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2016 में किसान आत्महत्या में 21फीसदी की गिरावट

चैतन्य मल्लापुर,

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17 नवंबर 2014 को आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार वाले हैदराबाद में प्रदर्शन करते हुए

 

मुंबई: गृह मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में भारत में कम से कम 6,351 किसानों/ खेती करने वालों ने आत्महत्या की है या यूं कहें कि हर रोज 17 किसानों के आत्महत्या का आंकड़ा रहा है। यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2015 में यह आंकड़ा 8, 007 या रोजाना 22 आत्महत्या का रहा है। यानी आत्महत्या के आंकड़ों में 21 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

कृषि क्षेत्र में आत्महत्याओं के मामलों में 10 फीसदी की गिरावट हुई है । आंकड़ों में देखें तो 2015 में 12,602 था, जो 2016 में 11,370 हुआ है। जैसा कि 20 मार्च, 2018 को कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री परशुराम रुपाला द्वारा लोकसभा में दिए गए जवाब से पता चलता है।

 

गृह मंत्रालय का एक विभाग, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के आधार पर मंत्री का जवाब 2016 में आत्महत्या के कारणों का खुलासा नहीं करता है।

 

मंत्री ने अपने जवाब में कहा, “2015 की एनसीआरबी रिपोर्ट में, दिवालियापन या कर्जदाता और कृषि संबंधी मुद्दों को किसानों / खेतीहर के बीच आत्महत्या के प्रमुख कारणों के रूप में माना गया है। बीमारी के बाद की पारिवारिक समस्याएं कृषि मजदूरों के बीच आत्महत्या के प्रमुख कारण रहे हैं।”

 

कृषि मजदूरों की आत्महत्या में 9 फीसदी की वृद्धि हुई है। आंकड़ा 2015 में 4,595 था यानी13 आत्महत्या हर दिन, जो 2016 में 5,019 हुआ है, यानी 14 आत्महत्या प्रतिदिन)।

 

कृषि क्षेत्र में आत्महत्या, 2016

Source: Lok Sabha; *2016 data is provisional

 

2007 से 2016 के बीच कृषि क्षेत्र में होने वाले आत्महत्याओं के मामलों में 32 फीसदी की गिरावट हुई है। ये आंकड़े दशक में सबसे कम हैं। पिछले 10 वर्षों में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं (कुल 17,368) वर्ष 2009 में दर्ज की गई हैं।

 

कृषि क्षेत्र में आत्महत्या 2007-16

भारत की कृषि विकास दर अस्थिर है। 2012-13 में 1.5 फीसदी से 2013-14 में 5.6 फीसदी, 2014-15 में -0.2 फीसदी से 2016-17 में 4.9 फीसदी और 2017-18 में 2.1 फीसदी ।

 

भारत की कृषि विकास दर

भारत के कृषि क्षेत्र का अत्यधिक हिस्सा वार्षिक मानसून पर निर्भर है। भारत के 52 फीसदी खेतों में  सिंचाई की सुविधा नहीं है। जलवायु परिवर्तन इसे और अधिक अनिश्चित बना रही है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 8 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

भारतीय कृषि 2015-16 की रिपोर्ट कहती है, “छोटे और सीमांत भूमिधारकों की ज्यादा संख्या इस अस्थिरता को और भी चिंताजनक बनाता है, क्योंकि छोटे और सीमांत किसान प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों में अक्सर टूट जाते हैं।”

 

2016 में सबसे अधिक महाराष्ट्र के किसानों की आत्महत्याएं कीं

 

2016 में, महाराष्ट्र में सबसे अधिक किसानों या खेती करने वालों की आत्महत्या ( 2,550 या सात दिन में हर दिन) दर्ज की गई है। प्रतिशत में देखें तो 40 फीसदी। इसके बाद कर्नाटक (1,212), तेलंगाना (632), मध्य प्रदेश (599) और छत्तीसगढ़ (585) का स्थान रहा है।

 

पिछले साल के मुकाबले 2016 में महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याओं में 16 फीसदी की कमी आई थी।

 

2016 में, महाराष्ट्र ने सबसे ज्यादा (22 फीसदी) कृषि श्रमिकों , कुल 1,111 या रोजाना तीन की आत्महत्या की रिपोर्ट की है। हालांकि, ये आंकड़े  पिछले वर्ष की तुलना में 12 फीसदी कम रहे हैं।

 

महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक (867), मध्य प्रदेश (722), आंध्र प्रदेश (565) और गुजरात (378) का स्थान रहा है।

 

महाराष्ट्र भर से, 35,000 से अधिक किसान ( भूमिहीन और भूमिधारक ) पूरी तरह ऋण माफी की मांग और किसानों को आदिवासियों की जमीन के हस्तांतरण की मांग के साथ 180 किलोमीटर की यात्रा कर मुंबई पहुंचे थे, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 12 मार्च, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

महाराष्ट्र उन शीर्ष चार राज्यों में शामिल हैं, जहां वन क्षेत्रों में पारंपरिक आदिवासियों का स्थान है, जहां आदिवासी किसानों को भूमि अधिकार दिए जा सकते हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड 16 मार्च, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

हालांकि, राज्य ने लगभग दो-तिहाई समुदाय या वन भूमि के व्यक्तिगत आदिवासी स्वामित्व के दावों को खारिज कर दिया है, जैसा कि आदिवासी मंत्रालय के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है। 10 अक्टूबर 2017 तक प्राप्त 364,358 दावों में से राज्य ने 64 फीसदी (231856 दावों) को खारिज कर दिया था।

 

तमिलनाडु में किसानों की आत्महत्याएं 2015 में दो से बढ़कर 2016 में 36 हो गईं है। यानी आंकड़ों में 18 गुना वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर 2016 में तमिलनाडु में कृषि क्षेत्र में 381 आत्महत्याएं दर्ज की गईं है। अक्टूबर से दिसंबर 2016 तक तमिलनाडु में कम से कम 144 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या किया है और एक महीने में 106 किसानों द्वारा आत्महत्या की सूचना दी गई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 10 जनवरी, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

2016 में पूर्वोत्तर मानसून का कम होना,1876 ​​के बाद से पिछले 140 वर्षों में सबसे खराब रहा है। 5 जनवरी, 2017 को, तमिलनाडु के जलाशयों में उनकी क्षमता से 20 फीसदी से भी कम पानी था,जो कि राज्य में सबसे बद्तर स्थिति मानी गई है।

 

तमिलनाडु के किसानों ने अप्रैल से जुलाई, 2017 के बीच ऋण मुक्ति, संशोधित सूखा पैकेज, कावेरी प्रबंधन समिति और उनके उत्पादों के लिए उचित कीमतों की मांग करते हुए दिल्ली में विरोध किया था, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स ने 19 जुलाई, 2017 की रिपोर्ट में बताया है। किसानों ने सूखे और कर्ज के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों के कथित रूप से खोपड़ी और हड्डियों के साथ विरोध प्रकट किया था।

 

तनावग्रस्त और कर्ज का बोझ, लगातार फसल विफलता और कम पैदावार के बोझ के कारण 2015 में कम से कम 4,659 किसानों ने आत्महत्या किया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 2 जनवरी, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

47,000 रुपये की औसत बकाया ऋण के साथ भारत के कृषि घरों में लगभग 52 फीसदी ऋणी हैं, जैसा कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के आधार पर कृषि सांख्यिकी 2016 सर्वेक्षण (जनवरी-दिसंबर 2013), कृषि सांख्यिकी 2016 से पता चलता है। इस संबंध में  इंडियास्पेंड ने 1 अगस्त, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

बड़े खेतों वाले 0.6 फीसदी परिवारों की तुलना में सीमांत भूमिधारक वाले कृषि घरों में सबसे ज्यादा ऋणी (64 फीसदी) हैं।

 

भारत के 90 मिलियन कृषि घरों में लगभग 70 फीसदी हर महीने अपने कमाई से ज्यादा खर्च होता है, जो उन पर और कर्ज का बोझ डालते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 27 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

नौ अन्य राज्यों ( मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ) ने भी पिछले वर्ष कृषि ऋण छूट और उचित वेतन की मांग करने वाले किसान आंदोलन और विरोध प्रदर्शन का सामना किया है।

 

फरवरी 2018 में सात राज्यों से 3,000 से ज्यादा किसानों ने ऋण माफी और 23 फरवरी, 2018 को केंद्र सरकार से उनकी फसलों के लिए उच्च मूल्य की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन किया है, जैसा कि  Scroll.in ने 25 फरवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

 

जून, 2017 में, मध्यप्रदेश के मंदसौर के किसानों ने राज्य के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में उत्पादन और ऋण छूट के लिए बेहतर मूल्य की मांग पर विरोध किया था, जैसा कि  हिंदुस्तान टाइम्स ने 7 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, सूत्रों के अनुसार सरकार की प्रतिक्रिया की कमी के कारण किसानों ने प्रदर्शन किया था।

 

(मल्लापुर विश्लेषक हैं । वे इंडियास्पेंड और FactChecker से जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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