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732 मिलियन भारतीयों की शौचालय तक पहुंच नहीं है, उनके उपर बीमारी का खतरा : एक रिपोर्ट

प्राची सालवे,

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“जब मैं गर्भवती हुई, तो शौच के लिए मैदान तक जाना मुश्किल था, क्योंकि रास्ता सुरक्षित नहीं था। मेरी सास मेरे साथ चलती थी । मुझे नीचे बैठने और उठने में उनकी मदद की ज़रूरत थी।” – महेश्वरी (25), रायचूर,  भारत। भारत में शौचालय तक पहुंच न होने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है, करीब 732 मिलियन। महिलाओं और लड़कियों पर प्रभाव सबसे ज्यादा है।

 

आबादी के अनुसार दूसरे सबसे बड़े देश, भारत में ऐसे लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है, जिनके घर में शौचालय नहीं है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे लोगों की संख्या करीब 732 मिलियन है।

 

‘वॉटरएड’ की रिपोर्ट  ‘आउट ऑफ ऑर्डर: द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड टॉयलेट्स- 2017’ कहती है कि  355 मिलियन महिलाओं और लड़कियों की शौचालय तक पहुंच नहीं है। यदि वे एक पंक्ति में खड़े हों, तो कतार पृथ्वी के चार चक्कर तक लगा सकती है।

 

शौचालय तक पहुंच की कमी: शीर्ष 5 देश

Source: WaterAidNote: Data as of 2015

 

सरकार के स्वच्छ भारत (क्लीन इंडिया) मिशन द्वारा हुए बदलावों के बावजूद स्वच्छता सूचकांक पर भारत की निम्न रैंकिंग है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2014 में शुरू हुए इस अभियान ने देश में स्वच्छता कवरेज को 39 फीसदी से बढ़ा कर नवंबर 2017 तक 65 फीसदी किया है। इसी अवधि के दौरान, ग्रामीण भारत में 52 मिलियन घरेलू शौचालय बनाए गए थे।

 

इस स्वच्छता अभियान ने 40 फीसदी तक खुले में शौच करने वाले लोगों का अनुपात कम कर दिया है, जिसका मतलब है कि 100 मिलियन से अधिक लोग शौचालयों का उपयोग करते हैं, जैसा कि ‘वॉटरएड’ की रिपोर्ट कहती है।

 

खुले शौच को कम करने और बुनियादी स्वच्छता तक पहुंच में सुधार के लिए काम करने वाले उपरी दस देशों में से भारत छठे स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम बुनियादी स्वच्छता तक पहुंच के बिना जनसंख्या का प्रतिशत वर्ष 2000 में 78.3 फीसदी से गिरकर 2015 तक 56 फीसदी हुआ है।

 

दस्त बीमारियों से हर साल 60,700 भारतीय बच्चों की मौत

 

हर वर्ष, पांच साल से कम उम्र के 60,700 बच्चों की मौत दस्त जैसी बीमारियों से होती है, जैसा कि ‘वॉटरएड’ की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

पांच साल से कम उम्र के भारतीय बच्चों की मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण दस्त है। वर्ष 2015 में रोजाना 321 बच्चों की मौत का कारण दस्त रहा है, जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी तथ्य के आधार पर इंडियास्पेंड ने 29 जुलाई, 2017 की अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, खुले में शौच के माध्यम से फैलने वाला हुकवर्म, महिलाओं में दस्त, रक्ताल्पता और वजन घटाने का कारण बनता है।  ये समस्याएं जन्म के समय कम वजन और बच्चों के धीमे विकास से जुड़ा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16, (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चे स्टंड हैं।

 

स्वच्छता तक खराब पहुंच के साथ वाले भारतीय राज्यों में अतिसार रोगों की उच्च घटनाएं दर्ज की जाती हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में उच्चतम मृत्यु दर, उच्च स्टंटिंग दर और खराब स्वच्छता के कारण अतिसार के उच्च दर दर्ज किए गए हैं, जैसा कि एनएफएचएस -4 के आधार पर इंडियास्पेंड ने 26 अप्रैल, 2017 की अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

बेहतर स्वच्छता के लिए उच्च पहुंच वाले राज्यों में एनीमिया और दस्त का कम प्रचलन

Access To Improved Sanitation: Top 5 States
State Households with improved sanitation Prevalence of diarrhoea* Non-pregnant women who are anaemic** Pregnant women who are anaemic**
Kerala 98.10% 3.40% 34.60% 22.60%
Sikkim 88.20% 1.50% 35.20% 23.60%
Mizoram 83.50% 7.60% 24.60% 26.60%
Punjab 81.50% 6.60% 54% 42%
Haryana 79.20% 7.70% 63.15 55%
India 48.40% 9.20% 53.10% 50.30%

 

Access To Improved Sanitation: Bottom 5 States
State Households with improved sanitation Prevalence of diarrhoea* Non-pregnant women who are anaemic** Pregnant women who are anaemic**
Jharkhand 24.40% 6.90% 65.30% 62.60%
Bihar 25.20% 10.40% 60.40% 58.30%
Odisha 29.40% 9.80% 51.20% 47.60%
Chhattisgarh 32.70% 9.10% 47.30% 41.50%
Madhya Pradesh 33.70% 9.50% 52.40% 54.60%
India 48.40% 9.20% 53.10% 50.30%

Source: National Family Health Survey 2015-16*reported in two weeks preceding the survey **Among women aged 15-49 years

 

एनएफएचएस-4 के मुताबिक ऊपर दिए गए तालिकाओं में सुधार के साथ घरों के प्रतिशत के आधार पर शीर्ष पांच और नीचे के पांच राज्यों को दिखाया गया है। बेहतर स्वच्छता के उच्च प्रतिशत वाले राज्यों में महिलाओं (दोनों गर्भवती और गैर-गर्भवती) के बीच एनीमिया के निम्न स्तर हैं। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में दस्त के कम मामलों का भी पता चला है।

 

उदाहरण के लिए, 98.1 फीसदी तक उच्चतम प्रतिशत यानी बेहतर स्वच्छता वाले राज्य केरल में महिलाओं में दस्त और एनीमिया का प्रसार कम देखा गया है। केरल में महिलाओं में दस्त 3.4 फीसदी और एनीमिया 22.6 फीसदी देखा गया है।

 

केवल 25 फीसदी स्वच्छता वाले राज्य बिहार में दस्त का प्रसार 10.2 फीसदी है और एनेमिक गर्भवती महिलाओं का प्रतिशत 58.3 फीसदी है, जो बहुत ज्यादा है।

 

महिलाओं के लिए, निरक्षरता, उत्पीड़न का उच्च जोखिम

 

खराब स्वास्थ्य के अलावा, शौचालयों की कमी का मतलब है कि 1.1 बिलियन से अधिक महिलाओं और लड़कियों का विश्व स्तर पर सीमित शिक्षा प्राप्त करना और उत्पीड़न का सामना करना।

 

ग्रामीण भारत में पढ़ाई के बीच स्कूल छोड़ने वाले लड़कियों की उच्च दर और स्कूल में दाखिला न लेने की एक बड़ी वजह शौचालय की सुविधा का न होना है, जैसा कि जैसा कि इंडियास्पेंड ने 19 जुलाई, 2017 की अपनी रिपोर्ट में बताया है।

 

ग्रामीण भारत में, 23 फीसदी लड़कियों ने स्कूल छोड़ने के मुख्य कारण के रूप में मासिक धर्म को सूचीबद्ध किया है। उनमें से लगभग 28 फीसदी ने कहा कि वे इस अवधि के दौरान स्कूल नहीं जाती हैं, क्योंकि वहां स्वच्छता और सुरक्षा की कमी है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 19 जून 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

‘वाटरएड इंडिया’ में नीति निर्धारण के प्रमुख रमन वीआर इस मामले में कुछ सलाह देते हैं, “स्वच्छता नीतियों में उन लोगों की जरूरतों को शामिल करना चाहिए जो कमजोर हैं।

 

किशोर लड़कियां और महिलाएं ऐसी सुविधा चाहती हैं, जिसमें वे अपनी समयावधि को सुरक्षित ढंग से और स्वच्छता के साथ प्रबंधित कर सके। गर्भवती महिलाओं को आसानी से सुलभ और प्रयोग करने योग्य शौचालयों की आवश्यकता होती है, और विकलांग व्यक्तियों को डिज़ाइन की सुविधा के साथ शौचालयों की आवश्यकता होती है, जहां सुविधा हो। ऐसी दिक्कतों का सामना वे अक्सर करती हैं। “

 

(सालवे विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 16 नवंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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