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सेना के खिलाफ जम्मू एवं कश्मीर पुलिस की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट ने बंद करने को कहा

अभीत सिंघ सेठी,

5 मार्च, 2018 को श्रीनगर में शॉपिअन में गोलीबारी के दौरान तीन नागरिकों की हत्या और एक आतंकवादी की हत्या के विरोध में अलगाववादियों के विरोध को रोकने के लिए अधिकारियों द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बढ़ाई गई सुरक्षा।

 

मुंबई: 27 जनवरी 2018 को शोपियां जिले में भारतीय सेना द्वारा तीन नागरिकों की गोलीबारी में हुई मौत पर जम्मू और कश्मीर पुलिस की जांच को  सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक देने का यह मामला क्या पिछले 17 सालों से 50 मामलों में सैनिकों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने से केंद्र सरकार के इनकार से जुड़ा है।

 

सशस्त्र बल विशेष अधिनियम के तहत दिल्ली से स्वीकृति के बिना किसी भी सैनिक पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। केंद्र ने 50 अनुरोधों में से 94 फीसदी (47) मामलों में इनकार कर दिया है, जबकि बाकी 6 फीसदी (तीन) लंबित हैं, जैसा कि राज्यसभा में पेश आंकड़ों में बताया गया है। सभी मामलों में सरकार ने ‘मामले की स्थापना के लिए प्रथम साक्ष्य या पर्याप्त सबूतों की कमी” का उल्लेख किया है।

 

19 जुलाई, 2017 को गृह मामलों में राज्य मंत्री, किरण रिजिजू द्वारा राज्यसभा को दिए जवाब के अनुसार, “सशस्त्र बल (विशेष शक्तियों) अधिनियम, 1998 और 1996 की धारा 6 के तहत, इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में किए गए या किए गए किसी भी चीज़ के संबंध में किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध केंद्र सरकार की पिछली मंजूरी को छोड़कर कोई अभियोजन, मुकदमा या अन्य कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की जाएगी। ”

 

एएफएसपीए राज्य के राजपाल या केन्द्र को राज्य के किसी भी हिस्से को ‘अशांत’ घोषित करने का अधिकार देता है, एक क्षेत्र जिसे सशस्त्र बलों की तैनाती की आवश्यकता है, जैसा कि पीआरएस इंडिया द्वारा इस नोट में बताया गया है।

 

एएफएसपीए सुरक्षा बलों (सेना, केंद्रीय पुलिस बलों और राज्य पुलिस कर्मियों) को विभिन्न परिस्थितियों में जांच और हत्या के आरोपों से बचाता है। मानव अधिकारों की संस्था ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ ने कहा है कि यह कानून अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र मानवतावादी कानूनों का उल्लंघन करता है। एम्नेस्टी ने यह भी कहा कि एएफएसपीए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 का उल्लंघन करता है, जो नागरिकों को प्रभावी उपाय करने का अधिकार देता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 22 जुलाई 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

नई दिल्ली के ‘इंस्ट्टियूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालेसिस’ ( आईडीएसए ) में फेलो ब्रिगेडियर गुरुमीत कंवल (सेवानिवृत्त) के इस कॉलम के अनुसार, अगर एएफएसपीए कमजोर होता है तो सेना नेतृत्व का मानना है कि आतंकवाद विरोधी अभियानों में बटालियनों के प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। “

 

एएफएसपीए (2000-2016) के तहत सशस्त्र बलों के अभियोजन की मांग करने वाले केंद्र सरकार को प्राप्त अनुरोध

Source: Rajya Sabha

 

2000 से, जम्मू कश्मीर सरकार ने नागरिकों की हत्या के 10 कथित मामलों, नागरिकों के लापता होने के छह मामले, महिलाओं के साथ बलात्कार के दो मामले, हिरासत में मौत के दो मामले और अन्य मामलों के लिए सशस्त्र बलों के कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी मांगी है।

 

5 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने 27 जनवरी 2018 को शोपियां जिले के गणोवपोरा गांव में सेनाकर्मियों द्वारा तीन नागरिकों की मौत के मामले पर जम्मू एवं कश्मीर पुलिस की जांच को रोकने का फैसला किया है।

 

जम्मू कश्मीर पुलिस ने हत्या और हत्या के प्रयास के आरोप में 10 गढ़वाल राइफल्स के कर्मियों के खिलाफ पहली प्राथमिकी दर्ज की थी। इस घटना के दौरान यूनिट को कमांडिंग करने वाले मेजर आदित्य शर्मा को एफआईआर में नामित किया गया था। सेना ने दावा किया कि एक भीड़ द्वारा पत्थर फेंकने के जवाब में आत्मरक्षा में गोलीबारी की गई थी। शर्मा के पिता लेफ्टिनेंट कर्नल करवीर सिंह ने एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए एससी में मामला दायर किया।

 

5 मार्च, 2018 की सुनवाई के दौरान जम्मू-कश्मीर सरकार ने स्पष्ट किया कि एफआईआर में कुमार का नाम नहीं है। केंद्र ने तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना शोफियन के मामले में सेना के कर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज नहीं कर सकता, क्योंकि राज्य में एएफएसपीए प्रभाव में था।

 

एससी ने जम्मू-कश्मीर सरकार को 24 अप्रैल, 2018 को अपने अंतिम फैसले को बचाए जाने तक इस मामले को रोकने के आदेश दिए हैं।

 

जम्मू और कश्मीर में 2017 में 358 आतंकवादी-संबंधित मौतें हुईं है। 2013 की तुलना में यह 98 फीसदी ज्यादा है । तब181 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई, जैसा कि दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संस्था, ‘इन्स्टिटूट फॉर कंफ्लिंट मैनेजमेंट’ द्वारा चलाई जाने वाली ‘साउथ एशियन टेररिजम पोर्टल के’ आंकड़ों का हवाला देते हुए इंडियास्पेंड ने 14 फरवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

हालांकि, वर्ष 2013 में 100 की तुलना में 2017 में 218, यानी आतंकवादियों के मारे जाने की संख्या दोगुनी हुई है और नागरिक हताहतों की संख्या भी दोगुने से अधिक हुई है। 2013 में 20 से 2017 में 57 हुआ है। यह आंकड़ा जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहता है।

 

(सेठी मुंबई स्थित स्वतंत्र लेखक और भू-राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 10 मार्च 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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