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हरियाणा पंचायत चुनाव : प्रत्याशिओं के लिए शिक्षा ज़रुरी, आधी आबादी अयोग्य

भानुप्रिया राव,

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मेवात (हरियाणा) : 51 वर्षिय अशुबी खान परेशान हैं। एक दशक तक खान गांव की सरपंच रही हैं। दस लोगों की टीम, जिसमें सात निरक्षर महिलाएं एवं तीन साक्षर पुरुष हैं, के साथ अशुबी खान ने अपनी ज़िम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभाने की कोशिश की है।

 

एक दशक के दौरान, पुरुष प्रतिरोध होने के बावजूद 2005 में हरियाणा की सभी महिला-पंचायतों की प्रमुख, अशुबी खान एवं दक्षिणी हरियाणा के नीमखेड़ा  ग्राम पंचायत की उनकी नौ महिला पंच अपनी उपलब्धियों की प्रभावशाली सूची बनाने में सफल रही हैं। हालांकि इनका सफर आसान नहीं रहा है।

 

यह दस महिलाएं कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाने में सफल रही हैं। पानी की गंभीर कमी वाले ज़िलों में इन्होंने 20 पंप लगवाए हैं एवं नीमखेड़ा को नहर से जोड़ा है। इन्होंने 50 गरीब परिवारों के लिए घर बनवाया है। स्थानीय लोगों के अनुसार उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि प्राथमिक स्कूल का उन्नयन कर माध्यमिक स्तर तक ले जाना है।

 

2008 में, हरियाणा सरकार ने नीमखेड़ा गांव एवं इसकी निरक्षर ग्राम पंचायत को ‘आदर्श गांव’ होने का खिताब दिया है।

 

आंगनवाड़ी एवं नई सड़कों के निर्माण के बाद, अगली अवधि में खान की योजना गांव के पुन्हाना ब्लॉक में जरूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र शुरु करने की थी।

 

लेकिन खान और उनकी सात महिला पंचों के चुनाव में खड़े न हो पाने के कारण शायद यह योजना शब्दों में ही रह जाएं। खान के चुनाव में खडे न होने का कारण हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 में संशोधन होना है। इस उत्तर-पश्चिमी राज्य भर में हज़ारों महिलाए, दलितों और सामान्य उम्मीदवारों चुनाव में खड़े होने से वंचित रहे हैं जो जनवरी 10, 2016 से शुरु हुआ है।

 

नए कानून (हरियाणा सरकार द्वारा बनाया गया एवं सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखा गया) के अनुसार अन्य बातों के अलावा, उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता आवश्यक है। और इस प्रकार आधे से अधिक ग्रामीण आबादी उम्मीदवारी से वंचित रहती है।

 

नई पंचायत कानून और इसमें शामिल न हो पाते नागरिक

 

घरों में शौचालय। कृषि सहकारी समितियों के लिए कोई लंबित ऋण नहीं। कोई अवैतनिक बिजली बिल नहीं। न्यूनतम शैक्षिक योग्यता।

 

यह कुछ शर्तें हैं जो हरियाणा सरकार के अनुसार,7 सितंबर 2015 को हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 में संशोधन के बाद, चुनावी उम्मीदवारों के लिए आवश्यक हैं।

 

10 दिसंबर को,  सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस याचिका की सुनवाई एवं  “उचित” प्रतिबंध घोषित करते हुए कानून को वैध ठहराया है।

 

हरियाणा में चुनाव लड़ने के लिए योग्यता

 

Qualifications To Contest Elections in Haryana
Category Qualification
General – Male Matriculation (10th class)
General – Female Middle School (8th pass)
SC – Male Middle School (8th pass)
SC – Female 5th pass

 

पुरुषों की तुलना में महिलाओं की उम्मीदवारी योग्यता आसान है,हरियाणा के साक्षरता दर को दर्शाती है : पुरुषों के लिए 85 फीसदी, महिलाओं के लिए 76 फीसदी, लेकिन पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं को छोड़ते हैं।

 

श्रेणी अनुसार जनसंख्या अयोग्य घोषित

 

 

54 फीसदी साक्षरता के साथ मेवात सबसे अधिक प्रभावित

 

किसी अन्य ज़िले की तुलना में देश की राजधानी, दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मुस्लिम बहुल जिला, मेवात इस चुनावी अपवर्जन से सबसे अधिक प्रभावित है।

 

2008 में केंद्र ने मेवात को, जहां 79 फीसदी मुस्लिम हैं, 90 अल्पसंख्यक केंद्रित जिलों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया है जहां विशेष मदद की आवश्यकता है।

 

2011 की जनगणना के अनुसार, मेवात में औसत साक्षरता दर हरियाणा की तुलना में 22 प्रतिशत अंक कम था । 37 फीसदी महिला साक्षरता दर के साथ मेवात, भारत के सबसे कम महिला साक्षर दर वाले ज़िलों में से एक है।

 

साक्षरता दर: मेवात एवं हरियाणा

 

 

इससे स्पष्ट है कि मेवात में 89 फीसदी महिलाएं एवं 80 फीसदी पुरुष (20 वर्ष या इससे अधिक की आयु वर्ग) चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। इसी तरह अनुसूचित जातियों के बीच, 64 फीसदी पुरुष और 63 फीसदी महिलाएं भी चुनाव लड़ने से वंचित रह रहे हैं।

 

पर्याप्त स्कूल नहीं, लेकिन आवश्यक शिक्षा के बिना लोग हैं वंचित

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए नीमखेड़ा पंचायत की नाराज़ एवं सबसे मुखर दलित महिला, राम प्यारी, कहती हैं कि, “अब हम अनपढ़ हैं तो इसमें हमारी क्या गलती है? हमारे ज़माने में कोई स्कूल ही नहीं था।”

 

फातिमा एवं एकत्र हुई अन्य 50 महिलएं नए कानून पर उनकी पीड़ा और चिंता व्यक्त करते हुए कहती हैं कि, “हमारी मजबूरी है हम क्या करें?”

 

फातिमा कहती हैं, “पहले केवल एक ही स्कूल था…वो भी पहाड़ी के उस पार…वहां केवल लड़के ही जा सकते थे…लड़कियां पढ़ाई के लिए उतनी दूर नहीं जा सकती थी…इसलिए हम अनपढ़ ही रह गए।”

 

हाल ही में नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार मेवात में अधिक स्कूल, विशेष रुप से मध्य और माध्यमिक, नहीं हैं । हालांकि मध्य विद्यालयों की संख्या 129 ( 2001 ) से बढ़ कर 272 ( 2011 ) हुई है लेकिन हर गांव में स्कूल नहीं हैं।

 

2001 क जनगणना के अनुसार, मेवात में कुछ ही माध्यमिक विद्यालय हैं, 84 स्कूल 3.2 फीसदी गांवों में सेवारत हैं।

 

शिक्षा के जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई), राष्ट्रीय- स्कूल के आंकड़े डेटाबेस के अनुसार, 2014-15 में, यह आंकड़े 86 थे यानि एक दशक में दो स्कूलों की वृद्धि हुई है।

 

2001 से 2011 के बीच, वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 65 से बढ़ कर 70 हुई है – पांच अन्य स्कूल की वृद्धि।

 

तब से वहां पर्याप्त स्कूल नहीं हैं एवं धर्म शैक्षिक फैसले में एक बड़ी भूमिका निभाता है। मेवात में अधिकतर लड़कियों को मदरसा भेजा जाता है जिसे साक्षर के रुप में नहीं गिना जाता है। सामाजिक विज्ञान अनुसंधान की भारतीय परिषद (आईसीएसएसआर) द्वारा 2009 के एक अध्ययन के अनुसार, मेवात में 77 मदरसे हैं।

 

उम्मीदवारी पर रोक से गरीब और अधिकारहीन सबसे अधिक प्रभावित

 

शैक्षिक योग्यता के अलावा, हरियाणा पंचायत कानून का प्रभाव गरीब एवं हाशिए पर रह रहे लोगों पर सबसे अधिक पड़ा है।

 

चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को उनके चुनावी हलफनामे में एक कार्यात्मक शौचालय की एक तस्वीर, तीन कृषि सहकारी बैंकों से मंजूरी, बिजली की बकाया राशि की मंजूरी, और उनके स्थानीय पुलिस स्टेशनों से किसी भी आपराधिक आरोपों से मंजूरी प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

 

एक ज़िले में जहां केवल 17.8 फीसदी ग्रामीण परिवारों तक कार्यत्मक शौचालय की पहुंच है वहां ऐसे नियम के आ जाने से, चुनाव लड़ने वाले 10 में से आठ उम्मीदवार तुरंत अयोग्य हो जाते हैं।

 

ऋण निकासी प्रमाण पत्र प्राप्त करना भी मुश्किल है। प्रत्येक मंजूरी के लिए उम्मीदवारों को अलग-अलग स्थानों पर तीन बैंकों से 200 रुपए एवं बिजली बोर्ड से एक ‘बकाया राशि’ प्रमाण पत्र के लिए और 28 रुपए का भुगतान करना पड़ता है।

 

स्थानीय लोगों के अनुसार, उन्होंने इस मंजूरी को प्राप्त करने के लिए 4,000 रुपए से 6,000 रुपए तक खर्च करते है जिससे  उनकी नियमित नौकरी और घरेलू जिम्मेदारियां प्रभावित होती हैं। पंचायत के वार्ड सदस्यों को सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में मदद करने के लिए 400 रुपए प्रति माह का वज़िफा मिलता है।

 

अनपेक्षित परिणाम: बहुविवाह में वृद्धि

 

मेवात के गांव के बाद एक गांव में इंडियास्पेंड ने पाया कि यह चुनाव लड़ने के लिए शैक्षिक योग्यता के साथ उम्मीदवारों को खोजने के लिए लगभग असंभव था। कई ग्राम पंचायतों में चुनावी प्रक्रिया शुरु होने से पहले ही समाप्त हो गई है। उम्मीदवारों को या तो निर्विरोध निर्वाचित किया गया है या सीटें खाली हैं।

 

राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों  पता चलता है कि, पुन्हाना ब्लॉक में 66 सरपंच पदों में से पांच निर्विरोध चुने गए हैं। 788 वार्ड सदस्य पदों में से 508, या 64 फीसदी निर्विरोध निर्वाचित किए गए हैं। 2010 में कोई भी सरपंच पद निर्विरोध नहीं जीता गया था। केवल 271 वार्ड सदस्यों को निर्विरोध निर्वाचित किया गया था।

 

788 वार्डों में से कम से कम 61 या 7.75 फीसदी वार्डों में(ज्यादातर महिलाओं के लिए आरक्षित) कोई उम्मीदवार नहीं है।

 

जिन पंचायतों में एकल उम्मीदवार द्वारा नामांकन पत्र दाखिल किया गया है, वे चुनाव लड़ने के लिए कहीं और से आए हैं, जिनका गांव के शासन में कोई हिस्सेदारी नहीं है।

 

नीमखेड़ा में अशुबी खान भी चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हैं। अब उनके भतीजे वसीम , 30 किमी दूर फिरोजपुर ज़िरखा ब्लॉक, के एक गांव से, बुला कर चुनाव लड़ने के लिए राजी किया गया है।

 

वार्ड स्तर पर, गांव के बाहर से एक अकेली महिला उम्मीदवार अपना नामांकन दाखिल किया है।

 

पड़ोस के बड़हेड़ में वार्ड पद रिक्त रहेंगे। पूर्व सरपंच, फातिमा (50) बताती हैं 2005 में सरपंच के रूप में अपने पहले कार्यकाल ने उन्हें किस प्रकार बदल दिया है। उन्होंने गांव के भीतर सत्ता संरचना का मार्गनिर्देशन करना सीखा है एवं कुछ कृषि के बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है। फातिमा अशिक्षित हैं, इसलिए वह पना कार्य जारी नहीं रख सकती हैं और लोगों तक पीने का पानी एवं ज़रुरी स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंचा सकती हैं।

 

बड़े पंचायतों में से एक, जमालगढ़ में 20 वर्डों में से नौ उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित किया गया है। नौ सीटें रिक्त रहेंगी एवं दो सीटों पर चुनाव लड़े जाएंगे।

 

पुन्हाना ब्लॉक के बंधोली ग्राम पंचायत में , सात वार्डों में से तीन में कोई उम्मीदवार नहीं हैं एवं वह रिक्त रहेंगे।

 

पलवल जिले में ग्राम पंचायतों में उम्मीदवारों के पोस्टर पर शिक्षित होना एक उपलब्धि के रुप से उल्लेख किया जा रहा है।

 

मेवात में, चुनाव लड़ने के लिए आवश्यक शैक्षिक योग्यता होने के बाद, पुरुषों द्वारा दूसरी पत्नि लाने के साथ मुस्लिम मेव समुदाय के बीच बहुविवाह में वृद्धि देखी जा रही है।

 

जमालगढ़ में, दो पुरुषों ने (इनमें से एक मध्यम आयु) दोबारा शादी की है। सिंगारा ग्राम पंचायत में निवर्तमान सरपंच,  हनीफ ने अपने से 14 वर्ष छोटी आयु की साजिदा से शादी की है। साजिदा चुनाव लड़ने के लिए योग्य है।

 

अकलिमपुर – नूह के दीन मोहम्मद (47) ने आठवीं पास साजिदा (23) के साथ शादी की है।

 

बड़हेड़ के पूर्व सरपंच अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, “अगर जीत गई तो ठीक है। अगर हार गई तो क्या होगा? उनका तो तलाक हो जाएगा। यह औरतों के साथ बहुत ज़्यादती है। इस कानून से इस चीज़ को बढ़ावा मिल रहा है।”

 

हरियाणा के चुनावी अपवर्जन में राजस्थान का प्रतिबिंब नज़र आता है। राज्य में मार्च 2015 में इसी तरह का कानून बनाया गया था। उसके बाद हुए चुनाव में, निर्विरोध चुने गए सरपंचों की संख्या 2010 में 35 से बढ़ कर 2015 में 260 हो गई। राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार यह सरपंच के पदों का 2.6 फीसदी है।

 

कम से कम 43 फीसदी पंचायत के वार्ड सदस्यों को निर्विरोध चुना गया एवं 542 सीटें (0.5 फीसदी) राजस्थान में रिक्त रह गए।

 

किस प्रकार पंचायती राज कानून के उद्देश्य को उल्टा करता है

 

हरियाणा संशोधन अधिनियम को कायम रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यूनतम शैक्षिक योग्यता लागू करना “अतार्किक या गैरकानूनी या असंबद्ध ” नहीं है। इससे उम्मीदवार पंचायत के कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करने में सक्षम होंगे।

 

संविधान के 73 वें संशोधन का उदेश्य स्थानीय सरकार, या पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को सशक्त बनाना है।

 

अशुबी खान एवं पंचायती सदस्य की अन्य महिलाएं सुप्रीम कोर्ट की इस बात से असहमत हैं।

 

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अशुबी खान कहती हैं, “अशिक्षित होने पर भी पिछले 10 वर्षों से हमने बहुत अच्छी तरह पंचायत चलाई है। हमने वो किया है जो एक शिक्षित पुरुष भी कभी नहीं कर सकता था।”

 

यह विडंबना है कि जो पंचायत नेता स्कूल के बुनियादी ढांचे में सुधार के मामले में सबसे आगे थे उन्हें शिक्षा की कमी के कारण चुनाव लड़ने से वंचित किया जा रहा है।

 

नीमखेड़ा एवं बड़हेड़ जिले के स्थानीय लोग शिक्षा के लाभ से परिचित हैं, लेकिन इनमें से एक का कहना है कि, “यह चुनाव लड़ने में बाधा नहीं होनी चाहिए।”

 

सांसद / विधायक  अनपढ़ एवं अपराध में लिप्त हो सकते हैं लेकिन गांव के प्रतिनिधि नहीं

 

भारत के गांव में सरपंच,निर्वाचित प्रतिनिधि से अधिक होता है। इन पदों पर बैठे लोग अक्सर आम और सांस्कृतिक ज्ञान और अनुभव के बारीकी से अपने घटकों के साथ जुड़े हुए होते हैं।

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी की प्रस्तुतियों के साथ सहमति है कि कानून “बेहतर प्रशासनिक दक्षता के लिए स्थानीय स्वशासन के लिए मॉडल प्रतिनिधियों” का चुनाव करने के लिए किया गया था।

 

सुभान खान, बड़हेड़ पंचायत के निवर्तमान सरपंच पूछते हैं कि, “मुदाय की जरूरतों को, कि कहां सकड़े बननी हैं, पीने का पानी की समस्या को सुलझाने के लिए शिक्षा किस प्रकार प्रासंगिक है? राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले बहस एवं आर्थिक और विदेश नीति बनाने वालों के लिए यह आवश्यक नहीं है फिर यह हमारे लिए क्यों ज़रुरी है?”

 

निर्णय सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि ” मतदाताओं के दो वर्गों ” बन रहे हैं, ” एक जो उनके शैक्षिक उपलब्धि के आधार पर योग्य हैं एवं पंचायत चुनाव लड़ सकते हैं एवं ऐसे जो योग्य नहीं हैं।”

 

यह निर्णय विभिन्न नियमों और विशेषाधिकारों के साथ निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के भी दो वर्गों बनाता है: संसद (सांसद) और विधान सभाओं (विधायक) के सदस्य; और स्थानीय गांव परिषदों और नगरीय निकायों के सदस्य।

 

यहां कुछ असमानताएं हैं:

 

* सांसदों और विधायकों के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता की जरूरत नहीं है , लेकिन पंचायत सदस्यों के लिए आवश्यक है।

 

* सांसदों और विधायकों को अपने चुनाव हलफनामे में देनदारियों (ऋण) की घोषणा कर सकते हैं, लेकिन पंचायत सदस्यों को अपने शपथ-पत्र के भाग के रूप में ऋण – क्लीयरेंस प्रमाण पत्र संलग्न करने की जरूरत है। 2014 के चुनाव हलफनामे के अनुसार, टॉप 10 विधायकों ने हरियाणा विधानसभा में 43 करोड़ रुपये से 3 करोड़ रुपये से लेकर देनदारियों की सूचना दी है।

 

* सांसदों और विधायकों के लिए सार्वजनिक उपयोगिताओं के लिए भुगतान, जैसे कि  दूरसंचार कंपनी महानगर टेलीफोन निगम (एमटीएनएल) के लिए छूट है लेकिन पंचायत नेताओं बिजली बकाया राशि की निकासी प्रमाण पत्र संलग्न करने की जरूरत है।

 

* सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले होने के बावजूद चुनाव लड़ कर सकते हैं (केवल अपने हलफनामे में उन्हें घोषणा करने की जरूरत है) लेकिन पंचायत के नेताओं को अपने स्थानीय पुलिस थानों से किसी प्रकार की आपराधिक आरोप न होने की प्रमाण पत्र संलग्न करने की आवश्यकता है।

 

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नीमखेड़ा की राम प्यारी पूछती हैं, “मुख्यमंत्री एम एल खट्टर की शैक्षिक योग्यता क्या है?”

 

मुख्यमंत्री खट्टर , स्नातक है लेकिन जिन्होंने इस अपवर्जनात्मक कानून को बनाया है उनमें से कई लोगों की वह शैक्षिक योग्यता नहीं है जो वह पंचायत सहयोगियों से मांग रहे हैं। हरियाणा विधानसभा में 90 विधायकों में से कम से कम चार विधायक केवल आठवीं पास हैं और एक अशिक्षित है।

 

मेवात में, लिंकन को उद्धृत किया गया है: ‘यह लोकतंत्र लोगों से नहीं है’

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लोकतंत्र के बारे में अब्राहम लिंकन के प्रसिद्ध शब्द का जिक्र करते हुए फातिमा कहती हैं, “अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्या कहा?  क्या यहां लोगों से लोकतंत्र है? “

 

एक अन्य सदस्य कहती हैं, “जनता का शासन अब खत्म हो गया है। अब सरकार का शासन है।”

 

(राव GenderinPolitics की सह-निर्माता हैं, एक परियोजना जो भारत की राजनीति एवं शासन में महिलाओं की भूमिका पर नज़र रखती है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 16 जनवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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