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2017 में मनरेगा को मिली सबसे ज्यादा राशि, फिर भी 56 फीसदी मजदूरी विलंबित

अश्विनी कुलकर्णी,

 

2017-18 के बजट में, दुनिया के सबसे बड़े रोजगार योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को सबसे ज्यादा धन आवंटित किया गया। इस योजना को 48,000 करोड़ राशि दी गई थी लेकिन 56 फीसदी मजदूरी देने में देरी हुई और 15 फीसदी मजदूरों को 2016-17 में काम नहीं मिला है, जैसा कि सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है।

 

हालांकि, सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए “ग्रामीण रोजगार योजना में 7,000 करोड़ रुपए अतिरिक्त देने का निर्णय लिया है, जैसा कि ‘द टेलीग्राफ ’ ने 5 जनवरी, 2018 की एक रिपोर्ट में बताया है। पिछले एक साल में आठ राज्यों ने सूखा घोषित किया है और कृषि संकट के कारण 6,867 किसानों के आत्महत्या करने की रिपोर्ट मिली है। भारत का कृषि विकास घट रहा है, और अब तक 2.1 फीसदी की गिरावट आई है, जैसा कि सरकारी आंकड़ों से पता चलता है।

 

भारत के कृषि का 64 फीसदी वर्षा पर निर्भर है और 85 फीसदी भारतीय किसानों को छोटे या सीमांत रूप में वर्गीकृत किया जाता है, यानी वे 5 एकड़ से कम भूमि के मालिक हैं।

 

नोटबंदी से मुसीबतें और बढ़ने के साथ, जैसा कि इंडियास्पेंड ने यहां और यहां बताया है, बढ़ती ग्रामीण संकट से निपटने के लिए मनरेगा महत्वपूर्ण हो जाता है।

 

पिछले साल की लंबित देनदारियों में वृद्धि, 50 फीसदी से अधिक मजदूरी लंबित

 

वर्ष 2012-13 और 2016-17 के बीच, मनरेगा के खर्च के प्रतिशत के रूप में लंबित भुगतान, 39 फीसदी से बढ़कर 56 फीसदी हो गया और प्रत्येक पांच वर्षों में खर्च, आवंटन से अधिक हो गया है।

 

लेकिन निधीकरण धीमा और अनियमित रहा है ( जैसा कि एक श्रमिक समूह नरेगा संघर्ष मोर्चा का हवाला देते हुए ‘द वायर ‘ने अक्टूबर 2017 में रिपोर्ट किया था ) और जिस कारण लंबित भुगतानों का बैकलॉग बढ़ा है।

 

मनरेगा व्यय, 2012-13 से 2016-17

इस बीच, वर्ष 2016-17 में सभी मनरेगा वेतन भुगतान में विलंबित मजदूरी की हिस्सेदारी 56 फीसदी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2012-13 में यह आंकड़े 39 फीसदी थे। वर्ष 2014-15 में सभी मजदूरी भुगतानों में से 73 फीसदी की देरी हुई थी।

 

श्रमिक को मजदूरी भुगतान में विलंब

25 जनवरी 2018 तक, मनरेगा फंड के मामले में आठ राज्यों में 1,555 करोड़ रुपये का शुद्ध नकारात्मक बैलेंस था, इसका मतलब हुआ कि मनरेगा पर केंद्र से प्राप्त राशि की तुलना में उन्होंने अधिक खर्च किया है।

 

31 अक्टूबर, 2017 तक, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत 19 राज्यों में मजदूरी भुगतान स्थिर किए गए हैं, जैसा कि आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर 6 नवंबर, 2017 को इंडियास्पेंड ने अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

97 फीसदी ग्राम पंचायतों (ग्राम परिषद) में इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (ई-एफएमएस) के कार्यान्वयन के बावजूद मजदूरी भुगतान में देरी हुई है। “राज्यों में धन की अनावश्यक पार्किंग को कम करने के लिए” ई-एफएमएस के तहत, मजदूरी को इलेक्ट्रॉनिक रूप से कार्यकर्ता के बैंक / डाक घर खातों में हस्तांतरित की जाती है, जैसा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 4 जनवरी, 2018 को लोकसभा को बताया है।

 

बैंक से धन प्राप्त करना भी एक लंबी प्रक्रिया है। ग्रामीण भारत में, प्रति 100,000 आबादी पर 7.8 बैंक शाखाएं हैं। यह शहरी भारत में प्रति 100,000 आबादी पर 18.7 शाखाओं  की तुलना में आधी है, जैसा कि भारतीय रिज़र्व बैंक की दिसंबर 2015 की रिपोर्ट कहती है।

 

2016-17 में, 89 मिलियन मजदूरी के इच्छुक, केवल 76 मिलियन को मिला काम

 

मनरेगा एक मांग-आधारित कार्यक्रम है- अर्थात, मजदूरी के इच्छुक लोग कार्यक्रम के तहत काम पाने के लिए पंजीकृत कर सकते हैं। मनरेगा डैशबोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, मजदूरी के लिए इच्छुक पंजीकृत लोगों में से केवल 85 फीसदी लोगों को 2016-17 में काम मिला है।

 

मनरेगा काम: मजदूरी की मांग बनाम प्राप्त मजदूरी


 

(कुलकर्णी  नासिक में गैर सरकारी संगठन ‘प्रगति अभियान’ के संस्थापक ट्रस्टी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 29 जनवरी, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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