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सीजेरियन प्रसव की बढ़ रही है दर, भारत को बेहतर स्वास्थ्य सेवा नीति की जरुरत

प्रतीक मित्तल और वर्तिका सिंह,

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वर्ष 2011-12 में, तेलंगना के 10 में से 9 जिलों में 50 फीसदी से ज्यादा सिजेरियन प्रसव हुए हैं। यह जानकारी जिला स्तर के स्वास्थ्य आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आई है। वहीं राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के किसी भी जिले में सीजेरियन प्रसव की दरें 25 फीसदी से ज्यादा नहीं है।

 

सीजेरियन प्रसव एक विशेष प्रक्रिया है, जो जटिल प्रसव मामलों से निपटने के लिए आवश्यक है। अप्रैल 2015 के विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक, सीजेरियन प्रसव की दर 10 से 15 फीसदी के बीच होनी चाहिए। ‘ब्रिघम एंड विमन हेल्थ’ और ‘हार्वर्ड टी एच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’के एक संयुक्त केंद्र अरीदने लैब्स के नेतृत्व में दिसंबर 2015 में किए गए अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि सीजेरियन दर 19 फीसदी तक हो तो यह सामान्य है। सीजेरियन प्रक्रिया से संक्रमण का खतरा भी हो सकता है और भविष्य में गर्भधारण में जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इसका उपयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब चिकित्सकीय रूप से आवश्यक हो।

 

डब्लूएचओ डेटा के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर ये आंकड़े करीब 8.5 फीसदी हैं।

 

डिस्ट्रिक्ट लेवल हाउसहोल्ड सर्वे-4  और एनुअल हेल्थ सर्वे से सार्वजनिक और निजी दोनों स्वास्थ्य सेवाओं में देश भर में सीजेरियन प्रसव दरों के लिए जिला स्तर के अनुमान के लिए एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन पर हमारे द्वारा आयोजित किए गए विश्लेषण के अनुसार,भारत के कई जिलों में, सीजेरियन प्रसव दर या तो बहुत कम है या बहुत ज्यादा हैं।

 

 

Source: District Level Household Survey Round 4, Annual Health Survey

 

उच्च सीजेरियन दरों के पीछे क्या है कारण?

 

आवश्कता से ज्यादा सीजेरियन दर ‘बाजार की असफलता’ के रुप में देखा जा सकता है। यह एक एक आर्थिक शब्द है, जो ऐसे मामलों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जहां सामान या सेवाओं का आवंटन संतुलित नहीं है।

 

इस मामले में ‘सूचना असंतुलन’ के कारण बाजार में विफलता उत्पन्न हो सकती है। आमतौर पर चिकित्सकों को मरीजों की तुलना में उपचार के बारे में अधिक जानकारी होती है। डॉक्टरों के द्वारा महंगे उपचार प्रदान करने की आतुरता को अगर आप देखेंगे तो आपको यही लगेगा कि आप एक ऐसे स्वास्थ्य सेवा के बाजार में खड़े हैं, जो ज्यादा इलाज करने के लिए इच्छुक है।

 

निजी स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं में, जहां ज्यादा इलाज के लिए प्रोत्साहन संभवतः अधिक है, वहां देश में लगभग 85 फीसदी जिलों में सीजेरियन दर 20 फीसदी से ज्यादा देखी गई है। सार्वजनिक संस्थानों में, सीजेरियन प्रसव की दरों में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव था।

 

 

Source: District Level Household Survey Round 4, Annual Health Survey

 

दक्षिण भारत के कई जिलों में, हमने सार्वजनिक संस्थानों में भी सीजेरियन प्रसव का उच्च दर पाया है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना के सभी जिलों के सार्वजनिक संस्थानों में सीजेरियन प्रसव की दरें 20 फीसदी से ज्यादा थी। कुल मिलाकर यह उच्च सीजेरियन प्रसव का एक दुर्लभ उदाहरण है।

 

सीजेरियन प्रसव भारत के स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के प्रदर्शन का आईना

 

वर्ष 2014 में, भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.4 फीसदी खर्च किया है। तुलनात्मक रुप से, 35 उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह, ‘ऑर्गनिजैशन फॉर इकोनोमिक कोपरेशन एंड डिवलपमेंट’ ( ओईसीडी ) ने औसतन 7.7 फीसदी खर्च किया है। अन्य देशों के मुकाबले भारत में खराब स्वास्थ्य परिणामों के पीछे कम खर्च भी एक कारण हो सकता है।

 

इसका उत्तर स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं और कर्मियों में निवेश का व्यापक दृष्टिकोण नहीं है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय बजट राशि के ऊपर ज़्यादा जोर देने को एक समाधान के रूप में देखते हैं। धारणा यह है कि अधिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से लोगों की पहुंच बढ़ेगी और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त होंगे।

 

इसका उत्तर स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं और कर्मियों में निवेश का व्यापक दृष्टिकोण नहीं है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय बजट राशि के ऊपर ज़्यादा जोर देने को एक समाधान के रूप में देखते हैं। धारणा यह है कि अधिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से लोगों की पहुंच बढ़ेगी और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त होंगे।

 

निम्न सीजेरियन प्रसव दर वाले जिलों में चुनौतियां उच्च दर वाले जिलों से कफी भिन्न हैं । स्वास्थ्य देखभाल नीति में ऐसे मामलों पर बात होनी चाहिए। कम दर वाले जिलों के लिए, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे और सुविधाओं में अधिक निवेश और अधिक योग्य चिकित्साकर्मी की जरूरत हो सकती है।

 

यह स्पष्ट नहीं है कि यह दृष्टिकोण,उच्च दरों वाले कुछ क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होगा या नहीं। एक तरफ, यह निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को भी नजरअंदाज करता है। हम बता दें कि भारत में निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवा पर एक बहुत बड़ी आबादी निर्भर है।

 

भारत में, बीमारियों के उपचार के लिए करीब 70 फीसदी समय लोग निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के पास जाना पसंद करते हैं, जैसा कि नेशनल सेंपल सर्वे राउण्ड 71 के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है। जब लोगों से पूछा गया कि वे सार्वजनिक सुविधा की तुलना में निजी सुविधा में जाना क्यों पसंद करते हैं तो प्रमुख प्रतिक्रिया सुविधाओं की गुणवत्ता थी, जो सार्वजनिक संस्थानों में संतोषजनक नहीं है।

 

इन क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त समाधान मात्रा की बजाय देखभाल की गुणवत्ता में अधिक निवेश करना और विनियामक ढांचा तैयार करना हो सकता है, जिससे सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के स्वास्थ्य-सेवा संस्थानों को अधिक जवाबदेह बनाया जा सके।

 

लक्ष्य पर फोकस वाले नीतियों और समाधानों में उर्जा लगाने से पहले पूरे परिदृश्य को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है। हालांकि, समस्याओं को समझने के लिए आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन कई तरहके विरोधाभासों और चुनौतियों को समझने के लिए अधिक जानकारी की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, देखभाल की गुणवत्ता मापने में सहायता करने वाले पर्याप्त आंकड़े मौजूद नहीं हैं। इसके अभाव में यह स्पष्ट नहीं होता है कि गुणवत्ता का वास्तविक अर्थ क्या है। इस बात को देखते हुए, अलग-अलग संदर्भों में क्या काम करता है, उसके संबंध में अधिक मजबूत प्रमाण की आवश्यकता होगी।

 

स्वास्थ्य सेवा की समग्र गुणवत्ता में सुधार के प्रयासों में देश भर के और क्षेत्र भर के सबक भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। इसके बाद ही हम यह सुनिश्चित कर पाएंगे कि सीमित संसाधनों से भी हम कैसे बेहतर लाभ उठा सकते हैं।

 

(मित्तल आईएफएमआर में ईपीओडी इंडिया के लिए एक वरिष्ठ रिसर्च एसोसिएट हैं। आईएफएमआर ‘हार्वर्ड केनेडी स्कूल के एविडेंस फॉर पॉलिसी डिजाइन’ और ‘इन्स्टटूट फॉर फिनैन्शल मैनेजमेंट एंड रिसर्च’ की ओर से एक संयुक्त पहल है। सिंह आईएफएमआर में ईपीओडी इंडिया के लिए एक पूर्व रिसर्च एंड ट्रेनिंग मैनेजर हैं। वर्तमान में और इंटरनेश्नल फूड पॉलिसी रिसर्च में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 जुलाई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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