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स्वाइन फ्लू के मामलों में 9 गुना वृद्धि, भारत इस मामले को लेकर गंभीर नहीं

स्वागता यदवार,

नई दिल्ली के अस्पताल में H1N1 फ्लू स्क्रीनिंग के लिए कतार में मास्क पहने इंतजार करते लोग।

 

मुंबई: अब तक इस वर्ष  H1N1 या स्वाइन फ्लू से 18,000 लोग संक्रमित हुए हैं और 871 लोगों की जान गई है। पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष इन आंकड़ों में नौ गुना वृद्धि हुई है। हम बता दें कि पिछले साल स्वाइन फ्लू के 1,786 मामले सामने आए थे और इसमें 265 लोगों की जान चली गई थी।

 

वर्ष 2015 में बड़े पैमाने पर यह रोग फैलने के दो साल बाद भी इस मामले में भारत ने इससे लड़ने की दिशा में जो कदम उठाया है, वह अपर्याप्त है। यहां हम यह भी बताते चलें कि 2015 में करीब 42,500 लोग इस रोग से संक्रमित हुए थे और 3,000 लोगों की मौत हुई थी।

 

मौसमी फ्लू का टीका भारत की राष्ट्रीय टीकाकरण नीति का हिस्सा नहीं है, और एक सार्वजनिक डेटाबेस, जो वायरस के परिमाण, साल-दर-वर्ष विविधता, तनाव, जोखिम कारक आदि को माप सकता है, उसे ठीक तरह से नहीं रखा गया है।

 

डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पुरानी बीमारी से जूझते लोगों में कम प्रतिरक्षा शक्ति के कारण वायरस संक्रमित होने की संभावना ज्यादा होती है। डॉक्टरों का सुझाव है कि ऐसे व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वालों का टीकाकरण होना चाहिए।

 

इस वर्ष स्वाइन फ्लू के मामलों में वृद्धि

 

स्वाइन फ्लू या इन्फ्लुएंजा ए H1N1 वायरस के कारण होता है, जो मुख्य रूप से श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। इसके लक्षण मौसमी फ्लू के समान होते हैं- जैसे बुखार, ठंड लगना, गले में खराश, सिरदर्द, खांसी और अचानक शरीर में दर्द होना। क्योंकि यह संक्रमित व्यक्ति द्वारा खांसने और छींकने से फैलता है, इसलिए इसका संचरण तेजी से होता है।

 

H1N1 इन्फ्लूएंजा का सबसे बड़ा प्रकोप 2015 में हुआ था, जब कम से कम 42,500 से ज्यादा लोग इस वायरस से संक्रमित हुए थे और करीब 3,000 लोगों की मृत्यु हुई थी। लेकिन इस वर्ष संक्रमित लोगों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 10 गुना ज्यादा है।

 

संक्रमण के 50 फीसदी मामलों के साथ महाराष्ट्र पर इसका बद्तर प्रभाव पड़ा है। महाराष्ट्र में  इन्फ्लूएंजा के 4,014 मामले सामने आए हैं, जबकि इससे होने वाली मौतों की संख्या 414 दर्ज की गई है।

 

इस बीच, गुजरात में इस साल स्वाइन फ्लू से 210 लोग मर गए हैं। 13 से 15 अगस्त तक तीन दिनों के भीतर 30 से अधिक मौते हुई हैं। 16 अगस्त, 2017 को, गुजरात हाईकोर्ट ने अहमदाबाद नगर निगम को स्वाइन फ्लू को गंभीरता से न लेने के लिए फटकार लगाई है।

 

स्वाइन फ्लू के मामलों में वृद्धि क्यों?

 

रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या में वृद्धि का कारण बेहतर राष्ट्रीय निगरानी और बेहतर प्रयोगशाला खोज प्रणाली है, जैसा कि पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी निदेशक देवेंद्र मौर्या ने इंडियास्पेंड को बताया है।

 

स्वाइन फ्लू के मामले और मौत, 2009-2017

Source: Ministry of Health & Family Welfare, Rajya SabhaNote: Figures for 2009 are for the period May to December; Figures for 2017 are up to July 16, 2017.

 

विशेषज्ञों का कुछ और ही कहना है । वे मानते हैं कि संख्या में वृद्धि का एक कारण हासिल की गई प्रतिरक्षा की ताकत का समाप्त होना है।  प्रतिरक्षा की ताकतसमय के साथ या संक्रमण की चपेट में आकर खत्म होते हैं।

वर्ष 2015 के बाद, जब बड़ी आबादी से इस वायरस का सामना हुआ था तब 2016 में H1N1 के केवल 1,786 मामले दर्ज किए गए थे। ऐसा लगता है कि इस साल अधिक मामले हैं, क्योंकि कम लोग प्रतिरक्षित हैं।

 

प्रारंभिक पहचान है महत्वपूर्ण

 

बुजुर्ग, छोटे बच्चों और पुरानी बीमारी से जूझते लोगों में वायरस के संक्रमित होने की संभावना ज्यादा होती है। ठाणे के वेदांत अस्पताल के सलाहकार चिकित्सक, राहुल टुले कहते हैं, “हम निश्चित रूप से युवा रोगियों के अधिक मामले देख रहे हैं। वायरस हवा के माध्यम से फैलता है, इसलिए युवा लोगों पर अधिक प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे मॉल, ट्रेन, सिनेमा हॉल, रेलवे स्टेशन और बस यात्रा जैसे भीड़ भरे हुए स्थानों के संपर्क में ज्यादा होते हैं। “

 

पहले लक्षण की पहचान के साथ ही चिकित्सा सहायता की मांग करने से परिणाम बेहतर मिलते हैं। मुंबई स्थित संक्रामक रोग विशेषज्ञ ओम श्रीवास्तव ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि “स्वाइन फ्लू के कारण होने वाली मौतों को आम तौर पर उन लोगों में देखा जाता है, जिनका समय पर इलाज नहीं किया जाता है और जो दवा के पाठ्यक्रम को पूरा नहीं करते हैं। यदि आपको संदेह है कि किसी मरीज को H1N1 है, तो फौरन उपचार शुरू करें। आप जितना अधिक इंतजार करेंगे,  परिणाम और बद्तर होने की संभावना होती है। “

 

निगरानी अब भी बद्तर

 

हालांकि भारत में एक एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) है, जिसे इन्फ्लूएंजा नमूनों को एकत्रित करने वाले 11 प्रयोगशालाओं से नियमित आधार पर नमूने प्राप्त करना चाहिए। लेकिन अपर्याप्त प्रतिक्रिया के कारण इसकी आलोचना की गई है।

 

मणिपाल वायरस रिसर्च सेंटर के प्रयोगशाला में विरोलॉजिस्ट जी. अरुण कुमार ने इंडियास्पेंड को बताया,”वर्तमान आईडीएसपी परिणाम गलत हैं। जिला निगरानी अधिकारी केवल तभी नमूनों को इकट्ठा करते हैं, जब मौत होती है या फ्लू का मौसम होता है। जबकि यह साप्ताहिक और पूरे वर्ष होना चाहिए। “

 

इन्फ्लूएंजा ए वायरस का एक प्रकार H1N1 के अलावा, H3N2 और इन्फ्लूएंजा बी भी है। इन दोनों के लक्षण स्वाइन फ्लू के समान होते हैं, जिससे मौत भी हो सकती है। लेकिन उनके डेटा इसलिए एकत्र नहीं किए जाते हैं, क्योंकि उनके मामले ज्यादा नहीं हैं।

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और विरोलॉजिस्ट टी जैकब जॉन ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि भारत में एक समर्पित सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर का अभाव है। वह कहते हैं, “सार्वजनिक स्वास्थ्य (कैडर) के अभाव में, सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी को लागू नहीं किया जा सकता।

 

आईडीएसपी एक रोक-अंतर व्यवस्था है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी की परिभाषा के भीतर नहीं आती है। ” वह आगे कहते हैं, बिना निगरानी के वायरस का साल-दर-साल के विविधताएं, तनाव, जोखिम कारक, मृत्यु -दर जानना संभव नहीं है।

 

आईडीएसपी निजी या सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ, या तपेदिक, मलेरिया आदि के लिए राष्ट्रीय ऊर्ध्वाधर कार्यक्रमों के साथ एकीकृत नहीं है। वह कहते हैं, आईडीएसपी आंकड़े एकत्र करता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य में, निगरानी आंकड़े प्राथमिक उद्देश्य नहीं हैं, बल्कि यह हाशिये का काम है।” इसे समझाते हुए उन्होंने कहा कि इसकी बजाय हमारा ध्यान उन सामाजिक और पर्यावरणीय निर्धारकों पर होना चाहिए, जो रोग का कारण बनते हैं।

 

फ्लू टीके से बचाव, लेकिन सरकार का ध्यान नहीं

 

एक मौसमी फ्लू का टीका इन्फ्लूएंजा वायरस के प्रति 60-80 फीसदी सुरक्षा प्रदान करता है और लक्षणों की गंभीरता को कम करता है। टीकाकरण H1N1 इन्फ्लूएंजा को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है, क्योंकि इससे प्रतिरक्षा को विकसित करने में मदद मिलती है। फ्लू टीका 8-10 महीनों के लिए सुरक्षा प्रदान करता है, और पश्चिमी देशों में वार्षिक फ्लू टीकाकरण आम है। हालांकि, भारत में टीके के संबंध में जागरूकता कम है।

 

2015 के विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक समीक्षा (उदाहरण के लिए, अमेरिका में प्रति हजार 286 लोगों के मुकाबले) के अनुसार, मौसमी फ्लू का टीका भारत की राष्ट्रीय टीकाकरण नीति का हिस्सा नहीं है। मौसमी फ्लू के टीके की कुल कवरेज प्रति 1,000 लोगों में 10 से कम है।

 

समीक्षा में कहा गया है कि सबसे कम और मध्यम आय वाले देशों में मौसमी फ्लू के टीकाकरण की कमी ( 5 फीसदी से कम ) कम है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के माध्यम से टीके मुक्त होने से कवरेज बढ़ जाती है।

 

विभिन्न ब्रांडों के लिए 500 से 700 रुपए के बीच की कीमत, H1N1 टीका सार्वभौमिक रूप से देने के लिए बहुत महंगा हो सकता है, लेकिन ये बुजुर्गों, बच्चों, पुरानी बीमारी से जूझते लोगों, गर्भवती महिलाओं और स्वास्थ्य श्रमिकों जैसे कमजोर वर्गों को लक्षित किया जा सकता है।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 अगस्त 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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