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7 में से 1 भारतीय दवा अवमानक

चारु बाहरी,

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सरकारी दावों की तुलना में अवमानक दवाईयां तीन गुना अधिक प्रचलित हैं। दो नए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है।

 

इन आंकड़ों का देश के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार लोगों की जेब पर कुल स्वास्थ्य व्यय का 58.2 फीसदी बाहरी बोझ होता है एवं स्वास्थ्य खर्चे में अकेले दवाईयां ही 70 से 77 फीसदी के लिए ज़िम्मेदार होती हैं।

 

अवमानक दवाएं कम प्रभावी ढंग से काम करती हैं जिससे बिमारी लंबे समय तक चलती है एवं जिससे इलाज के दौरान नए पर्चे की आवश्यकता हो सकती है। अवमानक दवाओं का योगदान जीवाणुरोधी प्रतिरोध में भी होता है, एक जोखिम ,जो भारत में पिछले पांच वर्षों में दोगुनी हुई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने पहले भी जानकारी दी है।

 

सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ), सरकारी नियामक प्राधिकारी द्वारा सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय बाज़ार में करीब 4.5 फीसदी दवाएं अवमानक हैं।

 

प्रतिष्ठित ब्रांड भी गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल

 

विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित रुप से लिखी जाने वाली अधिक धनदायक दवाओं की गुणवत्ता, मानकों के अनुरुप न होने का अधिक ज़ोखिम होता है, जैसा कि एप्लाइड औषधि विज्ञान के जर्नल द्वारा प्रकाशित इस नए अध्ययन में सामने आया है। इस अध्ययन में डिक्लोफेनाक सोडियम , एक लोकप्रिय दर्द निवारक दवा के 32 नमूनों का परीक्षण किया गया है। 2016 में, फार्मेसी और औषधि विज्ञान के इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित किए गए एक दूसरे अध्ययन में एमॉक्सिलिन ट्राइहाइड्रेट, एक एंटीबायोटिक के 46 नमूनों का मूल्यांकन किया गया है।

 

अहमद नवाज खान , अध्ययन के सह लेखक और सहायक प्रोफेसर, फार्मेसी विभाग, जेपी इंस्टट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलोजी, सोलन, कहते हैं कि, “हमने डिक्लोफेनाक सोडियम के लिए 15.62 फीसदी अवमानक दवाओं की व्यापकता एवं एमॉक्सिलिन ट्राइहाइड्रेट के लिए 13.04 फीसदी की व्यापकता पाया है।”

 

यहां तक की प्रतिष्ठित विक्रेताओं द्वारा उच्च कीमतों पर बेची जाने वाली दवाएं भी तय मानकों पर नहीं हैं। खान कहते हैं कि, “यह दुख की बात है कि कई उपभोक्ता प्रतिष्ठित ब्रांडों के उत्पादों को बेहतर मानते हुए उनकी ओर आकर्षित होते हैं।”

 

सैंपल अध्ययन में अवमानक दवाएं

 

 

सैंपल अध्ययन में अवमानक दवाओं का अनुपात

 

 

इंडियन फार्माकोपिया कमिशन, एक स्वायत्त संस्था भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार ग्रेड बनाने के लिए, एक गोली (टैबलेट) में 90 फीसदी से 110 फीसदी तक लेबल पर नामित सक्रिय संघटक शामिल होनी चाहिए। हालांकि, सीडीएससीओ निचली सीमा पर 5 फीसदी का अनुग्रह मार्जिन भी देती है। इस छूट को खान अनआवश्यक बताते हैं।

 

यदि गुणवत्ता के लिए अधिक कठोर इंडियन फार्माकोपिया विनिर्देश मानदण्ड बनाया गया होता तो  खान के अध्ययन के नमूनों की दोगुनी संख्या कम हो गई होती। इसका विष्कर्ष परिणाम है : खान कहते हैं, “सीमा रेखा गुणवत्ता, गुणवत्ता नियंत्रण की कमी का सुझाव देती है।”

 

यदि आप दवा की गुणवत्ता माप नहीं सकते तो आप इसे संभाल नहीं सकते

 

सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय बाजार में अवमानक और नकली दवाओं की घटनाओं में गिरावट हुई है –  मध्य 1990 में 9 फीसदी से हाल ही के वर्षों में 4.5 फीसदी पाई गई है जैसा कि औषधि विज्ञान के अध्ययन के इस 2015 इंडियन जर्नल में उद्धृत किया गया है।

 

सीडीएससीओ के अनुसार अकेले नकली दवाएं, (आमतौर पर) लोकप्रिय ब्रांडेड दवाओं की नकल जो अवमानक उत्पादों से अलग हैं एवं लेबल पर लिखे संघटक से मेल खाता हो या न खाता हो, उन सामाग्री के साथ भारतीय दवा बाजार का एक नगण्य हिस्सा बनाता है – नकली दवाओं के लिए देशव्यापी सर्वेक्षण की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार यह हिस्सा 0.046 फीसदी है एवं पिछले साल के नियमित नमूने के अनुसार यह हिस्सा 0.11 फीसदी है।

 

भारत में “एसएसएफसी” ढांचे की व्याख्या

 

Interpretation

Source: Indian Council for Research on International Economic Relations

 

इन आंकड़ों के आधार पर, सरकार ने मीडिया में भारत के लिए उच्च नकली दवाओं के आंकड़ों के लिए अपवाद ले लिया है, आंकड़ों की सूचना दी गई, बाद में वापस ले लिया गया।

 

    • 2003 की इकोनोमिक टाइम्स की यह रिपोर्ट कहती है कि, डब्लूएचओ के अनुसार दुनिया भर में नकली दवाओं की आपूर्ति के 35 फीसदी के लिए भारत ज़िम्मेदार है। बाद में डब्लूएचओ ने कहा कि यह गलत उद्धृत किया गया था, और यह कहा कि “भारतीय बाजार में नकली दवाओं की हद को मापने के लिए हमने किसी भी सर्वेक्षण कार्य शुरु नहीं किया है।”

 

    • 2014 फेक एंड काउन्टर्फिट ड्रग्स इन इंडिया – उद्योग मंडल एसोचैम द्वारा बूमिंग बिज़ रिपोर्ट  कहती है भारत में बिकने वाली दवाओं में 25 फीसदी नकली या अवमानक हैं, एसोचैम संचार के प्रतिनिधि ने अध्ययन पर तर्क देने से पहले “अनुमानों में कुछ त्रुटियों ” की बात इस संवाददाता से कही।

 

उद्योग डेटा की कमी से नमूने, दवा नियंत्रण में बाधा

 

पिछले साल देश भर में सीडीएससीओ ने 74199 नमूनों की जांच की है। 2012 की तुलना में नमूना आकार में 150 फीसदी वृद्धि है। हालांकि, फैलाव के अनुसार दुनिया के तीसरे सबसे बड़े दवा बाजार के लिए यह समुद्र में एक बूंद के बराबर है – 2015 की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति वर्ष 383 बिलियन दवाओं की खपत होती है  लेकिन उन गोलियों का उत्पादन करने वाली विनिर्माण इकाइयां का ब्यौरा वस्तुतः उपलब्ध नहीं हैं।

 

सीडीएससीओ नमूना अध्ययन के परिणाम

 

 

विनिर्माण, बिक्री और नकली / मिलावटी दवाओं के वितरण के लिए अभियोजन पक्ष

 

 

2015 की इस अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान के लिए भारतीय परिषद (आईसीआरआईईआर) की रिपोर्ट के अनुसार, “निर्माताओं या दी गई लाइसेंस की कुल संख्या की कोई समेकित राष्ट्रीय सूची नहीं है जोकि इस क्षेत्र के नियमन के लिए कोई ठोस राष्ट्रीय या राज्य की नीति तैयार करने के लिए कठिन बनाता है।”

 

बेजन मिश्रा , एक उपभोक्ता नीति विशेषज्ञ और सेफ मेडिसन इंडिया, उद्योग प्रहरी, के संस्थापक कहते हैं, “निर्माताओं , दी गई लाइसेंस और निरीक्षण के डीजिटल सूची के बिना सीडीएससीओ द्वारा वार्षिक नमूने भी सीमित और असंरचित है। उपभोक्ता न ही विशेष फार्मेसी के लिए लाइसेंसधारी के नाम पूछ सकते हैं और न ही यह पूछ सकते हैं कि केमिस्ट कब पंजीकृत किया गया था या पिछला निरीक्षण कब हुआ था।”

 

सीडीएससीओ के पास सुविधाजनक, डिजिटल सूचियां हैं जो मासिक दवा अलर्ट नमूनों की गणना करते हैं एवं परिक्षण करने में विफल रहते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन सूचियों को पढ़ता कौन है।

 

क्या होता है उन दवाओं के साथ जो गुणवत्ता मानकों के अनुरुप नहीं हैं?

 

दवा नमूनो के निर्माता जो सामग्री, विघटन, निष्फलता , विषाक्तता के सीडीएससीओ परीक्षण में असफल होते हैं उन्हें नोटिस भेजा जाता है।

 

संवाददाता ने छह निर्माताओं से बात की, उनमें से केवल एक निजी निर्माण इकाई, मध्य प्रदेश के अक्पाश फार्मास्यूटिकल्स, मेट्रोनिडोज़ोल को गोलियों की एक बैच के लिए दिसंबर 2015 में खींचा गया है जो विघटन परीक्षण में असफल रहा है, उन्होंने रिकॉर्ड पर बात करने के लिए सहमति दी है:

 

निदेशक गिरधारीलाल जडवानी कहते हैं, “हमने बाजार से पूरे बैच को वापस ले लिया है, कारणों की जांच की, गोली के लिए बाध्यकारी एजेंट की गुणवत्ता में समस्या पाया है और तब से सुधारात्मक कार्रवाई की है।”

 

अन्य निर्माताओं ने यह कहा है:

 

    • गलत विवरण एवं हमारे सिरप के दो बैचों की परख के लिए हमने प्राधिकरण के आंतरिक प्रयोगशाला की रिपोर्ट की आपूर्ति एवं ‘निष्पक्ष’ सरकार प्रयोगशाला से रिपोर्ट द्वारा नोटिस पर कार्यवाही की है।

 

    • ‘दोषपूर्ण मशीन संपीड़न सेटिंग’, वजन, विघटन और हमारे टैबलेट की परख की एकरूपता में कमी का कारण बनता है।

 

    • फैक्ट्री से टैबलेट निकलने के बाद उनका अनुचित भंडारण के कारण नमूनों के वजन की एकरूपता में कमी होती है।

 

    • हमारे उत्पादों के मानकों को सुनिश्चित करने के लिए निर्माण के दौरान हमने एक अतिरिक्त परीक्षण शुरू की है।

 

    • जैसे ही रिपोर्टर ने एक निर्माता को फोन करने का कारण बताया, उन्होंने फोन काट दिया।

 

भारत की सभी औषध परीक्षण की जरूरत को सात परीक्षण प्रयोगशालाओं द्वारा पूरा किया जाता है

 

पहले ही उल्लेख किया गया आईसीआरआईईआर रिपोर्ट के अनुसार, “विफलता के मामले में प्रक्रियाओं को सही करने के लिए या दोहराए उदाहरणों के गैर अनुपालन के मामले में निर्माता का उत्पाद लाइसेंस निलंबित कर दिया जाता है और अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में रद्द भी किया जा सकता है। हालांकि, यदि निर्माता की उत्पादन की कई लाइनें हैं जो उस मामले में उत्पादन लाइसेंस का अल्पकालिक निलंबन अधिक प्रभावी नहीं हो सकता है।”

 

कंपनी द्वारा नीतिज्ञानहीन इरादों से विनिर्माण के आंशिक निलंबन से भी उपभोक्ताओं को आराम पहुंचाया जा सकता है।

 

पिछली जुलाई में, पंजाब में मादक पदार्थ नियंत्रण अधिकारियों ने एक निर्माता और नकली हाईड्रॉक्सिप्रोजेसट्रोन कैपरोएट इंजेक्शन (जो अपरिपक्व प्रसव के जोखिम को कम करने के लिए दिया जाता है) के विक्रेता के परिसर पर छापा मारा था।

 

भाग सिंह, पंजाब के दवा नियंत्रक ने कहा, “हम हाईड्रॉक्सिप्रोजेसट्रोन कैपरोएट इंजेक्शन के प्रति डोज़ के लिए 10 से 12 रु देख कर आकर्षित हुए जो कि वास्तविक मूल्य का एक-पांचवा हिस्सा है। नकली निर्माता ने बिना किसी सक्रिय संघटक के साथ दवा का उत्पादन किया था और यहां तक कि कुछ मामलों में बिल के बिना केमिस्टों को बेचा है।”

 

“हमने हाईड्रॉक्सिप्रोजेसट्रोन कैपरोएट इंजेक्शन के निर्माण पर पाबंदी लगाई है लेकिन निर्माता द्वारा अन्य दवाओं का उत्पादन चल ही रहा है। हमने सबूत एवं कानून के तहत काम किया है।”

 

सजा के रुप में, जब से यह मामले सुर्खियों में रही हैं, छह महीनों में कुछ खास नहीं हुआ है।

 

सिंह, जिनका मानना है कि नकली निर्माताओं के खिलाफ सबूत

उत्पादन की मौजूदा व्यवस्था में जो कमियां हैं उन्हें दुरुस्त करने की ज़रुरत है, कहते हैं कि, “निर्माता ने केन्द्रीय औषध प्रयोगशाला कोलकाता में एक फिर से परीक्षण की बात कहते हुए नोटिस का जवाब दिया है, जिसमें अतिभार होने के कारण वक्त लगेगा।”

 

सात से अधिक राष्ट्रीय परीक्षण प्रयोगशालाएं, पूरे देश में प्रति वर्ष 15,000 नमूने प्रसंस्करण सक्षम नहीं हैं।

 

खान कहते हैं कि, “राज्य दवा नियामक अधिकारियों ने सबको लाइसेंस दे दिया है। लेकिन परीक्षण की विस्तार क्षमता द्वारा विनिर्माण इकाइयों की संख्या में वृद्धि एवं उत्पादों के बीच मेल नहीं है।”

 

सिंह का कहना है कि, “हमने इसमें शामिल सभी दवा की दुकानों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है; पुलिस जांच कर रही है, हालांकि जांच की गति धीमी है, इसका कारण शायद अधिक कार्य होना है।”

 

मामले लंबे समय तक चलने के साथ, दंड मिलना शायद ही तस्वीर में आता है।

 

मिश्रा का कहना है कि, “हमने इस मामले में कुछ ही सज़ाएं देखी हैं, इसलिए प्रभावी रूप से उद्योग के लिए कोई बाधा नहीं है। एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) शासन के दौरान, माशेलकर समिति ने, जिनमें मैं भी एक सदस्य था, मौत की सजा की सिफारिश की थी जिसे बाद में यूपीए शासन के दौरान आजीवन कारावास में बदल दिया गया था।”

 

उपभोक्ता के हाथों में कैसे दिया जाए परीक्षण

 

उपभोक्ताओं को एक तकनीक की आवश्यकता है जिसके ज़रिए वो दवाओं की गुणवत्ता का परिक्षण कर सकें। यह स्प्रॉक्सिल, फॉर्मासेक्योर, और एमपेडिग्री जैसी कंपनियों के समाधान के साथ संभव है।

 

उद्हारण के तौर पर, फऑर्मासेक्योर, दवा कंपनियों के लिए सत्यापन प्रौद्योगिकी की एक वैश्विक प्रदाता, दवाओं की एक पट्टी के लिए एक अनूठा अल्फान्यूमेरिक कोड उत्पन्न करता है जो सीधे सीधे पैकेज पर मुद्रित होता है या खरोंच बंद लेबल या होलोग्राफिक लेबल के माध्यम से पैकेजिंग लाइन पर चिपकाया जाता है। दवा खरीदने वाले उपभोक्ता – एसएमएस , मोबाइल एप्लिकेशन या ऑनलाइन के माध्यम से – पूछताछ कर सकते हैं कि कोड या दवाएं असली है या नहीं।

 

समित यादव, फॉर्मासेक्योर के संचालन उपाध्यक्ष कहते हैं, “आमतौर पर, हम एक कोड के लिए एक जांच की प्रक्रिया करते हैं। एक ही कोड के लिए दूसरी जांच संकेत मिलता है कि दवा की पट्टी दूसरे उपयोगकर्ता को पारित किया गया था, जो इसकी भी सच्चाई की जांच करना चाहता है, लेकिन एक ही कोड के लिए तीसरी या अधिक जांच निश्चित रुप से सवाल उठाएंगे।”

 

जिस दिन यह रिपोर्ट लिखी गई थी, फऑर्मासेक्योर घोटाले के उपार्जन की स्थिति ट्रैक कर रही थी। यादव कहते हैं, “पिछले कुछ हफ्तों से हमें एक दिन में, एक कोड सत्यापित के लिए 15 पूछताछ की मांग आ रही है एवं यह जांच की मांग भारत के हर कोने से आ रही है।”

 

उन बातचीत के विश्लेषण करने के बाद, फॉर्मासेक्योर आगे की मांग के लिए ब्रांड के मालिक को आंकड़े दे रही थी। यादव बताते हैं, “सबसे बद्तर स्थिति में, इस स्थिति का मतलब होगा कि नकली निर्माताओं ने लेबल के साथ नकली उत्पादन किया है – कोड सहित – जिससे दवा की एक वास्तविक पैकेट पर सवाल उठता है।”

 

भारत में कुछ कंपनियों स्वेच्छा से दवा – सत्यापन प्रौद्योगिकी का उपयोग करती है, हालांकि यह सस्ती और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है।

 

सरकार का रूख यह है कि सत्यापन प्रौद्योगिकी छोटी कंपनियों के लिए महंगा है। मिश्रा का मानना ​​है कि कम स्वीकरण यह दर्शाता है कि, “उत्पादों के संबंध में पारदर्शी होने की सामान्य अनइच्छा है, इसलिए सत्यापन प्रौद्योगिकी अनिवार्य किया जाना चाहिए।”

 

खान कहते हैं कि एक और तकनीक है जो अवमानक दवाओं को जड़ से उखाड़ फेंकने में मदद मिलेगी वह अवरक्त स्पेक्ट्रोस्कोपी है, एक तकनीक जो कुछ ही मिनटों में सैंकड़ो नमूनों को फिल्टर कर सकती है, पारंपरिक की तुलना में बहुत तेजी से काम करती है, महंगी उच्च प्रदर्शन क्रोमैटोग्राफी तकनीक है।

 

इससे स्पष्ट है कि भारत के नकली दवा समस्या को हल किया जा सकता है।

 

(बाहरी माउंट आबू, राजस्थान स्थित एक स्वतंत्र लेखक और संपादक है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 15 फरवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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