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2030 तक कुपोषण समाप्त करने के लिए क्या है भारत की आवश्यकताएं: आंकड़े

लॉरेंस हद्दाद,

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यह कहना नासमझी की तरह लग सकती है कि कुपोषण को समाप्त करने के प्रयासों के मार्गदर्शन के लिए आंकड़ों की आवश्यकता है। क्या विश्वसनीय डेटा की एक नियमित धारा के बिना हम एक अर्थव्यवस्था चला सकते हैं ? यदि हम ऐसा करते हैं तो यह एक अंधी उड़ान होगी और हम यह जानते हैं कि ऐसी कोशिश करने का क्या परिणाम हो सकता है। और उनकी भी ठीक ऐसी ही स्थिति है जो भारत में कुपोषण समाप्त करने के प्रयासों में जुटे हैं।

 

2013-14 से बच्चे के आंकड़ों पर रैपिड सर्वे (RSOC ) तक आखिरी राष्ट्रीय प्रतिनिधि पोषण सर्वेक्षण को सात वर्ष हो चुके हैं, तीसरा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस -3) । सात साल! हमने सुना है कि एनएफएचएस 4, अगली बड़ी सरकारी सर्वेक्षण, का काम जारी है और हमें उम्मीद है कि 2018 तक यह पूरा हो जाएगा। यदि ऐसा होता है तो RSOC के बाद इसमें पांच साल का अंतराल होगा।

 

तो क्यों आंकड़े हैं महत्वपूर्ण?

 

जैसा कि 2016 की ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट हमें याद दिलाता है कि आंकड़े महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह हमें बताते हैं कि किस प्रकार की कुपोषण कम हो रही है और यह कितनी तेज़ी से होना चाहिए। अगर हमें यह पता है तो हम प्रयास समायोजित कर सकते हैं और इससे पहले की देर हो जाए, संसाधनों को दोबारा बांट सकते हैं। वे जवाबदेही के लिए भी महत्वपूर्ण है: हमें यह जानने की ज़रुरत है कि कैसे संसाधनों का आवंटन किया गया है और हमें प्रमुख हितधारकों जैसे कि सरकार, नागरिक समाज, विकास एजेंसियों या कारोबार के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए कहा जाए तो उसका क्या प्रभाव हो रहा है।

 

किस प्रकार के आंकड़े हैं विवेचनात्मक? यह कम से कम पांच हैं।

 

सबसे पहले, हमे कुपोषण की हद का पता करने की जरूरत है : यह कहाँ है और यह कितनी तेज़ी से कम हो रहा है। भारत में, RSOC डेटा और ग्लोबल न्यूट्रीशन की रिपोर्ट के आधार पर स्तनपान की दर में सुधार की गति होने के साथ स्टंटिंग (कम विकसित) दरों में गिरावट की गति में सुधार हुआ है और यह अच्छी खबर है। लेकिन पांच वर्ष से कम आयु के भीतर अपव्ययी दर, 15.1 फीसदी के साथ उच्च है, वयस्क मधुमेह दरों में वृद्धि हो रही है और वर्तमान में 9.5 फीसदी पर है और महिलाओं की एनीमिया दर, 48.1 फीसदी के साथ अनिवार्य रूप से स्थिर हैं, जो कि दुनिया में सबसे बद्तर है (185 में से 170वां; चीन और ब्राजील के 20 फीसदी के भीतर  हैं, श्रीलंका 26 फीसदी पर है और नेपाल के 36 फीसदी पर है।)

 

आंकड़े बताते हैं कि कहां त्वरक लागू करना है, कहां ब्रेक लागू करने की कोशिश करनी चाहिए और कब विभिन्न प्राथमिकताओं को लागू करना चाहिए।

 

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Source: Global Nutrition Report

 

दूसरा, हमें यह जानने की आवश्यकता है कि क्या उच्च प्रभाव पोषण हस्तक्षेप उन लोगों तक पहुंच रहा है जिन्हें इसकी ज़रुरत है। हस्तक्षेप काम नहीं कर सकते यदि यह कुपोषण के जोखिम वाले परिवारों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। कवरेज पर भारत का एक विचित्र रिकॉर्ड है: कुछ हस्तक्षेप और प्रथाएं जैसे विशेष रूप से स्तनपान की कवरेज का उच्च दर है लेकिन इन शिशुओं और युवा बच्चों के खराब आहार पर्याप्तता और विविधता दिखाने के साथ शिशु और बालक पूरक फीडींग कार्यक्रमों की कवरेज बुरी है। कवरेज वहां होती है जहां पोषण कार्रवाई शुरु होती है। हमें यह देखने की ज़रुरत है कि यह सही रास्ते पर जा रही है या नहीं।

 

तीसरा, हमें यह जानने की आवश्यकता है कि पोषण सुधार के समर्थन में कुछ क्षेत्र कितना अच्छा कर रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली जो सूक्ष्म पोषक युक्त खाद्य पदार्थों का उपयोग करते हैं वह अन्य की तुलना में पोषण के प्रति संवेदनशील होते हैं। जल और स्वच्छता कार्यक्रम जिसमें बच्चों पर ध्यान केद्रित किया जाता है, वे अन्य की तुलना में पोषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। नकद हस्तांतरण प्रोग्राम, जिसमें पोषण के आसपास कुछ व्यवहार परिवर्तन संचार काम शामिल हैं, वे अन्य की तुलना में, पोषण के प्रति अधिक संवेदनशील है। इन क्षेत्रों के पोषण संवेदनशीलता का आकलन करने के लिए एक ही रास्ता यह है कि एक लाइन से राष्ट्रीय और राज्य और जिला बजट के माध्यम से जाना है – जैसा कि नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने हाल ही में कहा है – और निश्चित लाइन आइटम को नामित करें , माने तो, 0 , 25, 50, 75 और पोषण के लिए 100 फीसदी आवंटन । वे पूरी तरह से पोषण के प्रति संवेदनशील हैं, तो उन्हें 100 फीसदी वज़न दिया जाएगा। यदि वे पोषण के प्रति संवेदनशील एकदम ही नहीं हैं तो उनका स्कोर शून्य फीसदी होगा। चुनौती पोषण के लिए आवंटित कुल प्रतिशत में वृद्धि करना है। चुनौती का सामना करने के लिए हमें आंकड़ों की आवश्यकता है।

 

चौथा, हमें राज्य और उप राज्य स्तरों पर पहले तीन प्रकार के आंकड़ों की आवश्यकता है। जैसा कि भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट स्पष्ट रुप से दर्शाता है, विभिन्न राज्यों और विभिन्न जिलों में अलग- अलग पोषण की समस्या है, उन्हें संबोधित करने के लिए विभिन्न क्षमताएं होती हैं, और राजनीतिक प्रतिबद्धता और नेतृत्व के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं। इसके अलावा, जैसे हम जिला और समुदाय स्तर बढ़ते हैं, लोगों और उनके नेताओं के बीच की दूरी संकरी हो जाती है और इसलिए जवाबदेही का निर्माण करना आसान है। कार्रवाई के मार्गदर्शन और हर रोज जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए, हमें अलग-अलग आंकड़ों की अधिक आवश्यकता है।

 

पांचवी, हमें यह जानने की आवश्यकता है कि क्या काम कर रहा है। यदि हम नहीं जानते कि क्या पोषण कार्यक्रम वास्तव में काम कर रहा है, कहां काम कर रहा है, किसके लिए यह काम कर रहा है, क्यों काम कर रहा है, कैसे काम कर रहा है, तो हम फिर से संसाधनों को बर्बाद कर और गैर जिम्मेदाराना कार्य करते हुए आंखों पर पट्टी बांधे काम कर रहे हैं। भारत में अधिक अनुसंधान के वित्तपोषण को भारतीय पोषण हस्तक्षेप अधिक प्रभावी बनाने और आसानी से उपर बढ़ाने की दिशा में निर्देशित किए जाने की आवश्यकता है। नवाचार विकसित किए जाने, नियंत्रित करने, परीक्षण करने है और यदि लागत प्रभावी हैं, तो ऊपर पहुंचाने की आवश्यकता है। हालांकि, हस्तक्षेप के मूल्यांकन की लागत मामूली नहीं है, जैसा कि 2014 ग्लोबल न्यूट्रीशन की रिपोर्ट से पता चलता है, पहचान करने के लाभ – लागत अनुपात और हस्तक्षेप को ऊपर पहुंचाना जो कुपोषण रोकने के लिए काम करते हैं, भारी रहे हैं : भारत के लिए 34 से 1।

 

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Source: Global Nutrition Report

 

विश्वसनीय और नियमित आंकड़ों के बिना राष्ट्रीय, राज्य या जिला आर्थिक रणनीति का कार्यान्वयन का प्रयास नहीं किया  जाएगा – ऐसी किसी भी रणनीति को निवेशक गंभीरता से नहीं लेंगे। और फिर भी यह एक पोषण रणनीति के लिए सहन किया गया है।

 

भारत सरकार द्वारा सतत विकास लक्ष्यों पर हस्ताक्षर पोषण संकेतक के अपने स्वयं के डैशबोर्ड विकसित करने के लिए, भारत को सही अवसर प्रदान करता है – जो विशिष्ट, मापने योग्य, कार्यान्वित होने योग्य, प्रासंगिक और समयबद्ध (स्मार्ट) लक्ष्य से जुड़ा हुआ है। किसी भी सरकार के लिए सबसे मुश्किल काम अपने लोगों को जवाबदेह बनाने के लिए सबी उपायों को सही स्थान पर लगाना है। लेकिन सभी सरकारों को आत्मविश्वास से कार्य करने की जरूरत है और माता, पिता और परिवारों द्वारा प्रदर्शित बहादुरी से मेल खाने की आवश्यकता है जो कुपोषण को रोकने और निपटने के लिए संघर्ष कर रहें हैं, एक ऐसी समस्या जो दुनिया की अगली पीढ़ी के भी कई प्रभावित कर रहा है।

 

सरकार जो पोषण पर गिने जाने और खड़े होने की अनुमति देता है एक ऐसी सरकार होगी जिनकी बहादुरी को एक अविश्वसनीय विरासत द्वारा पुरस्कृत किया जाएगा – 2030 तक कुपोषण के समाप्त होने का पुरस्कार।

 

(हद्दाद अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान में एक वरिष्ठ रिसर्च फैलो है और ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट के स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह के सह -अध्यक्ष हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 6 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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