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150 साल पुरानी परंपरा पर नये रिवाज की दस्तक, क्या अब वित्तीय वर्ष का मतलब जनवरी से दिसंबर होगा?

रिशिका पर्दिकर,

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29 फरवरी, 2016 को संसद में अपने बजट भाषण के पहले मंत्रालय के अधिकारियों से घिरे हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली। सरकार ने वित्त वर्ष बदल सकने की संभावना को देखने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है।

 

वित्त मंत्री, अरुण जेटली 1 फरवरी, 2017 को वर्ष 2017-18 का बजट पेश करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। और इसी के साथ ही भारत एक बार फिर इस बहस के लिए तैयार है कि क्यावित्त वर्ष का कैलेंडर जो अप्रैल से मार्च तक चलता था, उसे जनवरी-से दिसंबर कर देना चाहिए ? यह सवाल मानसून और फसलों के मौसम से भी जुड़ा है।

 

भारत के वित्तीय वर्ष को बदलने के लिए नीति आयोग द्वारा जारी की गई इस चर्चा नोट के अनुसार, ब्रिटिश सरकार के साथ भारतीय वित्तीय वर्ष को मिलाने के लिए 1867 में अप्रैल से मार्च का वित्तीय वर्ष अपनाया गया था। 1867 के पहले मई से अप्रैल का वित्त वर्ष चलता था। 16 दिसंबर 2016 को लोक सभा में मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, जुलाई 2016 में, वित्त वर्ष बदलने के औचित्य को परखने के लिए वित्त मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति के अध्यक्ष पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य हैं। समिति 31 दिसंबर, 2016 को सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।

 

वित्त वर्ष बदलने का प्रयास वर्ष1984 में भी एक समिति द्वारा किया गया था। समिति के अध्यक्ष भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर एल. के. झा थे। वित्त वर्ष को बदलने की सबसे गंभीर सिफारिशें वर्षा की कमी से पहले के वर्षों में की गई थी। झा समिति ने रिपोर्ट वर्ष 1979-80 और वर्ष1982-83 में सूखे के बाद तैयार की थी।

 

वर्ष 2014 और 2015 में वर्षा की कमी से वित्त वर्ष को बदलने के प्रयास में तेजी आई है। इन वर्षों में, सरकार की ओर से मुख्य दलील पहले से ही वित्तीय योजना का तैयार होना है और कम मानसून से उपजे हालात से उबरने के लिए हर बार बजट में अतिरिक्त राशि की जरुरत पड़ती है। भारत में करीब 58 फीसदी ग्रामीण परिवार अब भी कृषि पर निर्भर हैं।

 

अब भी भारत है बारिश पर निर्भर अर्थव्यवस्था

 

भारत में जून और सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त वर्षा के साथ बुवाई होती है। खेती की बात करें तो खरीफ फसलें मुख्य रुप से दक्षिण-पश्चिम मानसून से और रबी फसलें उत्तर-पूर्व मानसून से होती है।

 

चावल और दालों जैसी खारीफ फसलें और गेहूं जैसी रबी फसलों की बुवाई और खेती देश में खाद्य सुरक्षा और निर्यात दोनों का निर्धारण करते हैं । यहां यह भी बताना जरूरी है कि भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है।

 

नीति आयोग चर्चा नोट में कुछ इस तरह से झा समिति की रिपोर्ट को उद्धृत किया गया है कि, “इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई वित्त वर्ष कब शुरु होता है और कब खत्म। फर्क तो इस बात से पड़ता है कि उस वित्तीय वर्ष में और उसके पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष में दक्षिण-पश्चिम मानसून का व्यवहार कैसा रहा?”

 

समिति ने निष्कर्ष निकाला है कि बजट को अक्टूबर में अंतिम रूप दिया जाना चाहिए, जब दक्षिण-पश्चिम मानसून समाप्त हो जाता है। यह वक्त ऐसा है जब देश में खरीफ फसल के बारे में आसानी से पता किया जा सकता है और रबी की फसल अनुमान भी लगाया जा सकता है।

 

नवंबर के महीने को अगर बजट की प्रस्तुति के लिए सक्षम बनाया जाए तो जनवरी में वित्तीय वर्ष की शुरुआत संभव हो सकती है।

 

यह भी कहा गया है कि वित्तीय वर्ष अगर जनवरी से दिसंबर का हो तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह के ताल-मेल संभव होंगे और कैलेंडर वर्ष के साथ किसी तरह के भ्रम की स्थिति नहीं रहेगी।

 

हालांकि, उस समय  केंद्र सरकार ने कहा था कि इसके फायदे बहुत कम होंगे, कई तरह की अड़चनें आएंगी। कानूनी संशोधन की भी जरूरत होगी।

 

देश में 75 फीसदी से ज्यादा दालें, 66 फीसदी से ज्यादा तिलहन और 45 फीसदी अनाज व्यापक असमानता के साथ वर्षा सिंचित परिस्थितियों में उपजाया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2015-2016 के अनुसार, पंजाब, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में 50 फीसदी या इससे अधिक भूमि सिंचित है। जबकि अन्य 25 राज्यों में यह रकबा आधे से भी कम है। असम में तो 2 फीसदी और सिक्किम में 10 फीसदी भूमि सिंचित है।ग्रामीण संकट को कम करने के लिए खराब मानसून से उपजे हालात पर खर्च में वृद्धि की जरुरत है।

 

156 राष्ट्रों के लिए कैलेंडर वर्ष ही है वित्तीय वर्ष

 

संयुक्त राज्य अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी द्वारा जारी किए गए द वर्ड फैक्टबुक के अनुसार, 227 देशों में से 156 देशों के लिए कैलेंडर वर्ष ही है वित्तीय वर्ष।

 

156 राष्ट्रों के लिए कैलेंडर वर्ष ही है वित्तीय वर्ष

Source: The Word Factbook, Central Intelligence Agency

 

राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी हमें विभिन्न आंकड़ों से परिचय कराता है, जिससे हमें सकल घरेलू उत्पाद, सकल मूल्य वृद्दि, खपत, सकल राष्ट्रीय उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय, कृषि फसलों के उत्पादन और अन्य बिंदुओं की पहचान में मदद मिलती है।

 

ये आंकड़े, राष्ट्रीय खातों के संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के सिफारिशों और दिशा निर्देशों के संदर्भ में केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा संकलित होते हैं।

 

झा समिति की रिपोर्ट में कैलेंडर वर्ष को वित्तीय वर्ष मानने के पीछे कई दलीले हैं। रिपोर्ट में जिक्र है कि “सीएसओ के माध्यम से समिति को इस बात की जानकारी दी गई थी कि संयुक्त राष्ट्र के सांख्यिकी कार्यालय और संयुक्त राष्ट्र के दूसरे संगठन कैलेंडर वर्ष के आधार पर आंकड़ों की प्रस्तुति के पक्ष में थे,  क्योंकि वे सब अपने सभी सांख्यिकीय प्रकाशनों में अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों की प्रस्तुति के लिए कैलेंडर वर्ष का ही अनुसरण करते हैं।”

 

“इसके अलावा, सीएसओ के अनुसार, कैलेंडर वर्ष बदलने से कोई बड़ा व्यवधान नहीं होगा।  यह एक साफ व्यवस्था हो सकती है और विभिन्न सांख्यिकीय श्रृंखला के संदर्भ में इससे एकरूपता आएगी।”

 

(पर्दिकर चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और बेंगलुरु में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20 दिसम्बर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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