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स्मार्ट सिटी मिशन की रफ्तार कम क्यों ?

तीश संघेरा,

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मुंबई: शहरी विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 में शुरु होने के बाद से स्मार्ट सिटी मिशन (एससीएम) के लिए जारी की गई राशि में से 1.8 फीसदी से ज्यादा  का उपयोग नहीं किया गया है।

 

स्मार्ट सिटी मिशन यानी एससीएम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की एक प्रमुख योजना है। वर्ष 2015 में शुरू किए गए इस योजना का लक्ष्य 100 स्मार्ट शहरों बनाना, शहरी निवासियों के लिए जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना और भारत की तेजी से शहरीकरण को आगे बढ़ाना है। शहरों में निवेश और विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रौद्योगिकी और डेटा आधारित समाधानों का उपयोग करके, ऐसा करने का प्रस्ताव है।

 

2031 तक भारत की शहरी आबादी 600 मिलियन तक पहुंचने ( 2011 से लगभग 40 फीसदी की वृद्धि है ) की उम्मीद के साथ शहरी विकास मुख्यतः शहरी अर्थव्यवस्था को एक सुगम रास्ता देने के लिए महत्वपूर्ण है।

 

धीमी प्रगति

 

एससीएम में भाग लेने के लिए चयनित शहरों के पहले दौर को वित्तीय वर्ष 2019-20 और 2020-21 के बीच पूरा होना है। हालांकि, शहरी विकास संबंधी स्थायी समिति (2017-18) की बाईसवीं रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2015 में मिशन की शुरुआत के बाद से, जारी किए गए 9,943.22 करोड़ रुपये (1.5 बिलियन डॉलर) में से केवल 182 करोड़ रुपये (28 मिलियन डॉलर) का उपयोग किया गया है, यानी केवल 1.8 फीसदी।

 

वास्तव में, सभी छह प्रमुख योजनाएं, जो सरकार “एक शहरी पुनर्जागरण” ( स्मार्ट सिटी मिशन, स्वच्छ भारत, राष्ट्रीय शहरी जीविका, कायाकल्प के लिए अटल मिशन और शहरी परिवर्तन (एएमआरयूटी), प्रधान मंत्री आवास योजना और हेरिटेज सिटी विकास और  आवर्ती योजना (एचआरआईडीएआई) ) लाने का वादा करती है, संयुक्त रुप से आवंटित धन का 21 फीसदी का उपयोग किया गया है। यह उपलब्ध 36,194.39 करोड़ रुपये (5.6 बिलियन डॉलर) का 7,850.72 ( 1.2 बिलियन डॉलर ) करोड़ रुपये है।

 

राष्ट्रीय शहरी जीविका मिशन ने सबसे ज्यादा राशि का उपयोग किया है, करीब 850 करोड़ रुपये यानी जारी राशि का  56 फीसदी। इसके बाद स्वच्छ भारत और एएमआरयूटी ( 2,223 करोड़ रुपये या 38 फीसदी और 2,480 करोड़ रुपये या 29 फीसदी ) द्वारा इस्तेमाल किया गया है।

 

शहरी विकास कार्यक्रमों द्वारा आवंटित, जारी और उपयोग की गई निधि

Funds Allocated, Released & Utilised By Urban Development Programmes
Scheme Funds Allocated Funds Released Funds Utilised FR vs FU%
AMRUT 12447.19 8629.36 2480.43 28.74
HRIDAY 700.00 247.15 33.59 13.59
Smart Cities 10084.2 9943.22 182.62 1.83
Swachh Bharat 7690.52 5847.92 2223.22 38.01
National Urban Livelihood 2600.83 1514.85 850.34 56.13
Pradhan Mantri Awas Yojana 15025.9 10011.89 2080.52 20.78
Total 48548.64 36194.39 7850.72 21.6

Source: Twenty second report of Standing Committee on Urban Development (2017-2018)

 

काम में गति नहीं

 

समिति कहती है, ” मिशन में 3 वर्षों के बाद भी पहचान की गई परियोजनाओं में से अधिकांश अभी भी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के चरण में हैं। “

 

परियोजनाओं का केवल 3 फीसदी ( एससीएम में चयनित 642 में से 23 ) फरवरी 2017 तक पूरे किए गए थे, जिनका मूल्य 305 करोड़ रुपये (47 मिलियन डॉलर) 38,021 करोड़ रुपये (585 मिलियन डॉलर) से उपलब्ध ) जैसा कि इंडियास्पेंड ने 27 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी योजनाकारों की कमी से कई परियोजनाएं प्रभावित हैं।

 

दिल्ली स्थित ‘कन्फेडरैशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री’ में स्मार्ट सिटीज मिशन के प्रमुख मानवेंद्र देसवाल के मुताबिक, 2020 तक भारत में 1.1 मिलियन शहरी योजनाकारों    की कमी होने की उम्मीद है।

 

आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने समिति से कहा कि वर्तमान में 5,500 शहर योजनाकार देश भर में काम कर रहे हैं और 600 राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेजों से प्रत्येक वर्ष स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहे हैं। हालांकि, इसमें कहा गया है कि यह स्मार्ट शहरों के लिए मौजूदा लक्ष्यों को पूरा करने की संभावना नहीं है और स्थिति में सुधार राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

 

पिछली सरकार के शहरी कार्यक्रम, जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के दौरान भी क्षमताओं का अभाव एक कठिन समस्या थी, जैसा कि इस 2015 के शोध पत्र में कहा गया है।

 

समिति ने ऐसी रिपोर्टों को भी उजागर किया कि “ कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी एक प्रमुख कारण है । एससीएम के इच्छित लाभ अभी भी जनता को दिखाई नहीं दे रहे हैं। “

 

चूंकि एएमआरयूटी और स्वच्छ भारत जैसी योजनाओं को समान बुनियादी ढांचा और शहरी नवीकरण परियोजनाओं पर काम करने के लिए अनिवार्य किया गया है, इसलिए समिति ने नगर निगम के अधिकारियों को सलाह दी है कि वे प्रत्येक कार्यक्रम के बीच धन को बर्बाद करने और परियोजनाओं में देरी करने से बचें।

 

नई सरकार, वही समस्याएं

 

जेएनएनयूआरएम को इसी तरह कार्यान्वयन और वित्तीय सहायता स्तर पर कमी का सामना करना पड़ा था,  जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2013 की रिपोर्ट में बताया है।

 

2005 से 2014 तक, शहरी बुनियादी सुविधाओं के 37 फीसदी और बुनियादी शहरी सेवा परियोजनाओं का 52 फीसदी परियोजनाएं जेएनएनयूआरएम के तहत पूरी हुई हैं। कार्यक्रम के अंत तक 54 करोड़ रुपये (8.9 मिलियन डॉलर) खर्च नहीं किए गए थे।

 

जेएनएनयूआरएम प्रदर्शन की समीक्षा करते हुए नवंबर 2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट ने परियोजना प्रबंधन, भर्ती चुनौतियों और नगरपालिका स्तर पर व्यापार करने में कठिनाई की ओर इशारा किया था।

 

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अनुरोध किया गया था कि वे राज्य स्तर की नोडल एजेंसियों की स्थापना के लिए परियोजना निष्पादन और परियोजना कार्यान्वयन इकाइयों का निर्माण करें।हालांकि, कैग की रिपोर्ट में पाया गया कि 10 राज्यों ने इन्हें स्थापित नहीं किया था, और कई राज्यों में कई पद रिक्त रहे थे।

 

इसी तरह, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट कार्यान्वयन के साथ ही धन का मूल्यांकन और जारी करने के साथ काम करने की गति धीमी थी। परियोजना प्रबंधन सलाहकार नियुक्त करने के लिए एक साल से अधिक समय लेने वाले शहरों की खबरें भी थीं।

 

उदाहरण के लिए, 2016 के फरवरी में स्मार्ट सिटी के रूप में विकास के लिए चुने गए कोच्चि ने फरवरी 2017 तक एक परियोजना पूरी की है। इसके लिए कई तरह के नियम और प्रबंधन सलाहकार नियुक्त करने में हुई देरी को कारण माना गया है, जैसा कि फरवरी 2017 में ‘द हिंदू’ ने रिपोर्ट किया था।

 

(संघेरा इंटर्न हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 3 अप्रैल, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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