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सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं, फिर भी सहायक प्रजनन सेवा उद्योग पर नियंत्रण की तैयारी

अपर्णा कालरा,

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गुजरात के आनंद शहर में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन सेंटर द्वारा प्रदत एक अस्थायी सेंटर में आराम करती एक सरोगेट मदर। सेरोगेट मदर,यानी किराए की कोख वाली मां। असिस्टड रिप्रोडक्टिव टेक्नॉलॉजी इंडस्ट्री यानी सहायक प्रजनन सेवा उद्योग   को नियंत्रित करने में मदद के लिए सरकार के पास शायद की कोई आंकड़े हैं। और इस पूरे उद्योग को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने बजाय सरकार केवल इसके एक भाग  सेरोगेसी पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

 

भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी को जन्म लिए करीब चार दशक बीच चुका है। इन चार दशकों में करोड़ों रुपए के साथ सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित हो चुका है। लेकिन गौर करने लायक बात यह है कि पूरे उद्योग को नियंत्रित करने के लिए कानून की बजाय ,राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार केवल इसके एक भाग पर ध्यान केंद्रित कर रही है और वह है सेरोगेसी यानी किराए की कोख देने वाली मां।

 

24 अगस्त, 2016 को केंद्रीय कैबिनेट ने सेरोगेसी बिल पर मुहर लगा दी है। हालांकि, भारत में पूर्ण एआरटी उद्योग के आकार या प्रकार पर शायद ही विचार किया गया है। 2010 में बनाया गया सहायक प्रजनन सेवा उद्योग अधिनियम  का भविष्य अब अनिश्चित है, जो ज्यादा कारगर और व्यापक था, लेकिन इसके कई प्रावधानों को घटा कर दिशा-निर्देशों का रुप दिया गया है।

 

सरकार के पास, एआरटी उद्योग को दुरूस्त करने के लिए शायद ही को आंकड़े मौजूद हैं।  इन तकनीकों के माध्यम हर वर्ष देश में कितने बच्चों का जन्म होता है? देश में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) क्लीनिकों की संख्या कितनी है? इलाज कराने वाली महिलाओं कि संख्या कितनी है और उनके इलाज की पूरी प्रक्रिया क्या है?  इन क्लीनिकों में से कौन-कौन से सेरोगेसी यानी किराए की कोख की पेशकश की जाती है? इसके लिए कितने रूपए लिए जाते हैं और सेरोगेट को कितना भुगतान किया जाता है? ये सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब के बिना इस पूरे उद्योग को जनता के लिए जिम्मेदार बनाना कठिन है।

 

एआरटी उद्योग पर केवल भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा ही मौजूदा आंकड़े एकत्र किए गए थे। यह आंकड़े राष्ट्रीय रूप में एक रिकार्ड रखने के उदेश्य से अधूरे प्रयास के रुप में जनवरी 2013 और अक्टूबर 2015 के बीच एकत्र किए गए । काउंसिल ने सहायता प्रजनन के लिए 1,657 क्लीनिक पहचान की। जिनमें 623 क्लीनिकों ने एआरटी और 180 ने शुक्राणु और अंडे बैंकों के रूप में काम करने की पुष्टि की। बाकी क्लीनिकों ने कोई जवाब ही नहीं दिया।

 

वास्तव में केवल 385 क्लीनिकों में आईसीएमआर के मानदंड के अनुसार कार्य करते हैं, जैसे कि प्रशिक्षित लोगों और नियत चिकित्सीय प्रक्रियाओं के साथ इलाज। इनमें से 307 क्लीनिक सेरगेसी की सुविधा प्रदान करते हैं। राष्ट्रीय रिकार्ड सेल के पास बस इतनी ही जानकारी है।

 

कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब न मिल पाने के साथ पिछले साल अक्टूबर में लेखा-जोखा रखने के इस काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। आंकड़ों के अभाव का मतलब है कि सरकार के पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है, जिसकी सहायता से बढ़ते एआरटी क्षेत्र को समुचित कानून के अंदर लाया जा सके।

 

सहायता प्रजनन प्रौद्योगिकी – जनवरी 2013 से अक्टूबर 2015

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Source: Indian Council of Medical Research

 

आईसीएमआर ने साफ बता दिया है कि इस उद्योग से जुड़े आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। आईसीएमआर की महानिदेशक, सौम्या स्वामीनाथन ने ई-मेल के जरिए इंडियास्पेंड को बताया है कि “ ये आंकड़े केवल उन क्लीनिकों के हैं जिन्होंने हमें अपनी जानकारी भेजी है। ऐसे में इन आंकड़ों पर पूरे देश के लिए कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। यह आंकड़े देश के संकेत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए ये आंकड़े हमें पूरी जानकारी नहीं देते, इसकी एक वजह यह भी है कि पंजीकरण अनिवार्य नहीं था।”

 

2010 में बिल बनाने के बाद भारतीय सरकार ने ‘राष्ट्रीय रजिस्ट्री’ स्थापित करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से मदद मांगी थी। पिछले वर्ष मौजूदा सरकार द्वारा बिल निरीक्षण किया गया और सहायक प्रजनन सेवा उद्योग अधिनियम  विधेयक, 2014 के रूप में प्रस्तुत किया है। नाम न बताने की शर्त पर आईसीएमआर के एक अधिकारी ने बताया कि उसके बाद, सेरोगेसी बिल बिना किसी नोडल एजेंसी के साथ परामर्श किए ही पेश किया गया है। इंडियास्पेंड इस बयान की पुष्टि नहीं कर सका है।

 

नए सरोगेसी बिल पर कई विभिन्न कारणों से बहस जारी है। बिल के मुताबिक कारोबारी (कमर्शियल) सेरोगेसी पर पाबंदी लगाई गई है। बिल यह भी कहती है कि परिवार की कोई करीबी सदस्य ही सरोगेट मां हो सकती है। विदेशी नागरिक और एकल अभिभावक सेरोगेसी के ज़रिए माता-पिता नहीं बन पाएंगे।

 

लगभग दो वर्षों के दौरान, जब आंकड़े एकत्र किए गए थे, एक भी एकल अभिभावक सेरोगेसी के लिए सामने नहीं आया है। आईसीएमआर के पास उपलब्ध आंकड़े तो यही कहते हैं। यही नहीं, इस अवधि के दौरान,  केवल 40 विदेशी युगल ने भारत में किराए की कोख का उपयोग करने की अनुमति मांगी।

 

मूल योजना के अनुसार अब निष्क्रिय राष्ट्रीय रजिस्ट्री के पास विविध आंकड़े जैसे कि आईवीएफ के मामले में उपचार के प्रकार और परिणाम, उपचार के लिए आई महिला की उम्र , इलाज के सभी चरणों की संख्या इकट्ठा करने और उसे सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिकों सहित 18 स्टाफ होने चाहिए। सेरोगेसी के मामले से जुड़े आंकड़ों में महिला की उम्र, जिसे बच्चे को जन्म देने के लिए अनुबंधित किया गया है, उसका इलाज और भुगतान शामिल हैं।

 

इन आंकड़ों का इस्तेमाल कर, एआरटी उद्योग के लिए अधिक से अधिक पारदर्शिता लाते हुए नीति को बनाया जा सकता है। ईवीएफ उपचार के दौरान कम से कम दो महिलाएं की मौत की रिपोर्ट की गई है, हालांकि एक भी मामले की आगे जांच नहीं की गई है।

 

आखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फोरेंसिक के प्रमुख, सुधीर गुप्त कहते हैं कि एआरटी पर किसी भी कानून में व्यापक मुद्दे शामिल होने चाहिए, जो चिकित्सकों के सवालों का जवाब दे सके। उन्होंने उस मामले का ज़िक्र किया जिसमें एक मृत व्यक्ति की पत्नी ने पोस्टमार्टम से शुक्राणु पुनः प्राप्ति की मांग की है। उन्होंने बताया कि पहले भी उन्हें ऐसी कई अनुरोधों का सामना करना पड़ा है।

 

गुप्ता कहते हैं, “हमने ‘पोस्टमार्टम शुक्राणु पुनर्प्राप्ति’ के अनुरोध पर कभी काम नहीं किया है। क्योंकि ये निर्णय भावनात्मक और किसी खास परिस्थिति से उपजे होते हैं।  इसके अलावा आईसीएमआर हमें इस तरह के अनुरोध पर कोई रास्ता नहीं दिखाता।”

 

अन्य किसी भी देश में एआरटी पर नियमित रुप से आंकड़े एकत्र किए जाते हैं। 2014 में जारी यूनाइटेड स्टेट्स प्रजनन क्लिनिक सफलता रिपोर्ट कहती है कि, देश में 1.6 फीसदी बच्चे सहायता प्रजनन सेवा के माध्यम से पैदा हुए हैं। यह वार्षिक रिपोर्ट जांच और व्यस्ततम आईवीएफ क्लीनिक की रैंकिंग की अनुमति देता है।

 

भारत में आईवीएफ क्लीनिक तेजी से उभर रहे हैं। यहां तक कि एक एफएम रेडियो इस तरह के एक क्लीनिक में ईएमआई स्कीम का विज्ञापन भी करता है। अर्न्स्ट एंड यंग द्वारा जारी एक 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, कही भी आईवीएफ तकनीक के तहत पूरे चरणों का खर्च 1.5 रु से 2.5 लाख रुपए के बीच है और अनुमान है कि 55 फीसदी इलाज देश के आठ महानगरों में किया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नियामक ढांचे के अभाव में इलाज और रोगी की देखभाल का परिणाम बुरे रूप में सामने आता है। परिणाम के रुप में होता है। रिपोर्ट के अनुसार, बांझपन के लिए समग्र वार्षिक बाजार वृद्धि दर 1.8 फीसदी है।

 

(कालरा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की पूर्व छात्रा एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह रायटर, मिंट और बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे कई पत्रिकाओं से जुड़ी हुई हैं।)

 

यह लेख मूलत:अंग्रेजी में 06 अक्तूबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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