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स्मृति ईरानी के नए मंत्रालय की चुनौतियां

अभिरुप भुनिया,

Employees work inside a garment factory of Orient Craft Ltd in Gurgaon

 

हाल ही में स्मृति ईरानी को कपड़ा मंत्रालय का कार्यभार दिया गया है जो कि भारत की औपचारिक नौकरियों का सबसे बड़ा स्रोत है। लेकिन वियतनामी और बांग्लादेशी की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और नौकरी विकास पठारों और निर्यात शिथिल होने से सरकार की यह उम्मीद कि यह एक रोजगार इंजन बना रहेगा, खतरे के अंतर्गत लगता है।

 

कपड़ा उद्योग 105 मिलियन या 10.5 करोड़ लोगों को सीधे और परोक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराता है और यह माना जा रहा है कि 2025 तक 50 मिलियन या 0.5 करोड़ से अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने की क्षमता है। इस वक्त भारत में ज़रुरत के मुताबिक हर महीने 10 लाख नए रोज़गार नहीं पैदा हो पा रहे हैं जिससे देश में असंतोष बढ़ रहा है, इससे निपटने में कपड़ा और वस्त्र उद्योग ही अहम भूमिका निभा सकता है।

 

लेकिन कौशल की बढ़ती खाई, निर्यात में गिरावट,कम उत्पादकता, बढ़ते कर्ज और कम विदेशी निवेश से कपड़ा क्षेत्र के लिए तय लक्ष्य को खतरे में डाल रहा है: निर्यात में 30 बिलियन डॉलर और अगले तीन वर्षों में 10 मिलियन अतिरिक्त रोज़गार।

 

इसकी बजाय, श्रम ब्यूरो के अनुमान के अनुसार, अप्रैल-जून 2015 में वस्त्र और कपड़ा रोजगार में 0.11 फीसदी की गिरावट हुई है, जुलाई- सितंबर 2015 में 0.18 फीसदी और अक्टूबर-दिसंबर 2015 में 0.23 फीसदी  की वृद्धि हुई है; और संयुक्त राष्ट्र कमोडिटी व्यापार सांख्यिकी डाटाबेस (यूएन कॉमट्रेड) के आंकड़ों के अनुसार, कपास वस्तुओं के निर्यात, जिसकी वस्त्र और कपड़ा निर्यात का 24 फीसदी की हिस्सेदारी है, पिछले तीन वर्षों में 34 फीसदी की गिरावट आई है।

 

हालांकि, कुछ वस्तुओं के निर्यात जैसे कि, बुना हुआ / या क्रोशिया से काढ़ा हुआ  और गैर बुना हुआ या बिना क्रोशिया के काढ़े हुए वस्त्र और कपड़े में 12 फीसदी और 7 फीसदी की वृद्धि हुई है, वर्ष 2013-14 और 2015-16 के बीच,  भारत से वस्त्र एवं परिधान निर्यात में 7 फीसदी से अधिक की गिरावट हुई है।

 

वस्त्र और कपड़ा निर्यात

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Source: ITC compilation of UN Comtrade data;

 

क्यों वस्त्र उद्योग है भारत की नौकरी आकांक्षाओं की कुंजी

 

कपड़ा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेष रुप से महिलाओं के लिए, और लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है जैसा कि वे बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मॉरीशस, कंबोडिया और पाकिस्तान सहित कई देशों में खेती रोज़गार से बाहर आए हैं।

 

499,000 के आंकड़ों के साथ पिछले तीन वर्षों के दौरान, भारतीय औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों का सबसे बड़ा निर्माता कपड़ा उद्योग रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी जुलाई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय सबूत है कि निर्यात अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद करता है और मजदूरी और आय में वृद्धि में बढ़ावा दिलाता है।

 

इस आशंका के साथ कि भारत, बेरोजगारी वृद्धि का सामना कर रहा है, अपने “जनसांख्यिकीय बोनस” , दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या कामकाजी उम्र, को भुनाने की क्षमता, – 2020 तक 86.9 करोड़ – संदेह में हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने मई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

मिंट के कॉलम में मानस चक्रवर्ती लिखते हैं कि लेकिन 15 वर्ष में, 1997 और 2012 के बीच संगठित क्षेत्र में रोजगार सिमटा है और इसे वे जो इस ‘ आर्थिक उदारीकरण की सबसे बड़ी विफलता ” कहते हैं।

 

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की इस रिपोर्ट के अनुसार, अभूतपूर्व आर्थिक विकास (1991 से 2013) के 22 वर्षों में, आधे से कम भारतीयों से नौकरी तलाशा है, 300 मिलियन में से 140 मिलियन को प्राप्त हुआ है। रिपोर्ट कहती है, अब से लेकर 2050 तक, साल जब जनसंख्या कामकाजी उम्र (15 से 64) सबसे अधिक होगी, भारत को 280 मिलियन रोज़गार उत्पन्न करने की आवश्यकता होगी।

 

जैसा कि हमने कहा है, क्षेत्र में रोजगार की दर, गिर रही है। इसका एक मुख्य कारण है कि पिछले दो वित्तीय वर्षों में कपास, जिसकी वस्त्र और कपड़ा के निर्यात का सबसे अधिक हिस्सेदारी (24 फीसदी) होती है, उसके उत्पादन में 11 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

कपास उत्पादन और उपज: गिरावट

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Source: Cotton Corporation of India, Ministry of Textiles; 1 bale = 170 kgs

 

बिजनेस स्टैंडर्ड में इस रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब और हरियाणा में फसल का नुकसान और गुजरात और महाराष्ट्र में कम बारिश, पांच सालों में सबसे कम वार्षिक कपास उत्पादन का कारण हो सकता है।

 

इससे संभावित कीमतों में वृद्धि होगी, जिससे भारतीय कपड़ा उत्पादों अप्रतिस्पर्धी बन रहा है, ऐसे समय में ऐसे समय में जब भारत का निर्यात बांग्लादेश , वियतनाम और चीन से प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं।

 

हालांकि, पूर्ण रुप में,भारत अब भी वियतनाम और बांग्लादेश से अधिक निर्यात करता है, लेकिन पिछले तीन वर्षों के दौरान, वियतनाम के निर्यात पर 34.92 फीसदी और बांग्लादेश के 13.52 फीसदी की वृद्धि हुई है जबकि भारत के निर्यात में 7 फीसदी की गिरावट आई है।

 

2013-14 में कपड़ा और परिधान निर्यात में, बांग्लादेश और वियतनाम में 43 फीसदी और 87 फीसदी की बढ़त से 2015-16 में भारत के नेतृत्व अब 16 फीसदी और 28 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

वियतनाम और बांग्लादेश से प्रतिस्पर्धा : प्रगतिशील

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Source: ITC trade data;

 

वियतनाम, ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप का एक हिस्सा है, जो एक व्यापार गुट है, और इसलिए उसे अमेरिका के लिए तरजीही पहुँच प्राप्त है, जिसकी वैश्विक वस्त्र और कपड़े के आयात का 19 फीसदी की हिस्सेदारी है और दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश है। भारत टीटीपी का सदस्य नहीं है, जिसका अर्थ हुआ कि इसे महत्वपूर्ण बाजारों में तरजीही या शुल्क मुक्त पहुंच प्राप्त नहीं है।

 

कई योजनाएं लेकिन लड़खड़ाती उत्पादकता और कौशल

 

ईरानी के लिए करने को बहुत कुछ है, जैसे कि कई सरकारी योजनाओं का मूल्यांकन, संभालना या रद्द करना जो भारत के कपड़ा उद्योग में कम उत्पादकता और कौशल को प्रोत्साहन देते नहीं प्रतीत होते हैं। इन कार्यक्रमों में प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना और एकीकृत कौशल विकास योजना शामिल हैं।

 

क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं में से एक है – जैसा कि भारत के अधिकतर क्षेत्रों में है – अनौपचारिक प्रतिष्ठानों का प्रभुत्व है जहां कार्यकर्ता उत्पादकता औपचारिक प्रतिष्ठानों की तुलना में 15 गुना कम है।

 

राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की इस रिपोर्ट के अनुसार, कपड़ा क्षेत्र में कौशल की कमी हर स्त पर व्याप्त है, जैसे कि श्रमिकों (ऑपरेटरों , बुनकरों , दर्जी, आदि) , पर्यवेक्षकों, प्रबंधकों , गुणवत्ता नियंत्रण के प्रतिनिधियों, व्यापारियों और डिजाइनरों / डेवलपर्स।

 

कपड़ा उद्योग में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), जोकि उत्पादकता, आधुनिकीकरण और कौशल विकास का एक संचालक है, पिछले वर्ष की तुलना में 2013-14 में दोगुना से अधिक हुआ है लेकिन 2014-15 निवेश विकास ठहर गई है।  उस साल भारत का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, कपड़ा उद्योग में 0.64 फीसदी से अधिक नहीं गया है।

 

कपड़ा उद्योग में एफडीआई : उतार एवं चढ़ाव

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Source:Economic Division, Ministry of Textiles;

 

(भुनिया एक विकास सलाहकार है )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 30 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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