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28,555 करोड़ रुपए के कर्ज में डूबा एविएशन सेक्टर क्या उसे चुका पाएगा?

अमित भंडारी,

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पहले किंगफिशर एयरलाइंस के अच्छे दिन गए। अब कम लागत वाली स्पाइसजेट के साथ यही नौबत आ गई है। पिछला कुछ सप्ताह स्पाइसजेट के लिए भी उसी तरह के बुरे सपनों वाला रहा है। कर्मचारियों को पगार देर से मिल रही है, उड़ान रद्द हो रहे हैं और तेल कंपनियोंहवाई अड्डों को भुगतान समय पर नहीं कर पाने के चलते परिचालन पर भी रोक लगने के संकट हैं।

 

लेकिन विमानन क्षेत्र में उतरने को तैयार कंपनियों को इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है। एक तरफ एयर एशिया ने भारत में अपना आपरेशन शुरू कर दिया है, तो दूसरी तरफ टाटा-एसआईए के संयुक्त उपक्रम के तहत विस्तारा भी जल्द उड़ान भरने वाली है।

 

नई कंपनियों का आना और बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही पुरानी कंपनियों का बंद होना किसी भी स्वस्थ उद्योग के लिए रोजमर्रा की बात है। लेकिन जब भारतीय नागरिक विमानन सेक्टर की वित्तीय स्थिति पर नजर डालें, तो पता चलता है कि मामला इतना सहज नहीं है।

 

इस सेक्टर के ये दुखदायी वक्त भारतीय बैंकों, खासकर उन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए बड़ा सरदर्द हैं, जिन्होंने विभिन्न विमानन कंपनियों को कुल 28,555 करोड़ रुपए का कर्ज दे रखा है। इसमें से 2,448 करोड़ रुपए ऐसे नहीं चुकाए गए कर्ज और उनके ब्याज हैं, जिन्हें वर्तमान में गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में डाला जा चुका है। विभिन्न विमानन कंपनियों को जो मौजूदा माली हालत है, उसे देखते हुए और कर्ज भी एनपीए में तब्दील हो सकता है।

 


Source: Rajya Sabha

 

स्पाइसजेट अकेली लाचार विमानन कंपनी नहीं है

 

आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय परेशानियों से जूझने वाली विमानन कंपनियों में स्पाइसजेट अकेली नहीं है। वित्त वर्ष 2014 में भारतीय विमानन कंपनियों को कुल मिलाकर 5,694 करोड़ रुपए का परिचालन घाटा हुआ है। स्पाइसजेट और जेट एयरवेज की वित्तीय जानकारियों का विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध है, क्योंकि दोनों ही सूचीबद्ध कंपनियां हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया की भी सीमित वित्तीय जानकारी मौजूद है।

 


Source: Lok Sabha; BSE 1,2

 

लेकिन ये आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं।

 

स्पाइसजेट को वित्त वर्ष 2014 में कुल 1,003 करोड़ और वित्त वर्ष 2015 की पहली छमाही में 434.5 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। जेट एयरवेज भी वित्त वर्ष 2014 में 3,668 करोड़ रुपए और वित्त वर्ष 2015 की पहली छमाही में 147.8 करोड़ रुपए का घाटा झेल चुकी है। यह बात दीगर है कि सितंबर 2014 में खत्म तिमाही के दौरान यह विमानन कंपनी फायदे में आ गई।

 

सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया को वित्त वर्ष 2014 में 5,388 करोड़ रुपए और वित्त वर्ष 2013 में 5,490 करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है।

 

साफ है कि घाटे का यह स्तर किसी भी तरह से सहनीय नहीं है।

 

जेट एयरवेज अपने लिए खाड़ी-स्थित एतिहाद के रूप में एक निवेशक खोजने में कामयाब रही है, जो जेट एयरवेज में  पूंजी लगाएगी। स्पाइसजेट को भी निवेशक की तलाश है और अगर वह इसमें नाकामयाब रही तो उसे बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है।

 

भारतीय बैंकों ने विभिन्न विमानन कंपनियों को 28,555 करोड़ रुपए का कर्ज दिया हुआ है और इसमें से 2,448 करोड़ रुपए को एनपीए घोषित किया जा चुका है।

 

नवीनतम सालाना रिपोर्ट बताती है कि वित्त वर्ष 2014 के आखिर में जेट एयरवेज पर लंबी अवधि का 6,546 करोड़ रुपए और स्पाइसजेट पर इसी तरह का 1,236 करोड़ रुपए का कर्ज था। एयर इंडिया पर वित्त वर्ष 2013 के आखिर में लंबी अवधि का 38,167.5 करोड़ रुपए कर्ज था। हालांकि कंपनी ने विदेशी स्रोतों से भी कर्ज ले रखा है, लिहाजा इसमें भारतीय बैंकों का जोखिम महज एक हिस्सा है।

 

भारत: आकर्षक बाजार, मगर उड़ान के लिए कठिन परिस्थितियां

 

हवाई यात्रा के मामले में भारत दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रहे बाजारों में एक है। लेकिन अभी भी यह शुरुआती चरण में है। यही इसे आकर्षक बाजार भी बनाता है।

 


*2014 figure is till October, Source: Parliament 1,2,3

 

यहां विमानन का कारोबार अपेक्षाकृत कम बाधाओं वाला है, हालांकि परिचालन खर्च खासा ऊंचा है। इसी के चलते यहां आपूर्ति ज्यादा हो गई है और कई प्रमुख विमानन कंपनियों को लगातार नुकसान हो रहा है।

 

सामान्य परिस्थितियों में अगर कोई कंपनी लगातार नुकसान झेलती है तो या तो वह कारोबार से बाहर हो जाती है या बिक जाती है। एयर डेक्कन बिक गई और किंगफिशर एयरलाइंस बंद हो गई। अब स्पाइसजेट के साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है।

 

ऐसे में परिचालन में मौजूद विमानन कंपनियों को ही फायदा होगा। मसलन, स्पाइसजेट द्वारा परिचालन सीमित करने के बाद कई विमानन कंपनियों ने किराए में बढ़ोतरी कर दी। फिर भी, भारतीय बाजार में एक बात बेहद खास है। वह यह कि यहां एक विमानन कंपनी ऐसी है जिसके साथ भले ही कुछ भी हो जाए, वह कारोबार से बाहर नहीं होगी। इसकी वजह यह है कि इसके प्रवर्तकों के पास इतना पैसा है कि जब भी कंपनी को पूंजी की जरूरत होती है, प्रवर्तक उसमें ताजा पूंजी निवेश कर डालते हैं। वह है- एयर इंडिया।

 

अन्य विमानन कंपनियों के मुकाबले एयर इंडिया के प्रबंधन को कम परिचालन स्वतंत्रता मिली हुई है। यह अपने बड़े निर्णयों में भी राजनीतिक हस्तक्षेप का कार होती रही है। वैसे, यह सभी सार्वजनिक कंपनियों के साथ है। फिर चाहे वह विमानन क्षेत्र की कंपनी हो, तेल व गैस क्षेत्र की या बैंकिंग क्षेत्र की। दुर्भाग्य यह है कि एयर इंडिया एक बेहद स्पर्धात्मक बाजार में ग्राहकों को सेवा देने वाली कंपनी है, इसलिए इस तरह  की बाधाएं उसके लिए नुकसानदेह हैं।

 

(अमित भंडारी ने मीडिया और आर्थिक अनुसन्धान में कार्य किया है। उन्होंने आईटी-बीएचयू से बी-टेक और आईआईएम-अहमदाबाद से एमबीए की डिग्री हासिल की हुई है।

 

Image credit:Flickr/VinTN

 
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