु तक पहुंचने से पहले प्रत्येक 1,000 जन्मों पर 62 बच्चे की मौत) सबसे ज्यादा थी।

 

शिवराज सिंह चौहान ने 28 नवंबर, 2017 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में 12 साल पूरे किए हैं, इन 12 वर्षों के स्वास्थ्य, आय और शिक्षा के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि देश का छठे सबसे अधिक आबादी वाले राज्य (72.6 मिलियन लोगों के साथ) ने प्रगति की है, लेकिन यह अब भी कई मामलों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले भारतीय राज्यों में से एक है।

 

उच्च विकास दर, लेकिन ग्रामीण मजदूरी में उच्च असमानता

 

वर्ष 2005-06 के वित्तीय वर्ष के दौरान, जब चौहान राज्य के मुख्यमंत्री बने, प्रति व्यक्ति 15,927 रुपए आय के साथ, मध्यप्रदेश देश का तीसरा सबसे गरीब राज्य था, जो 2004-05 की लगातार कीमतों पर भारत की प्रति व्यक्ति आय से 39 फीसदी कम था।

 

पिछले 11 वर्षों से 2016-17 तक, मध्यप्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 225 फीसदी बढ़कर 51,852 रुपए हुई है। इसी अवधि के दौरान, भारत की औसत प्रति व्यक्ति आय में 216 फीसदी की वृद्धि हुई। यानी आंकड़े, 2005-06 में 26,015 रुपए से बढ़कर 2016-17 में 82,269 हुआ है।

 

फिर भी, मध्यप्रदेश की प्रति व्यक्ति आय भारत से 37 फीसदी कम थी, जो यह दर्शाता है कि राज्य इस अंतर को कम करने में सक्षम नहीं है।

 

वर्ष 2005-06 और 2013-14 के बीच, मध्यप्रदेश की औसत कृषि विकास दर 9.3 फीसदी थी, जो 20 भारतीय राज्यों में सबसे ज्यादा है। वर्ष 2013-14 में, मध्यप्रदेश में 20 फीसदी कृषि विकास दर की वृद्धि हुई है, जो कि देश में दूसरा सबसे ज्यादा है। हम बता दें कि इसी अवधि के दौरान, देश की कृषि विकास दर 4.7 फीसदी दर्ज की गई है।

 

लेकिन इस कृषि विकास से लाभ हर जगह  समान नहीं दिखता। मध्य प्रदेश में असमानता, ग्रामीण मजदूरी और कृषि आय का आंकलन करने वाले लाइवमिंट में प्रकाशित जून 2017 के एक लेख के अनुसार, “छोटे और सीमांत किसान, जो अक्सर कृषि मजदूरों के रूप में काम करते हैं, उन्होंने इस अवधि में अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं देखी है।”

 

इसके अलावा, जबकि वर्ष 2010-11 में भारत में सभी खेतों में से 10 फीसदी मध्यप्रदेश में थे, औसत कृषि आकार 2005-06 में 2.02 हेक्टेयर से गिर कर 2010-11 में 1.78 हेक्टेयर तक हुआ है, जैसा कि 2010-11 की कृषि जनगणना से पता चलता है।  

 

Source: RBI Handbook of Statistics, 2017, per capita income at (04-05) constant prices till 2010-11, afterwards at (11-12) constant prices.

 

उच्चतर बाल मृत्यु दर, लेकिन 34 फीसदी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों में डॉक्टर नहीं

 

पिछले दशक में, मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर (यू -5 एमआर) ने राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक कमी की है, लेकिन राज्य ने 2012 के लिए अपने आईएमआर लक्ष्य को हासिल नहीं किया है।

 

वर्ष 2010 में, मध्यप्रदेश राज्य नियोजन आयोग ने कहा कि राज्य 11 वीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) के दौरान आईएमआर को प्रति हजार जीवित जन्मों पर 28 तक कम कर देगा। वास्तविकता में, आईएमआर 2005-06 में 70 से घटकर 2015 में 51 हो गया है और अब हैती के करीब, एक कैरेबियाई द्वीप जो बार-बार प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है और भारत की तुलना में प्रति व्यक्ति आय कम है। मध्यप्रदेश का आईएमआर भारत के किसी अन्य राज्य से अधिक है।

 

 वर्ष 2015-16 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015-16 में मध्यप्रदेश में यू -5 एमआर भी ज्यादा रहा है करीब 65, जो 2005-06 के 90 से कम है।

 

आईएमआर को 2012 तक 28 तक घटाने के लक्ष्य में मध्यप्रदेश असफल

Source: National Family Health Survey

 

हालांकि, भारत में, मध्यप्रदेश की शिशु मृत्यु दर और पांच वर्ष की आयु के भीतर बच्चों की मृत्यु दर सबसे उच्च है, लेकिन स्वास्थ्य देखभाल वितरण सेवाओं में डॉक्टरों की गंभीर कमी है, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स ने जून 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

31 मार्च 2017 तक, राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केंद्रों (पीएचसी) में डॉक्टरों के लिए 1771 स्वीकृत पदों में से 46 फीसदी रिक्त थी। 2017 में 37 फीसदी पीएचसी बिना डॉक्टर के काम कर रहे थे। 2006 में ऐसे पीएचसी की संख्या 21 फीसदी थी। 309 प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों की आवश्यकता थी जिसमें से केवल 58 पद भरे हुए हैं जो 81 फीसदी  कमी दर्शाता है। स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली के आंकड़ों के मुताबिक, 87 फीसदी बाल चिकित्सकों की कमी भी है।

 

नियोजन आयोग ने 2011-12 तक बाल लिंग अनुपात (0-6 वर्ष) प्रति 1,000 लड़कों पर ​​935 लड़कियां तक लाने का लक्ष्य रखा था। वास्तव में, 2011 में यह 918 था, जोकि जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2001 में 932 के आंकड़ों से कम है। मध्यप्रदेश का कुल लिंग अनुपात 2005-06 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 961 महिलाओं से गिर कर 2015-16 में 948 हुआ है जो भारत की 991 के लिंग अनुपात से बहुत कम है। हालांकि, मध्यप्रदेश में जन्म के समय लिंग अनुपात (प्रति 1,000 जन्मों पर जीवित लड़कियां) 2005-06 में 960 से घटकर 2015-02 में 927 हो गया है और यह अब भी भारत का सातवां सबसे अच्छा है।

 

महिला साक्षरता में वृद्धि, लेकिन संतोषजनक नहीं

 

वर्ष 2015-16 में, मध्य प्रदेश में 59 फीसदी महिलाएं साक्षर थी, जो वर्ष 2005-06 के 44 फीसदी दर से 15 प्रतिशत अंक ज्यादा था। तुलनात्मक रुप से भारत में औसत महिला साक्षरता 13 प्रतिशत अंक बढ़ी है। यानी 2005-06 में 55 फीसदी से बढ़ कर 2015-16 में 68.4 फीसदी हुआ है। 2015-16 में, मध्यप्रदेश की महिला साक्षरता दर, 68 फीसदी की भारतीय औसत से 9 प्रतिशत अंक कम था।

 

Source: National Family Health Survey

 

एएफचएस के आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 में, मध्यप्रदेश में 15 से 49 वर्ष की उम्र के केवल 14 फीसदी ग्रामीण महिलाओं ने स्कूलों में 10वीं से अधिक की पढ़ाई पूरी की थी, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी ग्रामीण महिलाओं के लिए आंकड़े 27 फीसदी है। आंकड़ों से पता चलता है कि,मध्यप्रदेश में 15 से 49 वर्ष की 34 फीसदी महिलाएं कभी स्कूल नहीं गई हैं।

 

ऊपरी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय, दोनों स्तर पर  लड़कियों के लिए सकल नामांकन अनुपात में गिरावट हुई है। माध्यमिक विद्यालय स्तर (कक्षा IX से X) में, लड़कियों के लिए सकल नामांकन अनुपात (आधिकारिक माध्यमिक विद्यालय-जनसंख्या आबादी का एक प्रतिशत के रूप में माध्यमिक विद्यालयों में कुल नामांकन) में गिरावट हुई है। यह आंकड़े 2013-14 में 82 फीसदी से गिर कर 2015-16 में 79 फीसदी हुआ है, जैसा कि शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई) के आंकड़ों से पता चलता है।  

 

2015-16 डीआईएसई के आंकड़ों के अनुसार, इसके अलावा, मध्यप्रदेश में ऊपरी प्राथमिक विद्यालय में, लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर सबसे ज्यादा है। 2014-15 में भारत में, मध्यप्रदेश में ग्रेड VI और VIII के बीच 10.7 फीसदी लड़कियों ने स्कूल छोड़ा है जबकि राष्ट्र के लिए यह आंकड़े 4.6 फीसदी रहे हैं।

 

उच्च विद्यालयों में स्कूल की उपस्थिति कम होती है: 2015-16 एनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यप्रदेश में 6-14 वर्ष की आयु में स्कूलों में उपस्थिति 90 फीसदी है जो 15-17 वर्ष की उम्र में यह आंकड़े 65 फीसदी है।

 

2015-16 के डीआईएसई आंकड़ों के मुताबिक, 2015-16 में मध्य प्रदेश में 29 फीसदी स्कूलों में बिजली का कनेक्शन था, जो भारतीय राज्यों में चौथा सबसे कम था। भारत में, सभी स्कूलों में से 63 फीसदी में बिजली  है।

 

तीसरा सबसे ज्यादा अपराध दर, हर दो घंटे में एक महिला के साथ बलात्कार

 

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में, भारतीय दंड संहिता के तहत  प्रति 100,000 आबादी पर 337.9 मामलों के साथ मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा अपराधिक मामले दर्ज हुए हैं। पहले और दूसरे स्थान पर दिल्ली (974.9) और केरल (727.6) का स्थान रहा है।

 

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, मध्यप्रदेश में 2016 में, प्रति 100,000 जनसंख्या पर 13.1 मामलों के साथ मध्यप्रदेश में देश में दर्ज बलात्कार के मामलों की चौथी उच्चतम दर थी। फरवरी 2016 और फरवरी 2017 के बीच, हर दो घंटे में एक महिला का बलात्कार हुआ है, जैसा कि 2017 के लिए मध्यप्रदेश के राज्य विधायी आंकड़ों के आधार पर हिंदुस्तान टाइम्स ने नवंबर 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

2016 में, पश्चिमी मध्यप्रदेश में इंदौर में, 19 प्रमुख भारतीय शहरों (रिपोर्ट किए गए बलात्कार के मामलों की औसत दर: 9.1) के बीच रिपोर्ट बलात्कार के मामले (प्रति 100,000 पर 17.2) की तीसरी सबसे अधिक दर थी। 2016 में, महिला के शील भंग करने के इरादे के तहत शहर में अपराधों की छठी सबसे ऊंची दर थी। मध्यप्रदेश के लिए यह आंकड़े प्रति 100,000 पर 21.3 का था जबकि 19 शहरों का औसत 19.3 था।

 

2005-06 में, मध्य प्रदेश में 46 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे अपने पति या साथी द्वारा शारीरिक या यौन शोषण से पीड़ित हैं।10 वर्षों के बाद, मध्यप्रदेश की तीन महिलाओं में से एक ने इस तरह की हिंसा का सामना किया है, जैसा कि 2015-16 एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चलता है, जो 13 प्रतिशत अंक में कमी का अनुमान है, विवाह संबंधी हिंसा से संबंधित महिलाओं में भारत की आठ प्रतिशत से अधिक की कमी है। (2005-06 में 37 फीसदी से 2015-16 तक 29 फीसदी)

 

मध्यप्रदेश में तीसरा सबसे ज्यादा अपराध दर
Crime Head Rank (Rate) in 2016 Rank (Rate) in 2006
Indian Penal Code Crimes 3rd (337.9) 5th (289.7)
Crimes Against Women 8th (71.1) 6th (21.3)
Crimes Against Children 7th (45.7) 3rd (5.9)

Source: National Crime Records Bureau
Note: Rate = Cases per 100,000 population; Rank out of 30 states including Delhi

 

2006 और 2016 के बीच, मध्यप्रदेश में बच्चों के खिलाफ अपराध की दर, प्रति 100,000 पर 5.9 से बढ़ कर प्रति 100,000 पर 45.7 हुआ है, जो कि राज्य में ज्यादा अपराध के मामले दर्ज होने या अपराध में वास्तविक वृद्धि के कारण हो सकता है। नवंबर 2017 में, मध्य प्रदेश सरकार ने 12 वर्ष से कम उम्र के लड़कियों के साथ बलात्कार करने वालों को मौत की सज़ा देने की अनुमति देने के लिए एक बिल को मंजूरी दी है।

 

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(नायर इंटर्न हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 6 दिसंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

 

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