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सार्वजनिक कार्यालयों में रिश्वत: 95% वृद्धि

देवानिक साहा,

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तेल मंत्रालय  से सरकारी दस्तावेज  चुराने के मामले में  एक व्यक्ति को गिरफ्तार करते हुए  सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी।

 

हाल ही में पेट्रोलियम मंत्रालय से लीक हुई जानकारी के साथ सरकारी कर्मचारियों और कंपनियों के बीच एक गहरी सांठगांठ का मामला सामने आया जिससे यह तथ्य सुदृढ़ हो गया कि  सरकारी भ्रष्टाचार भारत भर में आम  है ।

 

इंडिया स्पेंड के एक विश्लेषण के अनुसार  राज्य एजेंसियों द्वारा जांच किए जा रहे सरकारी  भ्रष्टाचार के मामलों में शामिल, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की संख्या में, पिछले पांच वर्षों में 95% की वृद्धि हुई है ।

 

राज्य एजेंसियों द्वारा जांच किए जा रहे मामले

 

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Source:NCRB

 

सीबीआई द्वारा जांच किए जा रहे मामले

 

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Source:NCRB; Note: Figures for the year 2009 are not available.

 

राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या में 15 % की वृद्धि हुई , यह 2009 में 3,683 से बढ़कर  2013 में 4,246 मामलों तक हो गई ।

 

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Source:NCRB

 

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Source:NCRB

 

आकंड़ों के अनुसार राज्य एजेंसियों द्वारा जांच किए जा रहे  भ्रष्टाचार के मामलों में शामिल अराजपत्रित अधिकारियों की संख्या में 95% की वृद्धि हुई, जो 2009 में 1,164 से बढ़कर  2013 में 2,274 हुए, जबकि आरोपित राजपत्रित अधिकारियों की संख्या में 16% की वृद्धि हुई, यह 2010 में 2,866 से बढ़कर  2013 में 3,317 हो गए।

 

हालाँकि  केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा जांच किए जा रहे मामलों में अराजपत्रित अधिकारियों की संख्या में 51% की कमी आई जो  2010 में 1,241 से गिरकर 2013 में 601 हो गई, जबकि इनमे शामिल राजपत्रित अधिकारियों की संख्या में 115% की वृद्धि हुई जो 2011 में 417 से बढ़कर  2013 में  896  हो गए।

 

“यह तो होना ही है,” एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, एक एडवोकेसी , के संस्थापक-न्यासी सदस्य, जगदीप छोकर कहते हैं। “हमारे यहां चुनाव भ्रष्टाचार के माध्यम से प्राप्त काले धन के साथ लड़े जाते हैं और राजनीतिक दलों के पास एक बड़ी राशि है जिसका कोई हिसाब नहीं है। सबसे पहला कदम है सभी राजनीतिक दलों को उनके पास जमा राशि के लिए जवाबदेह और पारदर्शी बनाना। जब बुनियादी चुनावी प्रक्रिया ही भ्रष्ट है, तो हम सरकारी दफ्तरों के भीतर ईमानदारी की उम्मीद नहीं कर सकते। ”

 

पेट्रोलियम मंत्रालय में  जासूसी काण्ड से भ्रष्टाचार के मामलों में निजी व्यक्तियों के शामिल होने का भी खुलासा हुआ ।

 

कंपनियों के अधिकारियों के शामिल होने के अलावा, पुलिस ने एक पूर्व पत्रकार और  एक ऊर्जा सलाहकार को गिरफ्तार किया है, दोनों पर वर्गीकृत दस्तावेजों को लीक करने और बेचने का आरोप है।

 

पत्रकार शांतनु सैकिया द्वारा प्राप्त की गई जानकारी, विधि-संगत पत्रकारिता थी या नहीं  इस पर भिन्न भिन्न मत हैं।   पूर्व खोजी पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम ड्यूएला विश्वास नहीं करती कि यह विधि-संगत थी।

 

“जानकारी लीक करने के लिए पैसे देना यह पत्रकारों के लिए उचित नहीं है,” ड्यूएला कहती हैं  “क्योंकि यह एक व्यवसाय बन सकता है जैसा कि  हमने इस  मामले में देखा, और कुल मिलाकर, यह खोजी पत्रकारिता के लिए एक गलत मिसाल बन सकता है।”

 

खोजी पत्रकार राणा अय्यूब इस विचार से सहमत हैं। “अपराध करने में और अपने सूत्रों को  भुगतान करने के बीच एक अंतर है,” अय्यूब कहती हैं । यदि आप एक माओवादी क्षेत्र या एक संघर्ष क्षेत्र में कोई खबर कर रहे हैं “, तो आपको जानकारी देने के लिए अपने स्रोत को  पैसे से या खाने पीने  के लिए भुगतान करना  हो सकता है। लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय की घटना एक प्रबल भ्रष्टाचार का मामला है। वर्गीकृत सरकारी दस्तावेज़ों की लीक किसी भी रूप में उचित नहीं है, और मैं इसका किसी भी तरह से  समर्थन नहीं करती। ”

 

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Source:NCRB

 

आंकड़ों के अनुसार राज्य एजेंसियों द्वारा भ्रष्टाचार जांच के मामलों में निजी व्यक्तियों की भागीदारी में 20% की वृद्धि हुई जो 2009 में 889 से बढ़कर 2013 में 1,071 हो गए ।   “इतने बड़े पैमाने पर ऐसा होने के दोहरे कारण हैं  : सभी ऐसा कर रहे हैं और पैसे बना रहे हैं और चोरी छुपे पैसा बना रहें हैं ,तो क्यों नहीं, “ड्यूएला कहती हैं। “दूसरे, इन मामलों में से कई  में कोई भी जेल नहीं  जाता है।”

 

इस घटना के बाद,  भारत, में लॉबिंग को कानून का दर्जा देने के लिए बहुत सी आवाज़ें उठी जो वही विचार हैं जिन्हे छोकर और ड्यूएला ने भी व्यक्त किया है।

 

“मेरे हिसाब से लॉबिंग को कानूनन कर देना चाहिए, और इस तरह की लॉबिंग फर्मों के नाम  उद्योग निकायों के साथ पंजीकृत कर देने चाहिए  जैसे , भारतीय वाणिज्य एंव उद्योग मंडल ( एसोचैम) और भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फिक्की) । ऐसा दिनया भर के लोकतंत्र में किया जाता है। यह सिस्टम को मजबूत करता है और उसमे  पारदर्शिता और जवाबदेही बनाता है। ”

 

(देवानिक साहा द पॉलिटिकल इंडियन पर डाटा संपादक है।)

 

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