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‘हम केवल पर्यावरण संकट से ही नहीं, सरकार की अनदेखी से भी जूझ रहे हैं !’

प्रेरणा सिंह बिंद्रा,

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पश्चिमी घाट में एक मिनी जलविद्युत संयंत्र, एक जैवविविधता हॉस्टस्पॉट। 2014-17 के बीच, 36,500 हेक्टेयर जंगल जमीन यानी  63 फुटबॉल मैदानों के बराबर की जमीन गैर-वन उद्देश्यों जैसे खनन, राजमार्गों और उद्योगों के लिए हर रोज साफ किया गया था।

 

जनवरी, 2018 में जारी वैश्विक पर्यावरणीय परफॉर्मेंस इंडेक्स (ईपीआई) की सूची में भारत  नीचे के पांच देशों में रहा है। हम बता दें कि पिछले दो वर्षों में भारत 36 स्थान नीचे गिरा है। हाल में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि भारत पर्यावरण संकट का सामना कर रहा है।

 

निम्नलिखित निष्कर्षों पर विचार करें:

 

  • हाल ही में ग्रीनपीस के अध्ययन में किए गए 280 भारतीय शहरों में से कोई भी साफ हवा के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) मानकों से मेल नहीं खाता है। इसमें दिल्ली का प्रदर्शन बद्तर रहा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 5 फरवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।
  • यमुना, जो दिल्ली के बीच से बहती है, उसमें प्रति मिलियन 16 मिलियन मल कोलीफॉर्म ( पीपीएम ) पदार्थ हैं। पीने के पानी के लिए मानक 500 पीपीएम है।
  • बेंगलुरू के झीलों में अक्सर कचरे और उनमें अनुपचारित सीवेज फेंकने के कारण आग लग जाती है।

पर्यावरण संरक्षण में भारत के खराब प्रदर्शन के बारे में सरकार चिंतित नजर नहीं आती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री (एमओईएफसीसी) हर्षवर्धन ने उन्हें ‘सिर्फ रैंकिंग’ कह कर खारिज कर दिया है।

 

पर्यावरण संबंधी शिकायतों का निवारण करने वाले नागरिक न्यायपालिका की ओर जा रहे हैं, जो 18 अक्तूबर, 2010 को संसद में एक अधिनियम के रूप में स्थापित किया गया था।

 

पर्यावरण के वकील ऋत्विक दत्ता ने इंडियास्पेंड को बताया, “ग्रीन की ट्रिब्यूनल अब भारत में पर्यावरण आंदोलन का केंद्र है। यह लोगों के लिए पहला और अंतिम सहारा बन गया है, क्योंकि उनकी स्थानीय सरकारें पर्यावरण की सुरक्षा के लिए काम नहीं कर रही हैं। लेकिन राजनीतिक उदासीनता, वास्तव में एनजीटी को अप्रभावी बना रहा है। “

 

दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून स्नातक, 43 वर्षीय  दत्ता, ने वर्ष 2001 में पर्यावरण कानून का अनुसरण करना शुरु किया। उसका पहला मामला खनन कंपनी वेदांत के खिलाफ था, जहां उन्होंने दक्षिणी-पश्चिमी ओडिशा में नियामगिरी पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन पर प्रतिबंध लगाने के लिए डोंगरिया कोंध आदिवासियों का प्रतिनिधित्व किया था।

 

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एनजीटी अधिनियम में 40 विशेषज्ञ सदस्य होने की आवश्यकता है, “पर्यावरण वकील ऋत्विक दत्ता कहते हैं, “जब वर्ष 2011 में दिल्ली बेंच में शुरू हुआ था तक इसमें 20 सदस्य थे। अब, इसमें केवल पांच हैं। ”

 

दत्ता ने अन्य मेगा खनन परियोजनाओं के खिलाफ भी मामलों पर काम किया है। आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी जिले में 9,000 करोड़ रुपये पोलावरम बहुउद्देश्यीय सिंचाई परियोजना और हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में लाफाज चूने खनन परियोजना। दत्ता ने रत्नागिरी किसानों के लिए भी लड़ाई लड़ी, जहां जेएसडब्ल्यू के थर्मल पावर प्लांटों के कारण वहां आम के बागों पर असर पड़ता।

 

वर्ष 2005 में, दत्ता ने एक और पर्यावरण वकील राहुल चौधरी के साथ वन और पर्यावरण (लीफ) के लिए कानूनी पहल की स्थापना की। दो साल बाद, उन्होंने पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) संसाधन और रिस्पांस सेंटर की स्थापना की, जो एक महत्वपूर्ण विश्लेषण के साथ ईआईए रिपोर्टों पर एक सुलभ डेटाबेस प्रदान करता है।

 

इंडियास्पेंड के साथ एक साक्षात्कार में, ऋत्विक ने भारत में हरियाली के नष्ट हो जाने की व्याख्या की कि कैसे वर्तमान सरकार पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कम कर रही है और एनजीटी कैसे कमजोर हो रही है।

 

हाल के अध्ययनों से पता चला है कि पर्यावरण के प्रदर्शन में भारत का स्थान दुनिया में नीचे के राष्ट्रों में है, जबकि यह पर्यावरण संघर्ष में दुनिया में सबसे ऊपर है। यह क्या संकट बताता है?

 

इस पर विचार करने का एक तरीका यह है कि संघर्षों की रिपोर्टिंग का स्तर उच्च है ( चीन के विपरीत ) और ऐसा इसलिए भी है क्योंकि सिस्टम आपको अपनी आवाज उठाने की अनुमति देता है।

 

इसलिए भारतीय परिदृश्य में पर्यावरण संघर्ष का एक उच्च स्तर देख रहा है। एक कारण यह है कि, पूर्ण संख्या में, दुनिया के किसी अन्य देश की तुलना में भारत में अधिक लोग ( 250 से 300 मिलियन ) प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। हमारे लोग आजविका के लिए जंगलों, झीलों, समुद्रों, नदियों, घास के मैदानों, पहाड़ियों पर निर्भर हैं। और ये सभी पारिस्थितिक तंत्र गंभीर दबाव में हैं।

 

हिमालय दुनिया में बांधों की उच्च सांद्रता स्थापित करने के लिए निर्धारित हैं, इसलिए हिमाचल, अरुणाचल और सिक्किम जैसे राज्य पानी और बांध ( जंगलों के विस्थापन और नुकसान के साथ ) के साथ संघर्ष कर रहे हैं। मध्य भारत में ( छत्तीसगढ़ और झारखंड ) खनन के लिए जमीन के अधिग्रहण से लोग गुस्से में हैं। गोवा को कोयले की गलियारे में बदलने की योजनाओं के खिलाफ लोगों में रोष है। तमिलनाडु (वास्तव में पूरे देश में ) रेत के खिलाफ एक युद्ध जारी है। अधिकारियों, पत्रकारों, पर्यावरणविदों की हत्या और और रेत माफिया द्वारा अवैध खनन (मुद्दों) को उठाने के लिए परेशान किए जाने के मामले हैं।

 

इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत के जंगल बहुत गंभीर दबाव में हैं। 2014 से 2017 के बीच, 36,500 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों जैसे कि खनन, राजमार्ग, उद्योग और अन्य के लिए हटा दिया गया था। यह 12,166 हेक्टेयर के वार्षिक औसत या 63 फुटबॉल मैदानों के समकक्ष हर एक दिन के बराबर है। इसमें अतिक्रमण शामिल नहीं है।

 

दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत में हैं। यमुना  भारत की राजधानी के बीच से बह रही है, जिसमें प्रति मिलियन 16 मिलियन मल वाले कोलिफोर्म पदार्थ (पीपीएम) हैं। पीने योग्य पानी के लिए मानक 500 पीपीएम है। यहां तक कि आपके शौचालयों में आने वाला पानी इससे ज्यादा साफ हो सकता है।

 

‘द लंसेट’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण 2.5 मिलियन लोगों की मृत्यु समय से पहले हो रही है। पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन, जो एक डॉक्टर भी हैं, ने इन खबरों से इनकार किया है कि वायु प्रदूषण हर साल लाखों लोगों को मौत की ओर ले जाता है। इसलिए हमारे पास सिर्फ एक पर्यावरण संकट नहीं है, सरकार की अनदेखी भी बड़ी समस्या है।

 

क्या सरकार ऐसे नियमों को कम करने से संकट को बढ़ाती है जो जंगलों में मंजूरी के अनुसार पर्यावरण की सुरक्षा करता है ? संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार की तुलना में मौजूदा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) शासन कैसी व्यवस्था कर रही है ?

 

जहां तक ​​पर्यावरण संबंधी मंजूरी का सवाल है,, दर लगातार उच्च है, 90 फीसदी से ज्यादा,  2014 से पहले या बाद में यूपीए-2 या एनडीए -2 हो।

 

लेकिन यूपीए के समय में ‘एमओईएफसीसी’ ने कम से कम संरक्षण के लिए कुछ सक्रिय उपाय किए। उदाहरण के लिए, गंभीर रूप से प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर रोक लगाई गई थी, और पश्चिमी घाट के कुछ पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और सुरक्षा की पहल की गई थी। यह अपने तर्कसंगत निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा, लेकिन कम से कम एक प्रयास था। मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के बफर पर न्यूट्रीनो ऑब्जर्वेटरी जैसी कुछ हानिकारक परियोजनाओं को रोक दिया गया था। और, जाहिर है, राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट-2010, संसद में पारित किया गया था।

 

2014 के बाद, आप पर्यावरणीय आधार पर किसी गतिविधि या परियोजना पर रोक लगा नहीं पाए  या पर्यावरण संरक्षण के लिए भी एक भी पहल आप नहीं देखेंगे। यहां तक ​​कि एक समर्पित मंत्री भी नहीं है। प्रकाश जावड़ेकर, जो पहले पोर्टफोलियो रखते थे और अभी डॉ. हर्षवर्धन अंशकालिक मंत्री हैं।सरकार का कहना है कि वे ‘पर्यावरण और विकास’ को संतुलित रखते हैं। संतुलन कहां है? संतुलन तब होती है जब दोनों पक्ष बराबर होते हैं।

 

आपके पास एक मंत्रालय है, जो राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्य में अपनी उपलब्धियों के रूप में हानिकारक परियोजनाओं को समाशोधन मानता है- एमओईएफसीसी की वेबसाइट सूची पर अपलोड किए गए एक दस्तावेज के रूप में इसकी पहल और उपलब्धियां है कि एनबीडब्ल्यूएल 2014-2017 के बीच 400 + परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है।

 

क्या आप वर्तमान शासन के विशिष्ट कदम, जो पर्यावरणीय नियमों को कम करते हैं, उसपर विस्तृत रुप से बता सकते हैं?

 

नेशनल वाटरवेज एक्ट-2016, जिसका उपयोग नदियों को राजमार्गों में परिवर्तित करना है ( कोयला, तेल, रसायन के कार्गो जहाजों के भारी यातायात के साथ ) अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं को खारिज करते हुए संसद द्वारा पारित किया गया। सरकार जलमार्ग के लिए पर्यावरण अनुमोदनों की मांग नहीं कर रही है।

 

झीलों (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017, आर्द्रभूमि विनाश को वैध बनाने के लिए एक ढांचे के अधिक है। यह झीलों के रूप में पहचाने जाने वाले कुल क्षेत्रफल का 65 फीसदी को कवर करने में विफल है। नेशनल वाटरलैंड विनियामक प्राधिकरण का खंडन करता है, एक आर्द्रभूमि की परिभाषा को कम करता है, और पर्यावरण प्रभाव आकलन की आवश्यकता से दूर किया है।

 

खनन अनुमोदन का कार्य भी जिला स्तर तक चला गया है, जिसमें एक समिति है जिसमें सिंचाई विभाग के जिला प्रमुख अभियंता होंगे जो एक सदस्य के रूप में अध्यक्ष और खनन अधिकारी होंगे।जिला पर्यावरण नियमन प्राधिकरण का नेतृत्व जिला मजिस्ट्रेट करेंगे, जिनका काम राजस्व में वृद्धि करना है।

 

यह मुर्गियों की रक्षा करने के लिए लोमड़ी को कहने बराबर है। वास्तविक नियंत्रण रेखा के 100 किमी के भीतर वन क्षेत्र में मंजूरी के लिए वन (संरक्षण) अधिनियम के तहत इसने सामान्य अनुमोदन प्रदान किया है। जिसका अर्थ है कि प्रत्येक प्रोजेक्ट का अलग-अलग मूल्यांकन नहीं किया जाएगा।

 

जलमार्ग अधिनियम और बड़े बांध, सरकार की प्रमुख प्राथमिकता वाली योजनाओं में से हैं। क्या इसका विरोधाभास नहीं हैं – नमामी गंगे?

 

हां, यह एक गंभीर विरोधाभास है, लेकिन इससे पहले कि हम उस में आते हैं, मैं एक और बिंदु को लाना चाहता हूं। जब नई सरकार सत्ता में आई तो जल संसाधन मंत्रालय का एक नया नामकरण हुआ- जल संसाधन, नदियों का विकास और गंगा कायाकल्प मंत्रालय। यहां पर संदेश यह है कि गंगा का पुनर्जागरण किया जाना है, लेकिन अन्य नदियों को टेप किया जा सकता है, बांध दिया जा सकता है, विकसित किया जा सकता है। मतलब यह कि वे केवल नदियों के रुप में नहीं संसाधनों के रुप में देखे जाएंगे। इससे नदियों के बीच वर्ग और जाति का भेदभाव पैदा हो रहा है, जहां कम-जाति वाली नदियों की तुलना में गंगा एक ऊपरी जाति नदी है। ब्रह्मपुत्र, तिस्ता, नर्मदा, कावेरी  सभी प्रदूषण से पीड़ित हैं । अन्य नदियां इसकी कायाकल्प परियोजनाओं में नहीं हैं।

 

इसलिए, हमारे पास गंगा के लिए एक अलग मंत्रालय है। फिर भी, गंगा की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कार्य नहीं है। इस कार्यक्रम के अंदर मुख्य जोर प्रवाह उपचार संयंत्रों पर है, जैसे कि वे स्थापित करना आसान है। नदी के प्रवाह को सुनिश्चित करने पर कम ही बात होती है, जो पानी को साफ करने के लिए आवश्यक है। यह नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने, मछली और अन्य जलीय जीव  जैसे डॉल्फिन आदि की जिंदगी के लिए भी जरूरी है।

 

लेकिन एक नदी के प्रवाह के लिए, आपको तर्कसंगत बनाने और बांधों को रोकने की आवश्यकता है और कोई ऐसा नहीं करना चाहता है।

 

लेकिन क्या हमें बिजली के लिए बांधों की आवश्यकता नहीं है? लगभग 300 मिलियन भारतीयों तक बिजली की पहुंच नहीं है।

 

यह बिजली के बारे में नहीं है। बांधों के निर्माण, ठेकेदार, निर्माण, इस्पात की खरीद, सीमेंट इत्यादि के आसपास एक गठजोड़ है- और वही संचालक हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, जहां तक ​​बिजली का संबंध है, हर एक दिन, भारत में 3,000-4,000 मेगावाट बिजली का कोई भी खरीदार नहीं है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने स्वयं ही कहा है कि 2017 तक अगले 10 वर्षों में बिजली संयंत्र की कोई आवश्यकता नहीं है।

 

फिर भी, हम बिजली संयंत्रों को चालू कर देते हैं। सितंबर 2017 में झारखंड के गोड्डा जिले में एक 1600 मेगावाट बिजली संयंत्र ( संयोग से अडानी )को मंजूरी दी गई थी। यह बंगलादेश को अपनी पूरी बिजली उत्पादन बेचने के लिए जंगलों और बहु-फसल उपजाऊ भूमि को नष्ट कर देगा। वहां स्थानीय किसानों में भारी अशांति है, जो अपनी जमीन छोड़ना नहीं चाहते हैं।

 

हां, भारत में लगभग 300 मिलियन लोगों तक बिजली की पहुंच नहीं है, लेकिन यह इसलिए है क्योंकि कनेक्टिविटी नहीं है। हम ऐसे हालात में हैं जहां हमारे पास 1000 मेगावाट अतिरिक्त ऊर्जा हो सकती है, लेकिन उस अंतिम गांव के लिए कोई वितरण नहीं है, जिसमें 30 लोग हैं।

 

आपको यहां हवा या सौर ऊर्जा संयंत्र की जगह की जरूरत है, जो कि आठ से 10 वर्षों में ही स्थापित हो पाएगी। लेकिन फिर भी हम उस मेगा पावर प्रोजेक्ट में एक पूरी पीढ़ी के बिना बिजली के लंबी अवधि में निवेश करेंगे।

 

ये बिजली संयंत्र किनके लिए हैं? उनके लिए नहीं है जो अब भी बिजली से वंचित हैं। जब हम एक बड़े कॉरिडोर की रक्षा करने की बात करते हैं, जो एक विद्युत पारेषण लाइन या बिजली संयंत्र के कारण अवरुद्ध हो रही है, तो लोग कहते हैं कि ‘लेकिन भारत को बिजली की जरूरत है।’ लेकिन हम नहीं करते हैं, हमारे पास इसके अतिरिक्त है, लेकिन उन तक पहुंच नहीं है। वास्तविक मुद्दे खराब प्रबंधन, वितरण विफलता, संचरण घाटे, अक्षम संयंत्र हैं- लेकिन हम इन्हें हल नहीं कर पा रहे हैं।

 

एनजीटी को कमजोर करने का भी एक प्रयास है?

 

एनजीटी को खोखला किया जा रहा है। एनजीटी अधिनियम में न्यायाधिकरण को 40 विशेषज्ञ सदस्य होने की आवश्यकता है। जब यह 2011 में दिल्ली बेंच में शुरू हुआ था तो इसमें 20 सदस्य थे। अब इसमें पांच सदस्य हैं।

 

भोपाल, चेन्नई, पुणे और कोलकाता में एनजीटी बेंच कोरम की कमी के कारण गैर-कार्यात्मक हैं। चेन्नई की पीठ बंद हो गई है, क्योंकि इसमें एक भी सदस्य नहीं है, जबकि कोलकाता और पुणे में केवल एक न्यायिक सदस्य है। दिसंबर 2017 से कोलकाता में कोई निर्णय पारित नहीं किया गया है।

 

यह सिर्फ संख्याओं के बारे में नहीं है। ट्राइब्यूनल कई विषयों पर जैसे प्रदूषण, विषैले अपशिष्ट, कीटनाशकों, वन विनाश आदि मामलों को सुनवाई करता है। प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए इसे विशेष विशेषज्ञता वाले सदस्यों की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, दिल्ली की बेंच के वर्तमान में एक प्रमुख मुद्दा पीएम 2.5 / 10 पीएम की सुनवाई करना है, जहां वन अधिकारियों ( जिसमें केवल एकमात्र विशेषज्ञ सदस्य हैं ) की गहराई से बाहर की बात है ये।

 

इसका नतीजा यह है कि मामलों में देरी हो रही है। एक दिन में 80-90 मामले सुनने से लेकर  अब केवल 10 मामले सुनने तक। यह एनजीटी के उद्देश्य को धराशायी करता है, जिसे तेज और शीघ्र न्याय प्रदान करना था। आवश्यकता है कि हर मामले का निर्णय छह महीने के भीतर होना चाहिए।

 

रिक्त पदों को न भरना सरकार की ओर से एक बहुत ही जानबूझकर कार्रवाई है। जिससे ये सुनिश्चित हो सके कि यह संस्थान गैर-कार्यात्मक और बेकार है। एक याचिका के जवाब में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने अगस्त 2017 में सरकार से पूछा कि क्या वह एनजीटी को बंद करना चाहता है।

 

एक और बहुत हानिकारक कदम वित्त अधिनियम- 2017 था। इसने एक स्वतंत्र समिति द्वारा अपने सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया को बदलकर एक निर्णय लिया, जो कि सचिव, एमओईएफसीसी द्वारा तय किया गया है। इसमें बर्खास्तगी और अन्य सेवा परिस्थितियों की एमओईएफसीसी शक्ति भी प्रदान की गई थी। इस प्रकार एनजीटी को इसके लाभकारी बना दिया गया। याद रखें, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दिए गए एनजीटी प्रश्नों के फैसले और उन्हें कानूनों का पालन न करने के लिए कार्य करने का अधिकार है।

 

सौभाग्य से, इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है।

 

एक और चिंता पर्यावरण कानून संरचना को कमजोर करने और खत्म करने के लिए व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसे पहली बार उच्च स्तरीय टीएसआर सुब्रमण्यम समिति ने जुलाई 2014 में करने का प्रयास किया था। रिपोर्ट संसदीय समिति में अटकी हुई है, लेकिन कानून को कमजोर करने और इसे नष्ट करने की प्रक्रिया चल रही है।

 

क्या आप इसका उदाहरण दे सकते हैं?

 

दिसंबर 2016 एमईईएफसीसी की अधिसूचना, उपनियमों के निर्माण में पर्यावरणीय चिंताओं को एकीकृत करने के लिए बुलाया जाता है, चूंकि भवन और निर्माण क्षेत्र एक प्रमुख प्रदूषक है और इससे ग्रीनहाउस गैस पैदा होते हैं।

 

फिर भी, उसी अधिसूचना ने सभी पर्यावरण कानूनों को हटा दिया है, ( वायु (प्रदूषण नियंत्रण और नियंत्रण) अधिनियम, जल (प्रदूषण नियंत्रण और नियंत्रण नियंत्रण) अधिनियम, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम ) और निर्माण उद्योग के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन की आवश्यकता को खारिज कर दिया है। इसलिए, एनजीटी से पहले पर्यावरणीय आधार पर किसी भी परियोजना को चुनौती नहीं दी जा सकती है।

 

सरकार ने बताया कि पर्यावरण में सुधार के लिए और व्यापार करने में आसानी के लिए नए संशोधन किए गए हैं। एक अन्य कथित उद्देश्य किफायती आवास प्रदान करना था और गरीबों की मदद करना था। लेकिन संशोधन मल्टीप्लेक्स, वाणिज्यिक परिसर और होटल पर लागू होती है। यह संशोधन बेतुका है, क्योंकि यह एक ऐसे समय में आता है, जब शहरी बुनियादी ढांचा अगले 10 वर्षों में पिछले 50 वर्षों की तुलना में हुए वृद्धि से अधिक बढ़ने के लिए निर्धारित है।

 

एनजीटी में अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। अपने फैसले में, जिसने अधिसूचना को रद्द कर दिया, एनजीटी ने कहा कि यह वास्तव में गरीबों को किफायती आवास उपलब्ध कराने की आड़ में रियल एस्टेट सेक्टर की मदद करने के लिए एक चाल है। इसमें यह भी बताया गया है कि व्यापार करने में आसानी जीवन के अधिकार और पर्यावरण के अधिकार पर नहीं आ सकती।

 

तो क्या आप मानते हैं कि एनजीटी रुकावट लगा रहा है, बड़ी परियोजनाओं और विकास को रोक रहा है?

 

ये सच नहीं है। मिथक के विपरीत कि एनजीटी विकास को रोक रही है।  बहुत कम उदाहरण हैं जहां एनजीटी ने एमओईएफसीसी द्वारा उठाए गए निर्णय को रद्द कर दिया है। एनजीटी के पूरे इतिहास में, रोके गए परियोजनाओं की कुल संख्या 10 से अधिक नहीं है, जिनमें से छह सुप्रीम कोर्ट से राहत पाने में कामयाब रहे हैं। इसी अवधि में, सरकार ने कुछ 100,000 परियोजनाओं को मंजूरी दे दी होगी। हमारे विश्लेषण के अनुसार,  2017 में, सरकार ने लगभग 10,000 वन अनुमोदन दिए और केवल तीन को रोका गया, जिनमें से दो में तीन हेक्टेयर से कम वन क्षेत्र हैं।

 

एनजीटी को हटाने का कारण इसका बाधावादी होना नहीं है, क्योंकि यह जनता को सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाने में सक्षम बनाता है, और इसे जवाबदेह रखता है, इसलिए ऐसा किया जा रहा है।

 

(बिंद्रा ‘नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ’ के पूर्व सदस्य और ‘द वैनीसिंग: इंडियाज वाइल्डलाइफ क्राईसिस’ के लेखक हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 18 फरवरी 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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