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‘सामान्य’ मानसून बारिश के बावजूद 37% ज़िलों में बारिश की कमी

अभिषेक वाघमारे,

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लगातार पड़े दो सूखे के बाद, अगस्त 2016 तक भारत में सामान्य बारिश हुई है – 100 साल के औसत से 2 फीसदी कम – लेकिन इस सामान्य अवस्था के भीतर, देश के एक-तिहाई से अधिक हिस्से में बारिश की कमी है। यह जानकारी भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों में सामने आई है।

 

641 ज़िलों में से 610 ज़िले, जिनके लिए आंकड़े उपलब्ध हैं, 389 जिलों में सामान्य या अधिक बारिश हुई है जबकि चार महीने तक रहने वाले मानसून के मौसम के पहले तीन महीनों में 221 ज़िलों में “कम” या “न्यून” बारिश हुई है। इसका मतलब हुआ कि सितंबर वर्षा अब इस कमी को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

क्या है शब्दावली का अर्थ

अधिक बारिश : सामान्य से 20 फीसदी अधिक

सामान्य बारिश :  सामान्य से -20 फीसदी से +20 फीसदी

कम बारिश : सामान्य से -20 फीसदी से -40 फीसदी तक

न्यून बारिश : सामान्य से 40 फीसदी कम

Source: Weekly Weather Report, IMD

 

इसके बावजूद, 2013 के बाद से यह सबसे अच्छी बारिश रही है। भारत में जून- अगस्त की अवधि के दौरान औसत वर्षा से 14 फीसदी वर्षा हुई।

 

आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार, देश का कम से कम 16 फीसदी क्षेत्र में अब कम बारिश है।

 

भारत के एक-तिहाई ज़िलों में बारिश की कमी

Source: Hydromet, India Meteorological Department

 

अगस्त के अंत तक खरीफ (गर्मी मानसून) फसल की बुवाई सामान्य से 5 फीसदी अधिक थी क्योंकि भारत के आधे से अधिक ज़िलों में सामान्य से अधिक बारिश हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक के 2015-16 की वार्षिक रिपोर्ट में यह कहा गया है: “18 अगस्त , 2016 तक संचयी वर्षा अपनी लंबी अवधि के औसत (एलपीए) स्तर पर थी जो कि पिछले वर्ष की इसी अवधि की एलपीए की तुलना में 9 फीसदी कम है। और अब तक खरीफ बुवाई में 6.5 फीसदी की वृद्धि से आगे है।”

 

पूर्वोत्तर भारत , पंजाब, हरियाणा, गुजरात में बारिश की कमी

 

मानसून की सबसे अधिक कमी पूर्वोत्तर भारत में है, जो 30 फीसदी से 40 फीसदी के बीच है। अन्य राज्य जहां बारिश की कमी है वह हैं पंजाब, हरियाणा, गुजरात और केरल, जहां कमी 20 फीसदी से 30 फीसदी के बीच है।

 

भारत भर में मानसून की बारिश में भिन्नता

Source: Hydromet, India Meteorological Department

 

राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सामान्य से 20 फीसदी अधिक बारिश हुई है।

 

हालांकि क्षेत्रों में बुवाई सामान्य से अधिक हुई है, लेकिन कुछ फसलों पर प्रभाव पड़ा है।

 

अगस्त के अंत तक, दालों की बुवाई सामान्य से 40 फीसदी अधिक हुई है लेकिन गन्ना और कपास जैसी फसलों की बुवाई में सामान्य से 15 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

मध्य भारत में चरम वर्षा की घटनाओं (मानसून प्रणाली का कोर) में वृद्धि हो रही है और मध्यम वर्षा में कमी हो रही है। यह जानकारी अप्रैल 2015 में इंडियास्पेंड द्वारा क्लच ऑफ इंडियन एंड ग्लोबल स्टडीज़ अध्ययन की की गई समीक्षा में सामने आई है।

 

तेजी परिवर्ती वर्षा का तात्पर्य सामान्य मानसून के भीतर विस्तृत कमी है

 

भारत की एक तिहाई से अधिक हिस्से – 610 ज़िलों में से 221 ज़िले – में बारिश की कमी है, हालांकि सरकार की मौसम एजेंसी, आईएमडी, और निजी मौसम एजेंसियां जैसे कि स्काईमेट और मौसम जोखिम प्रबंधन सेवाएं और अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियां जैसे कि यूरोपीयन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट और द इंटरनेश्नल रिसर्च इंसट्टयूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी, अमरीका, ने 2016 के लिए सामान्य के ऊपर मानसून होने की भविष्यवाणी की थी।

 

2016 के तीन महीनों का मानसून, तीन वर्षों – 2012, 2014 और 2015 – की कमी का सुधार करता है लेकिन  2011 और 2013 से पीछे है जोकि बारिश का सामना कर रहे ज़िलो के अनुपात के संबंध के साथ सामान्य मानसून के वर्ष थे।

 

2011 और 2013 में, एक-चौथाई ज़िलों में बारिश की कमी थी और 2016 में एक तिहाई ज़िले, और 2012 और 2014 में भारत के आधे ज़िलों में बारिश की कमी रही है।

 

अगस्त के अंत तक बारिश की कमी वाले ज़िले (कुल का %)

Source: Performance Sheet, Hydromet, India Meteorological Department

 

खरीफ (गर्मी) की बुवाई सामान्य से ऊपर लेकिन मौसम के औसत से कम हो सकता है

 

अगस्त के आखिर तक भारत में सामान्य बुवाई क्षेत्र 97 मिलियन हेक्टेयर है, जबकि 2016 के खरीफ मौसम में 102 मिलियन हेक्टेयर की बुवाई हुई है।

 

खरीफ की बुआई के मौसम के अंत तक बुवाई क्षेत्र, 106 मिलियन हेक्टेयर है जो सामान्य रूप से सितंबर के पहले सप्ताह में हासिल हुई है।

 

महाराष्ट्र के कपास बेल्ट में अनियमित वर्षा और गुजरात में कम बारिश के कारण कपास की सामान्य से कम बुवाई हुई है।

 

बुवाई में 5% वृद्धि, दलहन में 40% लाभ , कपास में 14% गिरावट

Source: Crop situation on 26th August 2016, Department of Agriculture, figures in million hectare

 

दालों के लिए राजस्थान में बुआई क्षेत्र दोगुना

Source: Crop situation on 26th August 2016, Department of Agriculture, figures in million hectare

 

गुजरात, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में कपास क्षेत्र में कमी

Source: Crop situation on 26th August 2016, Department of Agriculture, figures in million hectare

 

महाराष्ट्र में ज्वार की बुवाई (चारा) – एक पारंपरिक गैर- सिंचित फसल- में 20 फीसदी की गिरावट हुई है। यह 6.1 लाख हेक्टेयर से गिर कर 4.9 लाख हेक्टेयर हुआ है।

 

सोयाबीन की बुवाई में वृद्धि हो रही है। अगस्त के अंत तक,  महाराष्ट्र में 3.9 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र पर सोयाबिन था, जोकि 34 मिलियन हेक्टेयर की औसत से 0.5 मिलियन ऊपर है।

 

अयाज खान, एक सोयाबीन और महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र से अरहर कृषक ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “कपास के लिए खेती की लागत अधिक है, और वर्ष 2008-09 के बाद से और बढ़ी है।”

 

असिंचित कपास से सिंचित कपास की उपज का एक चौथाई से पांचवा हिस्से तक का उत्पादन होता है ; खान के मुताबिक प्रति एकड़ 1,000 किलो के विरुद्ध प्रति एकड़ 200 से 300 किलो तक उत्पादन होता है। “सोयाबीन बिना सिंचाई के तीन महीने से कम में उत्पादन का आश्वासन देता है। इसके अलावा, अरहर और सोयाबीन की खेती करने के लिए कम मानवीय श्रम की आवश्यकता है।”

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 31 अगस्त 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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