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5 चीजें जो जम्मू-कश्मीर बजट भारत को सिखा सकता है

इंडियास्पेंड टीम,

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जम्मू-कश्मीर के वित्त मंत्री हसीब द्राबू

 

“मैं दृढ़ता के साथ कह रहा हूँ  कि मैं नई दिल्ली तक भीख का कटोरा ले कर नहीं जाऊँगा। इसके बावजूद कि अब केंद्र में ना केवल एक दोस्ताना सरकार है बल्कि  इस तथ्य के बावजूद भी कि अब हमारे पास एक असाधारण रूप से संवेदनशील और मिलनसार केंद्रीय वित्त मंत्री भी है। ऐसा करके, मैं  जम्मू-कश्मीर के लोगों की गरिमा को बहाल करने की आशा करता हूँ जिन पर  हमेशा से सब्सिडी और उदारता पर जीवित रहने का आरोप लगाया जाता रहा है। हमारी सरकार का लक्ष्य आर्थिक आत्मनिर्भरता और राजकोषीय स्वायत्तता है। ” – हसीब दराबू, वित्त मंत्री, जम्मू और कश्मीर  

 

नरेंद्र मोदी के युग में ,एक पूर्व बैंकर, संपादक और अब पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ जिन्हे कश्मीरी अलगाववादी  एक “पाखण्डी”  मानते हैं, जो कभी विश्वास करते थे कि  वो उन्हीं में से एक हैं,  ने  भारतीय राज्यों के लिए बजट बनाने के लिए एक सुर स्थापित कर दिया है।  

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज्यों को और अधिक शक्ति और वित्त प्रदान करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए,  दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्री, पूर्व बैंक के अध्यक्ष, मिंट के साथ पूर्व स्तंभकार,  बिज़नेस स्टैंडर्ड.कॉम  के  संपादक और  राजपोरा, जम्मू-कश्मीर विधानसभा सदस्य अनुभवी द्राबू,54, ने पिछले सप्ताह वित्तीय स्वतंत्रता के उद्देश्य वाला एक बजट प्रस्तुत किया।  

 

“मैं केंद्र से  किसी भी ऎसी वित्तीय सहायता या अनुदान की मांग नहीं करूँगा जो भारत के संविधान में संघीय राजकोषीय प्रणाली के अन्तर्गत  सभी विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए प्रदान की गई सहायता के अतिरिक्त हो,”  पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) -भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गठबंधन के पहले बजट लेखक, द्राबू, ने कहा ।  

 

यह द्राबू के बजट की प्रमुख  पांच बातें हैं :  

 

1) अपव्ययी शासन  पर  सरल कथन  

 

द्राबू ने अपनी ही सरकार के बारे में कुछ ऐसा कहा: “अर्थव्यवस्था पर 10,000 करोड़ रुपये खर्च करने के लिए, सरकार लगभग तीन गुना (30,000 करोड़ रुपये)  राशि खर्च कर रही  है उस  मशीनरी पर जो 10,000 करोड़ रुपये खर्च करती है !”  

 

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा एक  राज्यबजट विश्लेषण के अनुसार, जम्मू एवं कश्मीर, के साथ-साथ  बिहार, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली, संपत्ति और लोगों के लिए अन्य अवसंरचना  निर्माण पर किए पूंजीगत व्यय की तुलना में राजस्व व्यय पर  – जिसमें  वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और अन्य राशि जो सरकार खुद पर खर्च करती है भी शामिल है -ज्यादा राशि  खर्च करते हैं ।  

 

जम्मू एवं कश्मीर के लिए व्यय, वित्त वर्ष 2012 -वित्त वर्ष 2014
बिहार के लिए व्यय, वित्त वर्ष  2012-वित्त वर्ष 2014

 

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हिमाचल प्रदेश के लिए व्यय, वित्त वर्ष  2012-वित्त वर्ष 2014
दिल्ली के लिए व्यय, वित्त वर्ष  2012-वित्त वर्ष 2014  
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Source: RBI; Figures in Rs crore

 

इन सभी तीन राज्यों के लिए वित्त वर्ष 2011-12  एक उच्च पूंजी व्यय का  वर्ष था। हालांकि, बाद के वर्षों , 2012-13 और 2013-14, में यह स्पष्ट हो गया कि   तीन राज्यों और दिल्ली में राजस्व व्यय से पूंजी व्यय कहीं ज्यादा था। इसका अर्थ हुआ सरकारें,  जिन पर शासन करती है उन लोगों की तुलना में स्वयं पर अधिक खर्च करती हैं।  

 

द्राबू ने  2015-16 में उनकी सरकार के की व्यय योजना के विषय में भी बताया: सम्पत्ति निर्माण के लिए 11,246 करोड़ रुपये राजस्व व्यय के लिए 35,227 करोड़ रुपये । जाहिर है, क्या हो रहा है यह जानना और तुरंत उसी समय उसे बदलना एक कठिन कार्य है।  

 

“अगले बजट में, हम खर्च की गई राशि से जमीन पर निर्मित की गई  भौतिक संपत्ति का विवरण प्रदान करेंगे ,” द्राबू ने कहा।  

 

वित्त मंत्री ने एक ऐसा कानून लाने का वादा किया जिसमे केवल  पूँजी सम्पत्ति के वित्तपोषण के लिए ही ऋण लेने की अनुमति होगी।  इंडिया स्पेंड ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि  कैसे महाराष्ट्र ने ऋण चुकाने के लिए ऋण ले ले कर अपने लिए $ 48 बिलियन का ऋण बना लिया है।

 

जब उन्होंने  संपत्ति सृजन से अधिक रोजगार सृजन पर बल दिया हसीब ने कुछ सरल स्पष्ट बातें भी की : “जब दुकान  चल पड़ेगी , मकान तो बन ही जाएगा” (जब कारोबार चलेंगे , मकान भी बनने लगेंगे)।  

 

2) सरल लेखांकन: आय और व्यय  

 

एक ही झटके में, द्राबू ने बजट-लेखन और लेखांकन के नियमों को फिर से लिख दिया है।  

 

यह समझना बहुत आसान है कि  पैसा कहाँ से आ रहा है और कहाँ  जाएगा । वो भारतीय वित्तीय बाबूओं की प्रिय भ्रामक शब्दावलियाँ योजना, गैर-योजना, राजधानी, राजस्व और गैर-राजस्व  अब खत्म हो चुकीं।  

 

अगले वित्तीय वर्ष 2015-16 से बजट केवल दो भागों में होगा: प्राप्तियाँ और व्यय।  

 

“इसके बदले में व्यय बजट में केवल राजस्व और पूंजीगत व्यय अनुमान होगा,” द्राबू ने कहा। “योजना और गैर योजना जैसे पूरे पुराने वर्गीकरण को हटा   दिया गया है। यह एक ऐसा बड़ा परिवर्तन है जिससे सार्वजनिक व्यय के आवंटन, दक्षता और निगरानी पर लम्बा और गहरा  प्रभाव पड़ेगा । यह बदलाव काफी हद तक बजट की जटिलता को कम कर देगा। ”  

 

“अब व्यय में केवल दो ही श्रेणियों होंगी  वर्तमान और पूंजीगत ; पहली जो हमारे दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए खर्च किया जाता है और दूसरा जो भूमि  पर संपत्ति निर्माण  पर खर्च किया जाता है । आने वाले वर्षों में, हम संपत्ति सृजन  के साथ खर्च की गई राशि की मैपिंग शुरू कर सकते हैं। ”  

 

द्राबू की बजट गणना सरल  हैं: कुल राजस्व प्राप्तियाँ : रुपये 42,137 करोड़; कुल सार्वजनिक व्यय: रुपये 46,473 करोड़; संसाधन अंतर  (46,473-42,137 = रु 4,336 करोड़ रुपये)। और यह 4336 करोड़ रुपये ” बिना अतिरिक्त धन की मांग किए 14 वें वित्त आयोग अनुदान को पूर्वसगिक कर वित्तपोषित किया जाना है।”  यह हैं द्राबू कथन कि  दिल्ली से कोई एहसान नहीं।  

 

रुपया कहां से आता है (%)
रुपया कहां जाता है (%)  

 

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Source: J&K Budget, 2015-16  

 

3 ) असहाय की रक्षा : छोटे व्यापारों, किसानों, महिलाओं  

 

द्राबू ने सब्सिडी और दान के साथ राजकोषीय जिम्मेदारी को कुछ इस तरह से संतुलित किया है ताकि  बाढ़ से तबाह उनके प्रांत में कमजोर लोग आत्मनिर्भर बनने में सक्षम हो सकें ।

 

कुछ उदाहरण:

 

    • जिन किसानों पर कम से कम 1 लाख रुपये की राशि बकाया है,उन  किसानों के किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) ऋण पर  50% की माफ़ी । लागत: 150 करोड़ रुपये।
    • 50,000 विधवाओं के लिए: शून्य शेष बचत खाता, 25,000 रुपये का जीवन बीमा कवर, 25,000 रुपये का दुर्घटना कवर, 5,000 रुपये बीमारी / रोग कवर  और  पांच साल बाद 25,000 रुपये का परिपक्वता / अस्तित्व लाभ।
    • जन्म से 14 साल तक हर लड़की के लिए प्रति माह 1,000 रुपये। 21 साल की उम्र में उसे  5 लाख रुपये प्राप्त होंगे।यह अनुदान राज्य में कम लिंग अनुपात को संबोधित करने के लिए है। लागत: 35 करोड़ रुपये।

 

जम्मू एवं कश्मीर में उन  छह संभव जिलों  पर एक नजर जहाँ  यह इस परियोजना को कार्यान्वित किया जा सकता है -यह एक पायलट योजना के रूप में  -2011 जनसांख्यिकी के आधार पर शुरू होगा :  

 

कम लिंग अनुपात वाले  जम्मू एवं कश्मीर के जिले  

 

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Source: Census 2011  

 

जम्मू और कश्मीर ने  बच्चों में लिंग अनुपात (1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या ) 2001 जनसांख्यिकी में 941 से 2011 जनसांख्यिकी में 859 की  गिरावट देखी है।  

 

4) राजस्व को बढ़ाने के लिए सेवाओं पर कर  

 

द्राबू राजस्व के नए स्रोतों के साथ  अनुदान को संतुलित करना चाहते हैं।  

 

“जम्मू एवं कश्मीर ही देश में एकमात्र राज्य है जहां सेवा पर कर लगाने का अधिकार है ,” उन्होंने कहा। “माल एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम, जम्मू एवं कश्मीर के आधार पर वस्तुओं और सेवाओं दोनों पर कर लगाने का अधिकार है। भारत के अन्य सभी राज्यों में केवल वस्तुओं पर कर लगाने का अधिकार है। विवादास्पद मुद्दा यह है कि जम्मू-कश्मीर एक विशेष कराधीन क्षेत्र है। इस तथ्य को देखते हुए कि नवीनतम अनुमानों के अनुसार, सेवा क्षेत्र जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) का 57% गठन करती है, लेकिन राज्य के खजाने में इसका योगदान शून्य है। अब तक हम इस क्षेत्र की पूरी क्षमता का दोहन करने में सक्षम नहीं हो सके हैं। ”  

 

तो, अब टैक्स के दायरे में विज्ञापन एजेंसियों, सुरक्षा सेवाओं, प्लेसमेंट सेवाऐं , सैलून और हेल्थ क्लब भी  शामिल हैं। इनसे 150 करोड़ रुपये तक अर्जित होना चाहिए।  

 

सेवाएँ भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 60% प्रतिशत भाग बनाती हैं, और भारत में सेवाओं पर कर (केन्द्रीय / राज्य सरकारों और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं सहित वे सेवाएँ जो  सेवा कर अधिनियम के तहत नहीं आती )  नकारात्मक सूची प्रणाली के आधार पर लगाया जाता है।  इंडिया स्पेंड ने अपनी पहली रिपोर्ट में बताया था कि 2014-15 में किस प्रकार अन्य करों की तुलना में सेवा कर संग्रह अधिक होने की उम्मीद थी।  

 

5) एक बजट मुख्य आर्थिक अवरोध -बिजली के लिए  

 

द्राबू  ने जम्मू एवं कश्मीर के लिए 41 पेज  बिजली  बजट प्रस्तुत कियाजो किसी भी भारतीय राज्य ले लिए पहला है जिनमे से अधिकांश बिजली की कमी के कारण  आर्थिक बाधाओं का सामना कर रहे हैं।  

 

उन्होंने कहा कि “सभी घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए 24 × 7 विश्वसनीय और सस्ती  बिजली ‘  और’ विकास के एक नए युग की उन्मुक्त शुरुआत ” के माध्यम से बिजली क्षेत्र का विकास , वित्तीय स्वायत्तता की कुंजी है ।  

 

यह सब करने की उम्मीद की एक विस्तृत योजना पेश करते हुए द्राबू ने कहा कि 57 परियोजनाओं- पनबिजली,  सौर और थर्मल-9344 मेगावाट (मेगावाट) की क्षमता के साथ की योजना बनाई है।  जिसके लिए 1 लाख करोड़ रुपये ($ 16 अरब डॉलर) के निवेश की आवश्यकता है।  

 

राज्य  22% के तीव्र  घाटे का सामना कर रहा है। 2014-15 में बिजली की मांग 2657 मेगावाट  जिसमे से केवल 2050 मेगावाट  की आपूर्ति होने की संभावना है।  

 

हमारा निष्कर्ष : द्राबू  का बजट भारत की  बजट प्रक्रिया में एक नए स्वर का प्रयास  है – उस राज्य से जो सदैव भारत से संघर्षरत प्रतीत होता है।  

 
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