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सूखाग्रस्त महाराष्ट्र और पानी की असमानता

अभिषेक वाघमारे,

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महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के गोव गांव के बाहर कटे हुए गन्ने ले जाता एक किसान

 

महाराष्ट्र का दूसरा सबसे विकसित शहर, पुणे के निवासी लातूर (दक्षिण-मध्य मराठवाड़ा क्षेत्र में सूखे से सबसे अधिक प्रभावित हुआ ज़िला) की तुलना में पांच गुना अधिक पानी का उपयोग करते हैं।

 

राज्य भर में पानी के उपयोग –  क्षेत्रों, फसलों और उपभोक्ताओं तक पानी की असंगत उपलब्धता एवं खपत –  पर इंडियास्पेंड द्वारा की गई विश्लेषण के अनुसार, भारत के सबसे विकसित राज्य, महाराष्ट्र में पानी की असमानता की यह स्थिति है।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कोंकण के तटीय क्षेत्र – राज्य के भूभाग का दसवां हिस्सा घेरता हैं एवं इसके 14 फीसदी आबादी का घर है (मुंबई को छोड़कर) – महाराष्ट्र का आधे से अधिक पानी नियंत्रित करता हैं।

 

पश्चिमी, मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ के अधिक जनसंख्या वाले सूखे क्षेत्रों में बाकी का आधा पानी है जिससे पानी के लिए एक-दूसरे एवं पड़ोसी राज्यों से टकराते रहते हैं।

 

लेकिन पानी का प्रकृतिक असंतुलन सूखे को निश्चित नहीं बनाती है। यह इसलिए होता है क्योंकि पानी को उन क्षेत्रों तक जानबूझ तक ले जाया गया है जहां पहले से ही यह अधिक मात्रा में हैं और साथ ही किसान भी राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हैं।

 

गन्ना – जो राज्य के 4 फीसदी खेतों पर उगाया जाता है – की खेती के लिए सिंचाई के लिए उपलब्ध 70 फीसदी पानी की खपत होती है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है, हालांकि 1.1 मिलियन (0.11 करोड़) से अधिक किसान को इस फसल से बढ़िया नगद लाभ मिल नहीं पाता है। इसके विपरीत, 10 मिलियन ज्वार (चारा), दलहन और तिलहन किसानों को 10 फीसदी से अधिक सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता है।

 

परिणीता डांडेकर, साऊथ एशियन नेटवर्क फॉर डैम, रिवर एंड पिपल की एसोसिएट कोर्डिनेटर, महाराष्ट्र में गन्ने की स्थिति पर उसके विश्लेषण में लिखती हैं, “पहले कांग्रेस के- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार – 30 कैबिनेट मंत्रियों में से 13 के मालिक होने या चीनी कारखानों को नियंत्रित करने के साथ, चीनी राजनीति में घुस गया था।”

 

जल असमानता एक प्राकृतिक घटना है

 

महाराष्ट्र में पांच नदी द्रोणी हैं – कृष्णा, गोदावरी, तापी, नर्मदा और तटीय कोंकण क्षेत्र में पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों की एक संयुक्त द्रोणी।

 

इनमें से तीन – कृष्णा, गोदावरी और तापी – कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह राज्य के क्षेत्रफल के 89 फीसदी हिस्सा तक फैली है; राज्य का 0.4 फीसदी नर्मदा नदी द्रोणी के अंतर्गत आता है।

 

कोंकण द्रोणी, भूमि के 10.9 फीसदी में बहती है जबकि राज्य का 55 फीसदी पानी नियंत्रित करती है।

 

कृष्णा द्रोणी में पश्चिमी महाराष्ट्र के ज्यादातर हिस्सों, कोल्हापुर, पुणे, सतारा, सांगली और सोलापुर के समृद्ध जिलों और कुछ हमेशा सूखा रहने वाले क्षेत्रों जैसे कि सांगली, सतारा और सोलापुर जिलों के पूर्वी हिस्सा शामिल है।

 

गोदावरी द्रोणी में मराठवाड़ा और विदर्भ के सूखाग्रस्त क्षेत्र शामिल हैं।

 

गोदावरी द्रोणी में आधा महाराष्ट्र शामिल


 

उपलब्ध पानी का आधा अप्रयुक्त, आंकड़े एमसीएम में

Source: White Paper on Irrigation, Government of MaharashtraMCM: Million Cubic Metres

 

 

सिंचाई पर 2012 की महाराष्ट्र सरकार श्वेत पत्र के अनुसार महाराष्ट्र के नदी घाटियों में उपलब्ध 125 अरब घन मीटर (बीसीएम) पानी में से अधिकांश कोंकण क्षेत्र में 69 बीसीएम अप्रयुक्त चला जाता है।

 

इसके विपरीत, कृष्णा में 17 बीसीएम और गोदावरी द्रोणी में 34 बीसीएम, जिन क्षेत्रों में वह पानी देते हैं उनके लिए अपर्याप्त हैं।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा जारी किए गए (सीएसीपी) गन्ना मूल्य नीति रिपोर्ट, 2014-15 कहती है कि, “महाराष्ट्र में गन्ने की खेती जो राज्य की कुल फसल क्षेत्र के कम से कम 4 फीसदी पर है, वह राज्य में सिंचाई के पानी का लगभग 70 फीसदी ले लेता है जिससे राज्य के भीतर पानी के उपयोग में भारी असमानता होती है।”

 

सीएसीपी महाराष्ट्र में प्रमुख फसलों द्वारा इस्तेमाल सिंचाई के पानी की हिस्सेदारी की तालिका बनाती है।

 

गन्ने के लिए सबसे अधिक पानी की आवश्यकता


 

गन्ने के लिए सबसे कम सकल फसल क्षेत्र है


 

सिंचाई के पानी का 70% इस्तेमाल करता है गन्ना

Source: Sugarcane Price Policy 2014-15, Commission on Agricultural Costs and Prices

 

कैसे गन्ना लेता है सबसे अधिक सिंचाई का पानी

 

महाराष्ट्र में केवल गन्ना ही एक फसल है जो पूरी तरह सिंचित है। सिंचाई का पानी 9 फीसदी दालों और 4 फीसदी तिलहन से अधिक के लिए उपलब्ध नहीं है।

 

करीब 10 मिलियन (1 करोड़) किसान ज्वार, दलहन और तिलहन की खेती करते हैं – इन खेतों में से दसवें भाग से अधिक सिंचा नहीं जाता है, जैसा कि हमने कहा है – और यह फसलें प्रति हेक्टर 2.2 मिलियन लीटर पानी का उपयोग करती हैं, साल में करीब 2,000 एमसीएम पानी।

 

गन्ने के 1.1 मिलियन किसान, प्रति हेक्टेयर 18.7 मिलियन लीटर पानी का इस्तेमाल करते हैं और प्रति वर्ष राज्य भर में 18,000 एमसीएम पानी – ज्वार, तिलहन और दलहन से नौ गुना अधिक – का उपभोग करते हैं।

 

विकसित शहरों में पानी का इस्तेमाल अधिक

 

शहरी पानी की खपत पैटर्न विकसित शहरों की ओर झुका है

 

मराठवाड़ा के लातूर शहर में रोज़ना प्रति व्यक्ति द्वारा 60 लीटर पानी इस्तेमाल करते हैं जबकि मुंबई में रहने वाला औससतन रोज़ाना 260 लीटर पानी का इस्तेमाल करता है।

 

इन शहरों के दैनिक पानी की जरूरतों और नवीनतम उपलब्ध जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, पुणे में रोज़ाना प्रति व्यक्ति पानी का उपयोग 352 लीटर है।

 

चार चुनिंदा शहरों के लिए पानी की आवश्यकता


 

प्रति व्यक्ति पानी की खपत

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ग्रामीण- शहरी जल असंतुलन

 

20,000 से कम आबादी वाले गांव में रोज़ाना प्रति व्यक्ति 40 लीटर पानी मिलना चाहिए जोकि मुंबई जैसे शहर शौचालय फ्लश करने के लिए निर्धारित पानी से पांच लीटर कम है – यह भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा बुनियादी जरूरतों के कोड में 1993 में निर्धारित किए गए मानक है।

 

बड़े शहरों में शौचालय फ्लश करने के लिए निर्धारित पानी, छोटे गांवो के कुल पानी से अधिक

 

मानक, शहरी क्षेत्रों में गरीब बस्तियों के लिए कम पानी की आपूर्ति की सिफारिश करता है।

 

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2015 में, महाराष्ट्र में संतुलित क्षेत्रीय विकास पर केलकर समिति, ग्रामीण और शहरी महाराष्ट्र भर में प्रति दिन प्रति व्यक्ति 140 लीटर पानी की सिफारशि करती है।

 

सिफारिश को अभी तक राज्य की जल नीति में शामिल नहीं किया गया है।

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 31 मई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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