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साऊदी अरब एवं कुवैत में रहने वाले एनआरआई की स्थिति बदहाल

अमित भंडारी,

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इंडियास्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक अमरिका में रहने वाले भारतीयों की तुलना में साऊदी अरब या कुवैत में रहने वाले भारतीयों पर मौत का खतरा दस गुना अधिक होता है।मौत का जोखिम वहां की बदहाल काम करने की स्थिति के कारण बढ़ रहा है।

 

सात मिलियन से अधिक भारतीय गल्फ़ कोपरेशन काउंसिल ( जीसीसी ) के छह तेल समृद्ध देशों (सऊदी अरब , संयुक्त अरब अमीरात , कुवैत, ओमान , कतर और बहरीन) में रहते एवं काम करते हैं। इन देशों में रहने वाले सभी वैश्विक नॉन रेसिडेंड इंडियनस ( एनआरआई ) की हिस्सेदारी 60 फीसदी से भी अधिक है।

 

हाल ही में कतर में एक मिलियन से भी अधिक श्रमिकों की बदहाल स्थिति का खुलासा किया गया है। इनमें बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिक भी शामिल हैं जो 2022 में होने वाले सॉकर (फुटबॉल) वर्ल्ड कप के निर्माण स्थल पर काम कर रहे हैं। यदि आंकड़ों पर नज़र डालें ते 2010 से मध्य 2015 तक सिर्फ कतर में ही 1,387 श्रमिकों की मौत हो चुकी है।

 

भारतीय एवं पड़ोसी देशों जैसे बंग्लादेश, नेपाल जैसे अन्य देशों की श्रमिकों की मौत विवाद का विषय रहा है। कुछ का अनुमान है कि मैच शुरु होने से पहले ही यह आंकड़े 1,200 से तक बढ़ सकता है।

 

कतर की सरकार श्रमिकों की बदहाल स्थिति एवं उनकी मौत के बीच किसी भी तरह का संबंध होने से इंकार करती है। भारतीय सरकार ने भी इस बात पर सहमती जताई है: लोक सभा में पूछे गए प्रश्न के जवाब में सरकार कहती है कि कतर में श्रमिकों की मौत अधिकतर प्राकृतिक कारणों से हुई है।

 

यह देखते हुए की कतर में रहने वाले भारतीयों की संख्या 600,000 है, यह आंकड़े स्वीकार्य हैं।

 

क्या कतर में रहने वाले भारतीयों की मौत की संख्या अस्वाभाविक रुप से अधिक है?

 

इंडियास्पेंड ने साल 2010 से 2013 के बीच विदेशों में रहने वाले भारतीयों एवं उनकी होने वाली मौत की संख्या पर पड़ताल करने की कोशिश की है। नीचे दिए गए टेबल से आंकड़े अधिक स्पष्ट होंगे।

 

एनआरआई आबादी एवं मौत की संख्या
 
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Source: Ministry of Overseas Indian Affairs, Lok Sabha

 

हमारी पड़ताल के दौरान कुछ बिंदु सामने आई हैं :

 

  • औसतन हर वर्ष प्रति 100,000 भारतीयों पर 53.6 मौतें होती हैं। हालांकि इन आंकड़ों में असहमती दिखती है। जीसीसी की छह देशों में औसतन 69.2 मौत होती है जबकि इसके अलावा पूरे देश के लिए यह आंकड़े 26.5 हैं, करीब 60 फीसदी नीचे।
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  • सऊदी अरब , संयुक्त अरब अमीरात, ओमान एवं कुवैत, प्रति 100,000 भारतीयों पर 65 से 78 मौत की रिपोर्ट करते हैं। इन चार राज्यों की तुलना में कतर के आंकड़े बेहतर जान पड़ते हैं।
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  • इन राज्यों की तुलना में अमरिका एवं ब्रिटेन के लिए यह आंकड़े 80-90 फीसदी कम हैं। इसका मतलब साफ है कि अमरिका में रहने वाले भारतीय नागरिकों की तुलना में साऊदी अरब या कुवैत में रह रहे भारतीयों के लिए मौत काजोखिम दस गुना अधिक है।

 

अमरिका या ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय अधिकतक वित्तीय या प्रद्योगिकी क्षेत्र में काम करते हैं जबकि जीसीसी में रहने वाले ज़्यादा जोखिम वाले जैसे निर्माण स्थल पर काम करते हैं। दूसरी बात यह कि अमरिका एवं ब्रिटेन जैसे देशों में बेहतर चिकित्सा सुविधाएं होने से वहां रह रहे भारतीयों को भी इसका लाभ मिलता है। इन देशों में रहने वाले भारतीयों के पास बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध है।

 

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कतर का मृत्यु दर ( प्रति 100,000 भारतीय ) साऊदी अरब की तुलना में आधा है । यदि मान लें कि जो काम भारतीय साऊदी अरब, ओमान या कुवैत में करते हैं वैसा कुछ कतर में भी करते हैं तो यह साफ है कि बेहतर काम करने की स्थिति एवं बेहतर चिकित्सा सुविधाओं से कई जीवन को बचाया जा सकता है।

 

कतर कुछ कराणों से पश्चिमि मीडिया की नज़र में आया है। पहला यह कि 2022 में सॉसर वर्ल्ड कप मैच के लिए कतर को चुना गया है।दूसरा फीफा – अंतरराष्ट्रीय सॉसर बॉडी- से जुडे कुछ विवाद के कारण भी सबका ध्यान इस ओर केंद्रित हुआ है। और शायद यही कारण है कि कतर का स्तर इसके पड़ोसी देशों से बेहतर है।

 

इसी तरह शायद अन्य जीसीसी देशों के  प्रचार से वहां रह रहे कई लोगों की जान बचाई जा सकती है।

 

( अमित भंडारी मीडिया, रिसर्च एवं वित्तीय प्रोफेश्नल हैं। भंडारी आईआईटी-बीएचयू से बी-टेक एवं आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए हैं। )

 

यह लेख मूलत: 24 अगस्त 15 को अंग्रेज़ी में indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 


 

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