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2005 से 2015 के बीच में भारत ने 10 लाख बाल मृत्यु को रोका, गरीब राज्य अब भी पीछे

स्वगता यदवार,

A medical worker administers polio drops to an infant at a hospital during the pulse polio immunization programme in Agartala

 

भारत ने वर्ष 2005 और 2015 के बीच पांच वर्ष से कम उम्र के 10 लाख बाल मृत्यु को रोका है। 30 लाख और बाल मृत्यु को रोका जा सकता था, यदि कुछ राज्यों की तरह ही भारत के सभी राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया होता, जैसा कि 19 सितंबर,2017 को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य जर्नल ‘लैनसेट’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चला है।

 

अध्ययन के लेखकों ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि दस्त के मामले में समय पर उपचार सहित, टेटनस और खसरे के लिए टीके और अस्पताल में जन्मों में वृद्धि ने इस सुधार के लिए देश को समर्थ बनाया है।

 

उत्साहवर्धक सुधार

 

नवजात मृत्यु दर ( 28 दिनों से कम उम्र के बच्चे ) में 40 फीसदी की गिरावट हुई है। ये आंकड़े 2000 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 45 मृत्यु की थी, जो गिरकर 2015 में 27 हुई है।

 

इस बीच, 1 महीने से अधिक उम्र, लेकिन 5 साल (1-59 महीने) से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 2000 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों में 45.2 थी, जो 2015 में 19.6 हुई है यानी  56 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

नवजात बच्चों में टेटनस और खसरे से मृत्यु दर में 90 फीसदी की गिरावट हुई है, जबकि नवजात संक्रमण और जन्म के समय के चोट में 66 फीसदी की गिरावट हुई है। 1-59 महीनों के बच्चों में,  निमोनिया और दस्त से होने वाले मृत्यु दर में 60 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

ये निष्कर्ष एक अध्ययन, मिलियन डेथ स्टडी के हैं, जो भारत में समयपूर्व मृत्यु पर एक बड़े पैमाने पर किया गया अध्ययन है। इस अध्ययन में 900 से अधिक जनगणना सर्वेक्षणकर्ताओं ने 7,000 बेतरतीब ढंग से चयनित क्षेत्रों में 1.3 मिलियन परिवारों का दौरा किया और दर्ज की गई मौतों के कारणों को खोजने के लिए ‘मौखिक ऑटोप्सी’ का आयोजन किया है।

 

भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त द्वारा कार्यान्वित, मौखिक ऑटोप्सी कम आय वाले देशों में उपयोग किया जाता है जहां मौत अक्सर प्रलेखित नहीं हैं। भारत में प्रति वर्ष अनुमानित 9.5 मिलियन मौतों में से लगभग 75 फीसदी घरों में होते हैं, जिनमें से आधे के पास प्रमाणित कारण नहीं होता है।

 

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Source: The Lancet Report

 

अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष निमोनिया, दस्त, खसरा, टिटनेस और जन्म संक्रमण जैसे ध्यान देने वाली स्थिति के कारण होने वाली मृत्यु दर में तेजी से गिरावट होना है। दस्त के मामले में समय पर उपचार सहित, टेटनस और खसरा के लिए टीके, और अस्पताल के जन्मों में वृद्धि ने इसमें सुधार किया है, जैसा कि अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और टोरंटो’ के सेंट माइकल अस्पताल के ‘सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च’ के प्रमुख प्रभात झा ने ई-मेल के जरिए इंडियास्पेंड को बताया है।

 

अध्ययन ने नवजात शिशु ( 1 से 59 महीने के बच्चों ) और पांच वर्ष की आयु के भीतर के बच्चों की मृत्यु दर को अलग-अलग रिकॉर्ड किया गया है। लड़कियां बनाम लड़के, शहरी बनाम ग्रामीण, समृद्ध बनाम गरीब राज्यों के मृत्यु दर में प्रवृति रिकॉर्ड किया गया है।

 

संक्रामक रोग से कम मृत्यु, लेकिन कम वजन वाले बच्चों का जन्म अधिक

 

पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की कम मृत्यु ज्यादातर संक्रामक रोगों की घटनाओं में गिरावट का कारण है। वर्ष 2000 से 2015 तक, नवजात शिशुओं की तुलना में 1-59 महीने के आयु वर्ग के बच्चों की जान बचाने में हस्तक्षेप अधिक सफल रहे हैं। नवजात शिशु मृत्यु दर में हर साल 3.3 फीसदी गिरावट हुई, जबकि 1 से 59 महीने के बच्चों की मौतों में 5.4 फीसदी गिरावट हुई है।

 

वर्ष 2010 के बाद सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी।

 

नवजात और बच्चों की मौत में वार्षिक औसत बदलाव

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Source: MDS

 

1-59 महीनों के बच्चों में निमोनिया (62 फीसदी), दस्त (65 फीसदी), अन्य संक्रामक (38 फीसदी) और पोषण संबंधी स्थिति (26 फीसदी) की वजह से कम मौतें हुई हैं, लेकिन गैर-अक्षम्य बीमारियों और चोटों से मृत्यु की संख्या में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं था।

 

इस बीच, नवजात शिशु मृत्यु, जो 2000 में कुल बाल मृत्यु में 50 फीसदी था, 2015 में बढ़ कर 58 फीसदी हुआ है। यहां तक ​​कि नवजात संक्रमण की घटनाओं में 66 फीसदी, जन्म और अस्थमा और आघात में 75 फीसदी की गिरावट हुई है और 16 फीसदी बच्चों का कम वजन और समय से पहले जन्म हुआ है। अधिकांश नवजात मृत्यु ( 2015 में 370,000 ) इसी कारण से हुई है।

 

झा कहते हैं, “जन्म के समय कम वजन वाले इन बच्चों को जननी सुरक्षा योजना के तहत जरूरी 48 घंटे के लिए अस्पताल में भर्ती होने के बाद अतिरिक्त स्वास्थ्य जांच की आवश्यकता होती है। यह योजना एक सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम है, जो संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देता है।”

 

उन्होंने आगे कहा, हालांकि, शहरी क्षेत्रों या समृद्ध राज्यों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों और गरीब राज्यों में समय से पहले और कम वजन के बच्चों की मौतें बढ़ गई हैं, इसलिए वे टालने योग्य हैं।

 

जन्म के समय बच्चों के कम वजन को देखभाल, माता-पिता और परिवार की शिक्षा और जागरूकता में सुधार, और मां के पोषण (विशेष रूप से एनीमिया का इलाज करने के लिए) के साथ-साथ माता के मौखिक तम्बाकू के उपयोग जैसे अन्य कारकों को संबोधित करने से टाला जा सकता है, जैसा कि अध्ययन में बताया गया है।

 

झा आगे कहते हैं, “ मृत्यु के कारणों के लिए अधिक अध्ययन की आवश्यकता है और भारतीय मेडिकल रिसर्च के एक कार्यरत समूह इस तरफ कार्य कर रहा है।”

 

गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों का बद्तर प्रदर्शन

 

वर्ष 2000 से 2015 तक बाल मृत्यु दर में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में 47 फीसदी कमी दर्ज की गई है।

 

राज्य के श्रेणी अनुसार पांच वर्ष की आयु के भीतर मृत्यु दर

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Source: MDS

 

हालांकि, वर्ष 2015 में हुई 1.2 मिलियन मौतों में से 1 मिलियन मौत ग्रामीण क्षेत्रों में हुई हैं।

 

ग्रामीण/शहरी क्षेत्रों में पांच वर्ष की आयु के भीतर मृत्यु दर

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Source: MDS

 

इनमें से 850,000 (70 फीसदी) गरीब राज्यों में थे, जबकि 347,000 (28 फीसदी) समृद्ध राज्यों में थे। ‘गरीब राज्य’ वे राज्य हैं जिनके आर्थिक-सामाजिक संकेतक बद्तर हैं – असम, बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान। बाकी को ‘समृद्ध’ राज्यों के रूप में जाना जाता है।

 

वर्ष 2000 से 2015 तक, गरीब राज्यं में बाल मृत्यु दर में 47 फीसदी और समृद्ध राज्यों में 51 फीसदी की गिरावट हुई है। ग्रामीण इलाकों ( 2000 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 13.2 से 2015 तक 17 ) और गरीब राज्यों में ( 2000 में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 11.3 से 2015 में 17.8 ) में समय से पहले जन्म और जन्म के समय कम वजन के बच्चों में वृद्धि हुई है और शहरी और समृद्ध राज्यों में कमी आई है।

 

तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में हुए सुधारों की तरह ही भारत के सभी राज्यों ने प्रदर्शन किया होता तो भारत वर्ष 2015 मिलेनियम विकास लक्ष्यों को पूरा कर लेता।

 

लड़कियां बनाम लड़के

 

पांच वर्ष से कम आयु के भीतर मृत्यु दर, लड़कों के मुकाबले लड़कियों में महत्वपूर्ण रुप से उच्च हैं। वर्ष 2000 में, प्रति 1000 जन्मों में 95 लड़कियां और 85 लड़कों की मृत्यु हुई है। वर्ष 2015 में, अंतर कम हुआ था और प्रति 1000 जन्मों पर 48 लड़कियां और 45 लड़कों की मौत हुई है। झा ने कहा कि यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत उपलब्ध मुफ्त उपचार के कारण हो सकता है।

 

लिंग अनुसार पांच वर्ष की आयु के भीतर मृत्यु दर

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Source: MDS

 

वर्ष 2000 से 2015 तक, पांच वर्ष की आयु की लड़कों के मृत्यु दर में 49 फीसदी की गिरावट हुई है, जबकि इसी आयु के लड़कों में 47 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

एसडीजी लक्ष्य के करीब

 

भारत की अगली चुनौती बच्चे और नवजात शिशु मृत्यु दर पर 2030 सशक्त विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को पूरा करना है, जिन पर देशों ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तत्वावधान में सहमति व्यक्त की है।

 

एसडीजी बाल मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित जन्मों के लिए 25 और नवजात शिशु मृत्यु दर को प्रति 1000 जीवित जन्मों में 12 तक कम करना है।

 

अध्ययन में कहा गया है कि, वर्ष 2015 के बाद बाल मृत्यु दर में 4.1 फीसदी और नवजात शिशु मृत्यु दर में 5.3 फीसदी की औसत वार्षिक गिरावट आवश्यकता होगी।

 

भारत इसे शिक्षा, जन्मपूर्व देखभाल और पोषण में सुधार, और मातृ अशक्तता और तम्बाकू के उपयोग को कम करने के द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है, जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है।

 

अध्ययन कहता है कि वर्ष 2014 में शुरू की गई अपनी न्यूबॉर्न एक्शन प्लान के तहत, स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा घर-घर जाकर भारत को ‘नवजात काल’ के लिए अधिक ध्यान देना चाहिए। वर्ष 2030 तक नवजात मौतों को पूर्ण रूप से रोकने के लिए समयपूर्व जन्म और जन्म के समय कम वजन के लिए हस्तक्षेप पर अधिक शोध करना चाहिए।

 

(यदवार प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 5 अक्टूबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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