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स्वच्छता से कम होता बाल कुपोषण – मिज़ोरम का उदाहरण

प्राची सालवे एवं सौम्या तिवारी,

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एक नई रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर पूर्वी राज्य, मिज़ोरम में अविकसित (आयु से कम कद) बच्चों की संख्या में 13 प्रतिशत अंक एवं कम वज़न वाले बच्चों की संख्या में पांच प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है।

 

इस गिरावट का कारण स्वच्छता में सुधार होना है। पिछले महीने जारी की गई भारत में पोषण सुरक्षा के लिए भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट 2015 के अनुसार 2011 की जनगणना के अंत में मिज़ोरम में कम से कम 92 फीसदी घरों तक स्वच्छता का पहुंच है जबकि 2001 की जनगणना में यही आंकड़े 82 फीसदी दर्ज की गई है।

 

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट कहती है कि 1990 से 2000 के बीच पीने के पानी के बेहतर स्रोतों की कम से कम 522 मिलियन लोगों तक पहुँच प्राप्त हुई है।

 

बच्चों में खराब स्वास्थ्य का कारण खुले में शौच एवं पर्याप्त रुप से हाथ न धोना पाया गया है।

 

भारत के पांच वर्ष से कम आयु के 40 मिलियन अविकसित बच्चे एवं 17 मिलियन कमज़ोर बच्चे पूरे देश के लिए चुनौती हैं जिसका स्वास्थ्य सूचकांक इसके आर्थिक विकास को पछाड़ रहा है।

 

पीएफएचआई की रिपोर्ट पर आधारित शिशु कुपोषण पर हमारे श्रृंखला के तीसरे लेख में हम बुरे पोषण और स्वच्छता के बीच संबंध की जांच करने के लिए राज्यों के पोषण एवं स्वच्छता आंकड़े को ट्रैक करेंगे।

 

इस श्रृंखला के पहले भाग में हमने बच्चे के स्वास्थ्य और पोषण पर सार्वजनिक खर्च एवं दूसरे भाग में बच्चे के पोषण पर मातृ स्वास्थ्य के प्रभाव के संबंध पर चर्चा की है।

 

पीने के पानी एवं स्वच्छता पर नहीं हो रहा है पर्याप्त खर्च

 

अस्वच्छता से बच्चे अस्वस्थ बनाते है। जल जनित रोग जैसे कि दस्त , हैजा और पीलिया का मुख्य कारण अस्वच्छता ही है।

 

संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दि विकास लक्ष्य (एमडीजी) ने स्वच्छता सुविधाओं के बिना वर्ष 2015 तक आबादी को आधा करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। यूनिसेफ इस लक्ष्य को बढ़ावा देने के लिए 2006 में पानी, सफाई और स्वच्छता कार्यक्रम का शुभारंभ किया था।

 

वर्ष 1999 से भारत सरकार ने देश भर में पीने के पानी और स्वच्छता सुविधाओं में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया है।

 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा 1999 में संपूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम शुरु किया गया था। 2012 में इसे बदल कर निर्मल भारत अभियान किया गया एवं 2014 में इसका नाम बदल कर स्वच्छ भारत अभियान किया गया है।

 

आंकड़ों के मुताबिक 1999-2000 से 25,387.5 करोड़ रुपए (3.8 बिलियन डॉलर) पीने के पानी और साफ-सफाई पर खर्च किया गया है। यदि तुलनात्मक रुप से देखा जाए तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने राज्य के दिसंबर 2015 में आए बाढ़ के प्रकोपों ​​से निपटने के लिए दिल्ली से 25,912 करोड़ रुपए की मांग की है।

 

पीने के पानी और स्वच्छता पर होने वाले खर्च, 1999-2000 से 2015-16

 

 

93 मिलियन से अधिक घरों में नहीं हैं शौचालय

 

यूनिसेफ के रिपोर्ट के अनुसार दस्त रोगों से होने वाले बच्चों की मौत में से करीब 90 फीसदी का सीधा संबंध दूषित पानी,  स्वच्छता की कमी या अपर्याप्त स्वच्छता है।

 

भारत का शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 2001 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 66 मृत्यु से गिरकर 2013 में 42 मृत्यु दर्ज किया गया है। लेकिन अब भी यह आंकड़े गरीब अफ्रीकी देशों, जैसे कि सेनेगल (42) , मलावाई (41) और इथियोपिया (43 ) के बराबर है।

 

2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक भारत में केवल 47 फीसदी घरों में शौचालय है। इन आंकड़ों में 2001 के आंकड़ों की तुलना में 11 प्रतिशत अंक सुधार पाया गया है।

 

भारत में स्वच्छता – शौचालय के साथ वाले घर

 

 

वर्ष 2012 में घरों में अलग शौचालय की आवश्यकता का आकलन करने के लिए 181.5 मिलियन ग्रामीण घरों का सर्वेक्षण किया गया था; सर्वेक्षण को स्वच्छ भारत मिशन के आधार रेखा में किया गया है।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 22 दिसंबर 2015 तक देश के ग्रामीण इलाकों में  93.1 मिलियन घरों में शौचालय नहीं हैं।

 

बच्चे पर रैपिड सर्वे (RSoC) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2013-14 में भारत में करीब 46 फीसदी लोग खुले में शौच जाते हैं। 2005-06 के आंकड़ों की तुलना में इन आंकड़ों में नौ प्रतिशत अंक का सुधार पाया गया है। गौर हो की 2005-06 में खुले में शौच जाने के आंकड़ा 55 फीसदी था।

 

भारत में कुपोषित बच्चे : 2005-06 और 2013-14

 

 

मिजोरम की प्रगति का अक्स दिखता है स्वस्थ्य बच्चों पर

 

बच्चों के पोषण के संबंध में जिन राज्यों की स्थिति बेहतर है, वहां स्वच्छता और बच्चे के पोषण के बीच एक मजबूत कड़ी दिखती है।

 

इसका सबसे अच्छा उद्हारण मिज़ोरम है जहां 2006 से 2014 के बीच अविकसित बच्चों की संख्या में 13 प्रतिशत अंक  एवं कम वज़न वाले बच्चों की संख्या में पांच प्रतिशत अंक गिरावट हुई है।

 

पोषण मानकों के संदर्भ में जिन राज्यों की स्थिति सबसे खराब है उन राज्यों में शौचालयों के साथ काफी कम घर पाए गए हैं।

 

पांच वर्ष या उससे कम आयु के अविकसित बच्चे, पांच बदतर स्थिति वाले राज्य

 

 

पांच वर्ष या उससे कम आयु के अविकसित बच्चे, पांच बेहतर स्थिति वाले राज्य

 

 

पांच वर्ष या उससे कम आयु के कमज़ोर बच्चे, पांच बदतर स्थिति वाले राज्य

 

 

पांच वर्ष या उससे कम आयु के कमज़ोर बच्चे, पांच बेहतर स्थिति वाले राज्य

 

 

पांच वर्ष या उससे कम आयु के कम वज़न वाले बच्चे, पांच बदतर स्थिति वाले राज्य

 

 

पांच वर्ष या उससे कम आयु के कम वज़न वाले राज् बच्चे, पांच बेहतर स्थिति वाले राज्य

 

 

सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में स्वच्छता सुविधाओं में बहुत कम प्रगति हुई है। यदि आंकड़ों पर नज़र डालें तो अविकसित बच्चों के संबंध में बिहार में केवल आठ प्रतिशत अंक सुधार हुआ है, झारखंड में तीन प्रतिशत अंक, और छत्तीसगढ़ में कोई सुधार नहीं दर्ज किया गया है। हालांकि, 2005-06 और 2013-14 के बीच अविकसित बच्चों में 10 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज की गई है।

 

आधारभूत सर्वेक्षण के अनुसार स्वच्छ भारत अभियान के शुरु होने के बाद, 2014 से बिहार,  झारखंड और छत्तीसगढ़ 44 फीसदी, 52 फीसीदी और 50 फीसदी आवश्यकता को पूरा करने में कामयाब रहे हैं।

 

पोषण को प्रभावित करने वाला केवल एक कारक है स्वच्छता; उद्हारण के तौर पर, एक बार के आंध्र प्रदेश के आंकड़े बताते हैं कि 2006 और 2014 के बीच , स्वच्छता के क्षेत्र में सुधार  होने के बावजूद कमज़ोर बच्चों के अनुपात में छह प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।

 

पिछले एक दशक में किए गए अध्ययनों में पोषण में सुधार के लिए साफ-सफाई रखने पर अधिक ज़ोर दिया गया है।

 

इस संबंध में बंग्लादेश एक अच्छा उद्हारण हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान ( IFPRI ), वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार 1990 और 2012 के बीच, बंग्लादेश में कुपोषण में कमी होने के साथ ही खुले में शौच जाने के आंकड़े 34 फीसदी से गिर कर 2.5 फीसदी तक पहुंचा है।

 

श्रृंखला समाप्त। पहला और दूसरा भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

(सालवे एवं तिवारी इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 6 जनवरी 2016 को indiapsend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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