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हार में भी भाजपा के मूल मतदाता, वफादार

चैतन्य मल्लापुर और अभीत स. सेठी,

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2015 के  दिल्ली विधानसभा चुनावों में  तीन सीट तक सीमित अपनी भारी पराजय, पर भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने  काफी हद तक अपने पिछले 16 वर्षों  से वफ़ादार वोट शेयर को बनाए रखा है।

 

भाजपा ने इस बार  32.20% का  वोट शेयर हासिल किया , जो कि 1993 के बाद से सबसे कम है लेकिन साथ ही 1998 के बाद से यह इतना ही बना हुआ है जो कि  एक वफादार मतदाता आधार की उपस्थिति का संकेत है।

 

भाजपा 1993 में 49 से 1998 में सिर्फ 15 सीटों तक ही सिमित कर रह गई ।  2013 तक लगातार अपने कम प्रदर्शन के कारण भाजपा 15 साल तक विपक्ष में रही। पार्टी की सीट हिस्सेदारी तब बढ़ी जब  उन्होंने 2013 में 31 सीटें जीती 2008 में जीती 23 सीटों की तुलना में 35% की वृद्धि हुई।

 

स्थिर मतदाता समर्थन के बावजूद सीटों में इतने भारी बदलाव को , भारत की फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (सर्वाधिक मतप्राप्त व्यक्ति की विजय)  चुनाव प्रणाली के द्वारा समझा जा सकता है।

 

दिल्ली विधानसभा चुनावों में  भाजपा सीटों की तालिका (गिनती) ,दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा का वोट शेयर  % ,1993-2015

 

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Source: Election Commission

 

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसकी वोट हिस्सेदारी सिर्फ 9.7% रह गई और कोई सीट नही जीत सकी उसका यह सबसे खराब प्रदर्शन रहा है।

 

दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस  सीटों की तालिका (गिनती) , दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस  का वोट शेयर  % , 1993-2015

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Source: Election Commission

 

1998 के चुनावों में कांग्रेस ने 70 से 52  सीटें जीत कर भाजपा को पराजित किया। जिससे मुख्यमंत्री के रूप में शीला दीक्षित के  नेतृत्व में  शासन की शुरुआत हुई और उनके अंतर्गत  कांग्रेस ने क्रमश: 2003 और 2008 में 47 और 43 सीटें जीत हासिल की।

 

15 साल का शासनकाल 2013 में एक मजबूत सत्ता विरोधी भावना के साथ अंत हुआ जिससे आप का उदभव हुआ  दिल्ली के राजनीतिक क्षेत्र में  भाजपा सबसे आगे उभर कर आई ।

 

2013 वर्ष में  कांग्रेस सीट शेयर में भारी गिरावट देखने को मिली  81% की गिरावट रही और 2008 में 43 सीटों में से सिर्फ 8 ही रह गई  ।

 

2013 के चुनाव के परिणाम में त्रिशंकु(हंग) विधानसभा रही जिसमे भाजपा ने 31 सीटें जीती और एएपी ने 28।  कांग्रेस किंग-मेकर के रूप में उभर कर आई और उसके बाहर से समर्थन देने पर केजरीवाल सरकार बना सके और स्वयं मुख्यमंत्री बने ।

कांग्रेस और-सापेक्ष दृष्टि से -भाजपा के पतन, का संतुलन एएपी के फायदे में देखा जा सकता है जिसके सीट शेयर में 139% की वृद्धि हुई है, 2013 की 28 से , 2015 में  67 तक

 

दिल्ली विधानसभा चुनावों में एएपी सीटों की तालिका (गिनती) , दिल्ली विधानसभा चुनावों में एएपी का वोट शेयर  % ,1993-2015

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Source: Election Commission

 

एएपी ने इस बार एक भरी जीत दर्ज की है 70  सीटों पर लड़ कर में से 67 पर अपना दावा ठोका है,  भाजपा और कांग्रेस के गढ़ों में अपनी गहरी पैठ बना कर, बड़े मार्जिन के साथ जीत हासिल की है।

 

भाजपा की तीन सीटों में से , एक, मुस्तफाबाद की सीट, कांग्रेस से छीनी गई है । और  शाहदरा और विश्वासनगर की  केवल दो सीटें 2013 से , बरकरार रखीं है।
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