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90 करोड़ भारतीय 2 कमरे या छोटे मकानों में रहते हैं

अभिषेक वाघमारे,

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देगल श्रीमंगर साओ, मुंबई में एक कार्यालय ब्लॉक में चाय बांटने का काम करता है। जबकि सात सदस्यों वाला इसका परिवार गांव में तीन कमरों के घर में रहता है लेकिन मुंबई में देगल ऑफिस के गलियारे में ही सोता है। भारतीय परिवारों का लगभग 75 फीसदी दो कमरे या छोटे घरों में रहते हैं; इनमें बेघर भी शामिल हैं।

 

पिछले 10 वर्षों से, 26 वर्षीय देगल श्रीमंगर साओ, सेंट्रल मुंबई वाणिज्यिक परिसर के गलियारे में सोता है, जहां वह व्यस्त कंपनियों के कर्मचारियों को हरेक दो घंटे पर चाय बेचा करता है।

 

विजय, मुंबई में देगल इसी नाम से कहलाना पसंद करता है, खारखट्टो गांव, जो 300 घरों और 1,765 लोगों वाला एक गांव है – मुंबई के करीब 1,800 किमी उत्तर पूर्व – झारखंड के हजारीबाग ज़िले का रहने वाला है। विजय के नौ सदस्यीय विस्तारित परिवार – विजय और उसके बड़े भाई पूरन, जो भी एक मुंबई कार्यालय गलियारे में रहता है उनके बिना सात सदस्य – तीन कमरों के घर में रहते हैं।

 

जून 2016 में सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, विजय की ही तरह, 90 करोड़ भारतीय या भारतीय परिवारों का 75 फीसदी – परिवार में औसतन 5 सदस्य के साथ – दो कमरे के या उससे छोटे मकान में रहते हैं।

 

दो कमरे या उससे छोटे घरों में रहने वाले 90 करोड़ भारतीयों में से 63 करोड़ या आधे से अधिक परिवार ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं एवं 26.2 करोड़ या 20 फीसदी लोग शहरी इलाकों में रहते हैं। भारत के अमीर राज्यों की तुलना में कुछ गरीब राज्यों में बड़े घरों के दिखाव एवं इसके विपरीत भी होने के साथ, आय और घरों के आकार के बीच संबंध प्रकट नहीं होता है।

 

10.6 करोड़ शहरी परिवार या सभी भारतीय परिवारों के 9 फीसदी से अधिक लोग तीन से अधिक कमरों वाले घरों में नहीं रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 18.5 करोड़ भारतीय या सभी भारतीय परिवारों का 15 फीसदी लोग तीन से अधिक कमरे वाले घरों में रहते हैं।

 

भारत की जनगणना के साथ कमरे के औसत आकार पर आंकड़े उपलब्ध नहीं है।

 

केरल में हैं भारत के सबसे बड़े घर

 

केरल के लोग – प्रति व्यक्ति आय के अनुसार भारत का 7वां सबसे अमीर राज्य – भारत के सबसे बड़े घरों में रहते हैं।

 

भारत की जनगणना का नमूना पंजीकरण प्रणाली के लिए 2014 आधारभूत सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, केरल में कम से कम 79 फीसदी ग्रामीण परिवार और 84 फीसदी शहरी आबादी तीन से अधिक कमरे वाले घरों में रहते हैं।

 

केरल, असम और जम्मू-कश्मीर में हैं बड़े भारतीय घर

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Source: Baseline Survey for Sample Registration Survey, Census of India

 

बड़े घरों के संबंध में केरल के बाद जम्मू-कश्मीर और असम का स्थान है – प्रति व्यक्ति आय के मामले में 21वां और 27वां स्थान – जम्मू में 66 फीसदी ग्रामीण परिवार एवं 60 फीसदी शहरी परिवार बड़े घरों में रहते हैं जबिक असम में 34 फीसदी ग्रामीण और 45 फीसदी शहरी परिवार बड़े घरों में रहते हैं।

 

23 बड़े राज्यों में केवल झारखंड, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ही ऐसे राज्य हैं जिसके लिए आंकड़े जारी किए गए हैं जहां ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में, आधे से अधिक परिवार दो कमरे के घरों में रहते हैं।

 

2 कमरे के घरों में रहने वाले परिवार, टॉप 3 राज्य

Source: Baseline Survey for Sample Registration Survey, Census of India

 

विजय अपने परिवार , पत्नी, बच्चों और माता-पिता से दूर रहता है और सालाना दो सप्ताह के लिए घर जाता है। सात सदस्यों का विजय का परिवार गांव में तीन कमरों के कच्चे मकान में रहता है, जिसे विजय नापसंद करता है।

 

विजय पूरी तरह दृढ़ नहीं वह मुंबई के घर से संतुष्ट है या अपने गांव के घर से। विजय कहता है, “पसंद का सवाल नहीं है साहब, करना पड़ता है।”

 

आधा ग्रामीण भारत कम गुणवत्ता वाले मकान में रहता है

Source: Baseline Survey for Sample Registration Survey, Census of India; figures in %

 

तमिलनाडु, बिहार और पश्चिम बंगाल में, जनसंख्या का 48 फीसदी, 44 फीसदी और 43 फीसदी, एक कमरे या बिना किसी कमरे में रहते हैं, जिसका मतलब हो सकता है कि वे बेघर हैं।

 

सबसे छोटे घरों वाले राज्य – ग्रामीण और शहरी

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Source: Baseline Survey for Sample Registration Survey, Census of India

 

पिछले वर्ष, अपने भाई पूरन, जो मुंबई में काम करता है, के साथ मिलकर अपने गांव में पक्का मकान बनाना शुरु किया था। मकान के दो कमरे पूरे हो चुके हैं।

 

पूर्वी आदिवासी राज्यों में हैं कम गुणवत्ता वाले ग्रामीण घरों

 

Source: Baseline Survey for Sample Registration Survey, Census of India; figures in %

 

कच्चे मकान की मरम्मत पूरी करने के लिए विजय को पैसे कमाने और अपने खर्चे सीमित करने की आवश्यकता है। विजय कहता है कि मुबंई में रहो तो हर महीने पैसे भेज सकते हैं और खर्च कम हो जाता है।

 

शहरी महाराष्ट्र में है सबसे छोटे घर

 

भारत के राज्यों में, महाराष्ट्र में शहरी आबादी की उच्चतम अनुपात है जो बेघर हैं यह जो एक कमरे  मकान में रहते हैं।

 

मलिन बस्तियों में सभी घरों के 53 फीसदी के साथ, महाराष्ट्र में “शहरी स्लम इकाइयों” (मलिन बस्तियों में रहने वाली आबादी का ब्लॉक) भी की अधिकतम अनुपात है।

 

शहरी आबादी का 43 फीसदी एक कमरे में रहने या बेघर होने के साथ महाराष्ट्र के बाद दूसरा स्थान तमिलनाडु का है; इसी संबंध में 38 फीसदी के आंकड़ों के साथ तीसरा स्थान पश्चिम बंगाल का है।

 

विजय उन लोगों में से एक है जो महाराष्ट्र के तंग शहरी परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं : अपनी कमाई को अधिकतम करने और अपने खर्च को कम करने के लिए व्यावसायिक इमारत के गलियारों में रहता है, जैसा कि भारत के 360 मिलियन पलायन करते हैं (1)। जून 2016 में, इंडियास्पेंड ने बताया कि किस प्रकार आर्थिक अनिवार्यता ने प्रवासियों को अपने पारंपरिक घरों से बाहर निकलने के लिए मजबूर किया है।

 

हालांकि, विजय के गांव पानी की कमी नहीं है और उसके पिता हर मानसून में खेत जोतते हैं और नियमित रुप से धान की फसल काटते हैं लेकिन यह परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए, विजय मुंबई में रहता है, गलियारे में सोता है और धीरे-धीरे परिवार के लिए घर बना रहा है।

 

विजय कहता है, “दो वर्षों में, पांच कमरों वाला मेरे पक्के का मकान तैयार हो जाएगा। पहली बार मेरे पिता अपने कमरे में सो पाएंगे।”

 

नमूना पंजीकरण प्रणाली
 

एक दशक की जनगणना के अलावा, जब इसने हर घर, पुरवा, गांव, कस्बे और शहर का दौरा किया, जनगणना, एक पूर्व निर्धारित नमूना जो बड़े पैमाने पर जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता, उसके साथ एक वार्षिक नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) भी बनाता है। 1964-1965 । एसआरएस, 1964-65 के बाद से आयोजित किया, घटनाक्रम के चल रहे एक रिकार्ड रखने के लिए मुख्य रूप से जन्म दर, मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर और प्रजनन दर रिकॉर्ड करता है।

 

इन सर्वेक्षणों के लिए इस्तेमाल किया नमूना हर दस साल में अद्यतन किया जाता है (इस अवधि में मामूली रुप से परिवर्तन हो सकते हैं), और अंतिम बार 2014 में अद्यतन किया गया था और जिसे आधारभूत सर्वेक्षण में कहा जाता है, जोकि चुने गए परिवारों को उनके जीवन के विवरण से संबंधित जानकारी मांगता है जैसे कि घर आकार और पानी और स्वच्छता की पहुंच।

 

2014 के आधारभूत सर्वेक्षण मेंग्रामीण क्षेत्रों में करीब 2,000 लोगों और शहरी क्षेत्रों में 600 से 800 लोगों के साथ 8861′ इकाइयों को नमूने में लिया गया है, (जिसका अर्थ है ” जनगणना बोक ” आम तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में एक गांव या एक मोहल्ला या शहरी क्षेत्रों के निकट के इलाके) और 1.7 मिलियन घरों और लगभग आठ मिलियन की आबादी को कवर किया गया है। (2))

 

नोट –

 

[1] पलायन पर 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, हर वर्ष विभिन्न कारणों से भारत की करीब 30 फीसदी आबादी पलायन करते हैं। हम 2011 के लिए उसी अनुपात पर विचार किया है, जैसा कि ताजा पलायन पर ताजा आंकड़े जारी नहीं किया गया है।

 

[2] रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के कार्यालय के साथ एक ईमेल संचार से।

 

(वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 5 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित किया गया है।

 

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