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6 वर्षों में प्राथमिक स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा में कोई सुधार नहीं

रणजीत भट्टाचार्य और आदर्श गंगवार,

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प्राथमिक स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा पर गौर करें तो वर्ष 2010 में ग्रामीण इलाकों के 83 फीसदी सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा थी। वहीं वर्ष 2016 में, ग्रामीण इलाकों के 85 फीसदी से अधिक सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पीने के पानी का प्रावधान था। हालांकि, केवल 74 फीसदी स्कूलों में इस्तेमाल करने योग्य पीने के पानी की सुविधा थी।

 

हम बता दें कि 2010 में यह आंकड़े 73 फीसदी थे। आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में पीने के पानी की पहुंच में बहुत कम प्रगति नजर आई है। यह जानकारी ग्रामीण स्कूलों के नागरिक नेतृत्व वाले सर्वेक्षण, एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट ( एएसईआर ) के लिए एकत्र आंकड़ों में सामने आई है।

 

पीने के पानी की सुविधा में हैंडपंप, मिट्टी के घड़े या अन्य तरह के भंडारण बर्तन शामिल हैं।

 

वर्ष 2016 में, 619 ग्रामीण भारतीय जिलों में से 589 जिलों में ‘एएसईआर’ का सर्वेक्षण आयोजित किया गया था। सर्वेक्षणकर्ताओं ने 17,473 प्राथमिक स्कूलों का दौरा किया था। ‘एएसईआर’  वर्ष 2009 से ग्रामीण प्राथमिक स्कूलों में जल और स्वच्छता के बुनियादी ढांचे पर डेटा एकत्र कर रहा है।

 

करीब 20 करोड़ छात्र भारत के प्राथमिक सरकारी स्कूलों में नामांकित हैं। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि इन छात्रों को बैक्टीरिया के संक्रमण के जोखिम से बचने के लिए सुरक्षित और स्वच्छ पानी मिले। ऐसा नहीं होने पर दस्त जैसी बिमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।

 

अध्ययनों से पता चला है कि बचपन में होने वाले दस्त से छात्र स्कूलों से अनुपस्थित तो रहते ही हैं,इसका संबंध कुपोषण से भी है। यहां तक ​​कि दस्त की वजह से अवरुद्ध विकास के मामले भी बढ़ते हैं।

 

स्कूलों में, पीने के पानी की सुविधा को भी उन्हीं समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो स्वच्छता सुविधाओं को करना पड़ रहा है। वर्ष 2016 में, भारत के 96.5 फीसदी ग्रामीण प्राथमिक सरकारी स्कूलों में शौचालय तो थे, लेकिन चार में से एक से अधिक (27.7 9 फीसदी) शौचालय या तो बेकार थे या बंद थे, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई 2017 को अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

सितंबर 2014 में, केंद्र सरकार ने ‘स्वच्छ भारत स्वच्छ विद्यालय कार्यक्रम’ के तहत ‘स्कूलों में वाश (वाटर, सैनटैशन एंड हाइजीन) के लिए नई सरकार का रोडमैप’ शुरू किया था, जैसा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के लिए यूनिसेफ द्वारा तैयार ‘क्लीन इंडिया: क्लीन स्कूल’ पर एक पुस्तिका में बताया गया है। अन्य चीजों के साथ यह ‘बच्चों के लिए अनुकूल और स्थायी सुरक्षित पीने के पानी के प्रावधान’ के महत्व पर जोर देती है।

 

लेकिन सरकार पानी के बुनियादी ढांचे की उपयोगिता को ट्रैक नहीं करती है, और न ही पानी और स्वच्छता पर विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में इसका जिक्र है।

 

सर्व शिक्षा अभियान की रूपरेखा कहती है कि हर स्कूल में पीने के पानी की व्यवस्था जरूरी है। रूपरेखा के अनुसार, “भारत सरकार में ग्रामीण विकास मंत्रालय  के पेयजल आपूर्ति विभाग के पास  ग्रामीण स्कूलों में पेयजल सुविधा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल मिशन के तहत प्रावधान है । “लेकिन स्पष्ट रूप से इस तरह की सुविधाओं की उपयोगिता का उल्लेख नहीं है।

 

भारत भर में, प्राथमिक स्कूलों में 1/4 पेयजल सुविधाएं इस्तेमाल योग्य नहीं हैं

Source: Annual Status of Education Report

 

क्या छात्र पीते हैं सुरक्षित पानी?

 

शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई) पीने के पानी की गुणवत्ता पर डेटा एकत्रित नहीं करता है।

 

हालांकि, सरकार के दिशानिर्देशों के तहत पीने के पानी का परीक्षण करने का प्रावधान है, लेकिन परीक्षण की आवृत्ति और ऐसे परीक्षणों के निष्कर्ष, जो जिला प्रशासन के साथ दर्ज किए जाएं, उन पर कुछ ही जानकारी है और उन तक पहुंच मुश्किल है।

 

‘एएसईआर’ द्वारा पीएएचइएल (पीपल्स असेस्मन्ट ऑफ हेल्थ, एजुकेशन एंड लाइव्लीहुड) नामक एक मानव विकास मूल्यांकन के अनुसार, वर्ष 2011 में, पूरे भारत के सात जिलों के आधे स्कूलों में पीने का पानी दूषित था।

 

भारतीय स्कूलों में पीने के पानी के गुणवत्ता पर आंकड़ों की कमी

Source: ASER People’s Assessment of Health Education and Livelihoods (PAHELI) survey

 

स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा में थोड़ी सी प्रगति

 

कई राज्यों में, पीने के पानी के लिए आधारभूत संरचना की उपलब्धता भी एक समस्या है, जो दिन-प्रतिदिन और बद्तर हो रही है।

 

राष्ट्रीय स्तर पर, पीने के पानी की सुविधा की उपलब्धता के साथ ग्रामीण स्कूलों के अनुपात वर्ष 2010 में 83.03 फीसदी से बढ़ कर वर्ष 2016 में 85.25 फीसदी हुए हैं। यानी छह साल की अवधि में दो प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है। इस्तेमाल करने योग्य पेयजल सुविधाओं में वृद्धि समान रूप से सीमांत रही है। वर्ष 2010 (72.74 फीसदी) और वर्ष 2016 (74.07 फीसदी) के बीच 1.33 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।

 

आंकड़े राज्य स्तर पर एक समान तस्वीर दिखाते हैं।

 

इस्तेमाल करने योग्य पेय जल की सुविधा के साथ स्कूलों के अनुपात में केरल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिक्किम, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय में वर्ष 2010 से वर्ष 2016 के बीच गिरावट आई है।

 

नागालैंड में कार्य कर रहे पेयजल सुविधाओं के साथ स्कूलों के अनुपात में 14 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज की गई है। ये आंकड़े वर्ष 2010 में 37 फीसदी से गिर कर वर्ष 2016 में 22.56 फीसदी हुए हैं।

 

वहीं  मध्य प्रदेश के लिए आंकड़े 78.51 फीसदी से 73 फीसदी और केरल के लिए 85.66 फीसदी से 80.5 फीसदी हुए हैं। उत्तर प्रदेश में 82.18 फीसदी से 82.02 फीसदी, कर्नाटक में 75.76 फीसदी से 75.25 फीसदी और पंजाब में 83 फीसदी से 81.67 फीसदी की गिरावट हुई है, जो अपेक्षाकृत कम है।

 

2010 और 2016 के बीच प्राथमिक विद्यालयों में पेयजल सुविधाएं उपलब्ध कराने में कम प्रगति

Source: Annual Status of Education Report

 

स्कूलों में जल सुविधाएं देने के लिए निर्देशित संसाधनों और नीति के साथ-साथ पीने के पानी की सुविधा में गिरावट से पता चलता है कि पुराने बुनियादी सुविधाओं के रखरखाव का नियमित मूल्यांकन महत्वपूर्ण है।

 

उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में, पेयजल की सुविधा वाले स्कूलों के अनुपात में ( काम कर रहे या बेकार ) वर्ष 2010 और वर्ष 2016 के बीच 81.3 से 85.49 फीसदी की वृद्धि हुई है।लेकिन पीने योग्य पानी के साथ स्कूलों के अनुपात में मामूली गिरावट दर्ज हुई है। ये आंकड़े वर्ष 2010 में 68.98 फीसदी थे जो 2016 में 67.1 फीसदी हुए हैं। दूसरे शब्दों में, बुनियादी ढांचे की खराब गुणवत्ता के कारण पीने के पानी के प्रावधानों की उपलब्धता में भी कम प्रगति हुई है।

 

2010 से 2016 के बीच प्राथमिक स्कूलों में पीने के पानी के लिए पहुंच में बदलाव

Source: Annual Status of Education Report

 

एएसईआर- 2016 के मुताबिक, भारत के किसी भी राज्य में 90 फीसदी  से अधिक स्कूलों में पीने योग्य पानी की सुविधा नहीं है। बिहार 89.48 फीसदी स्कूलों के साथ 90 फीसदी की सीमा रेखा के सबसे करीब है। इसके बाद छत्तीसगढ़ में 84.99 फीसदी स्कूलों में , हिमाचल प्रदेश में 84.70 फीसदी स्कूलों में, गुजरात में 84.58 फीसदी स्कूलों में, तमिलनाडु में 82.50 फीसदी स्कूलों में, उत्तर प्रदेश में 82.02 फीसदीस्कूलों में, पंजाब में 81.67 फीसदी स्कूलों में , झारखंड में 81.51 फीसदी स्कूलों में और केरल में 80.50 फीसदी स्कूलों में पीने योग्य पानी की सुविधा है।

 

वाले स्कूल में सबसे कम अनुपात वाले राज्यों में नागालैंड में मात्र 22.56 फीसदी स्कूलों में इस्तेमाल करने योग्य पानी की सुविधा है , मेघालय के 19.84 फीसदी स्कूलों में और मणिपुर के15.25 फीसदी स्कूलों में बच्चे पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।

 

(भट्टाचार्य एएसईआर केंद्र में जल और स्वच्छता गतिविधियों का नेतृत्व करते हैं। गंगवार हरियाणा के अशोक विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के स्नातक छात्र हैं और हाल ही में उन्होंने एएसईआर के साथ ट्रेनिंग ली है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 27 जुलाई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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