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2016 में ग्रामीण रोज़गार में कमी के कारण पलायन में वृद्धि: यशोदाबाई की कहानी

अभिषेक वाघमारे,

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मराठवाड़ा के खेतों में काम करने वाली 38 वर्षीय यशोदाबाई, मुंबई के घाटकोपर इलाके में बांस और तिरपाल से बने घर में रहती है। यहां न तो बिजली है और न ही पानी है। या तो यहां बहुत गर्मी होती है या गीला रहता है। बारिश होने पर खाना, कपड़े और दवाईयां, सब भीग जाते हैं। लेकिन फिर भी पैसे कमाने के लिए यशोदाबाई को अपने परिवार के साथ मुंबई पलायन करना पड़ा है। यशोदाबाई को साहूकार के 1.5 लाख रुपए वापस करने हैं।

 

“Village republics have been the ruination of India.What is the village, but a sink of localism and a den of ignorance, narrow-mindedness and communalism. I am glad that the draft constitution has discarded the village and adopted the individual as its unit.”

 

Dr. Bhimrao Ambedkar, Constituent Assembly Debates, Vol. VII, 6/11/1948

 

महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्र, मराठवाड़ा से, पिछले तीन वर्षों में 38 वर्षीय यशोदाबाई अपने पति, तीन बेटे, तीन बेटियां, देवर, देवरानी के साथ दूसरी बार मुंबई पलायन किया है।

 

सोने की नथ और मंगलसूत्र से खेलते हुए राठौड़ ने अनिच्छा लेकिन स्पष्टवादिता के साथ अपनी कहानी साझा की है। अपनी कहानी बताते हुए वे अपनी देवरानी, नागेश्री के साथ दिन का काम पर भी चर्चा कर रही थी।

 
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25 वर्षीय नागेश्री विष्णुकांत की शादी विष्णुकांत से हुई है जो उससे करीब तीन-चार साल छोटा है। अपने गांव के 50 परिवारों की तरह ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) के तहत, नागेश्री ने भी 30 दिनों के काम के लिए कोई पैसा नहीं कमाया है – एक स्थानीय घोटाले का नतीजा है- मनरेगा विश्व का सबसे बड़ा रोज़गार कार्यक्रम है जिसके तहत हर वर्ष 100 दिनों का रोज़गार दिया जाता है।

 

यशोदाबाई काम की तलाश में तब बाहर आई जब परिवार में पैसों की काफी तंगी हुई है। निर्माण-स्थलों पर अकुशल मजदूर के रुप में काम करके वह रोज़ाना 300 रुपए कमा लेती हैं। यशोदाबाई के परिवार का बस द्वारा 600 किलोमीटर का पलायन करना सरकारी कार्यक्रम, जो गरीबों को, विशेष रुप से संकट के समय, काम उपलब्ध कराने के लिए शुरु किया गया है, उसके प्रशासनिक विफलता का संकेत देती है।

 

राठौड़ परिवार के पांच लोगों ने पिछले वर्ष नांदेड़ के दक्षिणी जिले में मुखेड़ तालुक में बसे अपने नेवली गांव में, विश्व के सबसे बड़े रोज़गार योजना, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) , के तहत 30 दिनों के लिए पत्थर तोड़ने एवं अस्थायी सड़क निर्माण काम किया है।

 
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38 वर्षीय यशोदाबाई की तीन बेटियां और तीन बेटे हैं। यशोदाबाई की सबसे बड़ी बेटी की शादी 14 वर्ष की आयु में हुई है। एक बेटी ने आठवी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी है और सबसे छोटी बेटी पांचवी कक्षा में पढ़ती है और शायद उसकी भविष्य भी अपनी बहनों की तरह ही है।

 

घोटाले के नतीजे – जैसा हम आगे विस्तार से बताएंगे – प्रशासनिक खामियों और साल के सबसे बुरे सूखे में मनरेगा की विफलताओं का संकेत देता है। कानूनी रुप से मनरेगा की तहत 100 दिनों के रोज़गार की गारंटी है।

 

बजाय इसके, चार गुना परिवार (80-100 के बजाय 350) मुखेड़ से पलायन कर मुबंई के घाटकोपर में तिरपाल व बांस के घरों में अस्थायी प्रवासी के रुप से रह रहे हैं। इंडियास्पेंड के सर्वेक्षण के हिस्से के रूप में इस श्रृंखला के पहले भाग में हमने इनके जीवन पर प्रकाश डाला था।

 

ग्रामीण रोज़गार योजना विफल, मुखेड़ से मुबंई होने वाले पलायन में वृद्धि

 

राठौड़ परिवार, दो अन्य जोड़ों के साथ, अपने गांव में दो एकड़ ज़मीन के मालिक हैं। पिछले वर्ष, वर्षा की कमी के बाद, वहां सिंचाई के लिए कोई कुआं या बोरवेल नहीं है जिससे सर्दियों की फसल उगाई जा सके।

 

2015 में मानसून के चार महीनों के दौरान वे खेतीहर मजदूर के रुप में काम करती थी। एक हफ्ते में उन्हें तीन दिन काम मिल पाता था। महिलाए रोज़ाना 100 रुपए एवं पुरुष 200 रुपए तक कमा लेते थे। मानसून के चार महीनों में परिवार ने 20,000 रुपए कमाया था जो कि पर्याप्त नहीं है।

 

मनरेगा की विफलता के साथ – केवल इसके संबंध में ही उसे जानकारी है कि उसका काम एक जॉब कार्ड में दर्ज होती है – कई अन्य परिवारों की तरह ही उसका परिवार भी विश्व के सबसे बड़े रोज़गार योजना, जिसे 2013 में विश्व बैंक ग्रामीण विकास के लिए एक “तारकीय” उदाहरण कहा था,  उसी कार्यक्रम में अपना विश्वास खो चुका है।

 

मुखेड़ में पलायन का मुख्य कारण मनरेगा की विफलता है।

 
मनरेगा के तहत काम करने वाले सभी श्रमिकों को भुगतान नहीं मिला

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Source: IndiaSpend Primary Survey – Migrants In Mumbai, May 2016, Mumbai

 

कल्पना क्षीरसागर, नांदेड़ जिला परिषद के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “2011-12 तक पूरे ज़िले में मनरेगा का काम पूरे जोर पर था।” उन्होंने यह स्वीकार किया कि  “पिछले तीन वर्षों में गतिविधि धीमी पड़ी है विशेष रूप से नांदेड़ जिले के मुखेड़ तालुक में”, जहां राठौड़ का गांव है।

 

मजदूरी पर व्यय, कार्यरत दिनों में लोगों की संख्या और जो मुखेड़ ज़िले में काम करते हैं उनमें वर्ष 2012-13 से 2015-16 के बीच तेजी से गिरावट आई है; अवधि जिस दौरान स्थानीय नेताओं के अनुसार मुंबई के प्रवासियों में वृद्धि हुई है।

 

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कार्यकर्ताओं की मजदूरी पर खर्च राशि

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Source: MGNREGA dashboard

 

2015-16 के दौरान, 782 श्रमिकों के मनरेगा मजदूरी पर 26 लाख रुपए से अधिक खर्च नहीं हुआ है जबकि 2012-13 में 45,800 श्रमिकों पर 25 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं।

 

कैसे मनरेगा में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताएं बढ़ी

 

तुषार राठौड़,विधानसभा में मुखेड़ तालुका का प्रतिनिधित्व करने वाले भाजपा सदस्य, कहते हैं कि, यह आंकड़े वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

 

इंडियास्पेंड से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “2009 से 2014 तक, हमारे तालुका में मनरेगा के तहत कागजो पर बहुत काम हुए हैं। लेकिन वास्तविकता में, कई सारे काम मशीनों द्वारा किए गए हैं और रोज़गार रजिस्टर में मजदूरों के फर्ज़ी नाम दाखिल किए गए हैं। पैसों की हेराफेरी की गई है, श्रमिकों को पता ही नहीं था कि उनके नाम इस्तेमाल किए गए हैं, किसी को भुगतान नहीं किया गया है और और घटिया गुणवत्ता के कार्य पूरे किए गए थे।”

 

जब इस घोटाले की खबर बाहर आई तब जिला मजिस्ट्रेट ने 23 गांवों में आपराधिक कार्रवाई शुरू की और सरपंच, ग्राम सेवक सहित 200 आरोपियों के नाम दर्ज किए गए थे, जो गांव से भाग गए थे।

 

विधायक राठौड़ कहते हैं कि गांव में पंचायत न होने के कारण तालुका में, “स्थिति बुरी” है।

 

क्षीरसागर, नौकरशाह, कहते हैं कि जिन लोगों ने मनरेगा के लिए भाग लिया है, उन लोगों ने भी बड़े खेतों पर काम करते हुए बड़ा पैसा कमाया है और निर्माण स्थलों पर काम करते हुए अब भी अधिक पैसे कमाते हैं। इसलिए वे स्वभाविक रुप से मनरेगा से दूर रहते हैं।

 

हालांकि, राठौड़ पुष्टि करते हैं कि यदि मनरेगा ठीक प्रकार काम करता तो कई लोग इससे जुड़े रहते।

 

यशोदाबाई कहती हैं कि, “यदि हमारे गांव में पर्याप्त काम मिलता और पर्याप्त पैसे मिलते तो हमें यहां आने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती।”

 

यशोदाबाई के गांव, नेवली, के एजेंट ने, जो मनरेगा की देखरेख करते हैं, यशोदाबाई के परिवार को उनके किए काम का भुगतान नहीं किया है। एजेंट का कहना था कि उन्हें भी सरकार की ओर से राशि प्राप्त नहीं हुई है।

 

यशोदाबाई कहती हैं, “मनरेगा की देखरेख करने वाला गांव के पुलिस अफसर का बेटा था। उसने हमसे बार-बार कहा कि वो हमारे बकाया पैसे दे देगा लेकिन उसने पैसे कभी दिए नहीं। उसका परिवार गांव में एक शक्तिशाली प्रशासनिक पद नियंत्रित करता है। हम कुछ नहीं कर सकते थे।”

 

इसलिए पलायन जारी रहता है। यशोदाबाई कहती हैं, “इस सोमवार आईए, आप हमें नहीं देखेंगे। हम अपने गांव में खेतों पर काम करने वापस जा रहे हैं।”

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

श्रेया मित्तल और सुकन्या भट्टाचार्य, सिम्बायोसिस स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से स्नातक हैं एवं इंडियास्पेंड के साथ इंटर्न हैं। दोनों ने इस सर्वेक्षण में योगदान दिया है।

 

फोटोग्राफर: जयंत निकम , शारी अकादमी ऑफ फोटोग्राफ़ी, मुंबई

 

यह तीन श्रृंखला लेख का तीसरा और अंतिम भाग है। पहला और दूसरा भाग यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

 

यहे लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 15 जून 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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