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99.38 फीसदी भारतीयों पर लागू है गौ संरक्षण कानून

एलिसन सलदनहा,

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भारत के पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र के अंगनगांव के गौशाला में गायों को चारा खिलाती एक महिला। यह गौशाला हिंदू राष्ट्रवादी समूह विश्व हिंदू परिषद की एक शाखा भारतीय गौ रक्षा परिषद द्वारा चलाया जा रहा है। यह तस्वीर 20 फरवरी 2015 की है।

 

31 मार्च, 2017 को गुजरात राज्य विधानसभा ने राज्य में गाय संरक्षण कानूनों में संशोधन किया है। नए कानून के तहत गौ हत्या की सजा सात साल के करावास से बढ़ा कर आजीवन कारावास और 5 लाख रुपए तक जुर्माने में बदल दिया गया है। यह संशोधन 1954 के गुजरात पशु संरक्षण कानून के तहत किए गए हैं, जिसके अनुसार गौ हत्या या हत्या के लिया गायों को एक जगह से दूसरे जगह ले जाना और गौमांस रखना गैर जमानती अपराध है।

 

इन संशोधनों के बाद गायों और बैलों जैसे पशुधन की रक्षा के लिए देश के सख्त कानूनों के साथ गुजरात गौ संरक्षण के मामले में सबसे ऊपर है।

 

देश भर में गाय संरक्षण कानूनों के विश्लेषण में इंडियास्पेंड ने पाया कि:

 

  • मार्च 2017 तक भारत के 84 फीसदी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटीएस) में गौ हत्या पर प्रतिबंध लग गया गया है। इन इलाकों में देश की लगभग 99.38 फीसदी आबादी रहती है।
  • गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाए गए लगभग आधे राज्यों में कानून करीब 50 वर्ष पुराने हैं, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान अधिनियमित हुए हैं। जम्मू-कश्मीर और मणिपुर दो ऐसे राज्य हैं जहां गौ हत्या पर प्रतिबंध काफी पहले से है। दोनों राज्यों में भारत की आजादी से पहले 1932 और 1936 में तात्कालीन शासकों ने  गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया था।
  • 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद, 80 फीसदी से अधिक राज्यों में गौ हत्य पर प्रतिबंध का कानून जनता पार्टी या भारतीय जनता पार्टी की सरकार के तहत हुआ है।  पिछले 23 सालों में 11 में से 10 राज्यों में विशेष रुप से लागू किए गए गाय संरक्षण कानून अधिक सख्त हैं।
  • गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाए गए 77 फीसदी या  24 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में, यह अपराध संज्ञेय है, और इनमें से आधे से अधिक (13) राज्यों में यह गैर जमानती है। भारत के आपराधिक प्रक्रिया कोड के तहत, संज्ञेय अपराध गंभीर अपराध माने जाते हैं। जैसे कि हत्या, बलात्कार, दहेज से जुड़ी मौतें और अपहरण। ऐसे मामलों में  पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है और मैजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना भी जांच शुरू की जा सकती है।

राज्य अनुसार गाय संरक्षण कानून

Source: IndiaSpend analysis of laws enacted by states & union territories.

 

भारत में गाय संरक्षण कानून

 

भारतीय राजनीति में गाय संरक्षण का लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता के पूर्व आर्य समाज जैसे बड़े संगठनों से इसे भारी समर्थन प्राप्त हुआ था।

 

1950-1968: आजादी के बाद वर्ष 1950 में भारत के गणराज्य बनने के बाद गौ संरक्षण पर जोर था। लेकिन गौ हत्या प्रतिबंध को केवल राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया था न कि बुनियादी अधिकार के रूप में , जैसा कि इसके समर्थकों ने मांग थी। फिर भी, कांग्रेस सरकारों ने 1969 तक कांग्रेस पार्टी के विभाजन के ठीक पहले, 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गौ हत्या प्रतिबंध कानूनों को लागू किया था। कानून तोड़ने वालों के लिए छह महीने से लेकर दो साल तक के कारावास का प्रावधान था। तीन साल के कारावास और 5,000 रुपए के जुर्माने के साथ मध्य प्रदेश में जम्मू-कश्मीर के बाद सबसे सख्त कानून था।

 

1977-1979: आठ साल के अंतराल के बाद, गाय संरक्षण कानूनों में बदलाव तब हुआ जब 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई। उस समय जनता पार्टी में भारतीय जनसंघ (आज की भाजपा) भी शरीक थी।

 

गोवा और दमन और दीव के केंद्र शासित प्रदेशों और हिमाचल प्रदेश में जनता पार्टी सरकार ने कानून लागू किए, जबकि आंध्र प्रदेश में यह काम कांग्रेस पार्टी ने किया था। महाराष्ट्र में भी बॉम्बे पशु संरक्षण अधिनियम 1954 को लागू करते हुए, कांग्रेस सरकार ने गाय संरक्षण कानून को मजबूत किया था।

 

1994 से अब तक : 1990 के दशक के शुरू में देश भर में सांप्रदायिक संघर्ष में वृद्धि को देखते हुए दिल्ली कृषि पशु संरक्षण अधिनियम को फिर से लागू करने की घोषणा की गई। कानून में गौ हत्या पर पांच साल तक की जेल और 10,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान था। इसे एक दंडनीय अपराध के रूप में देखा गया।

 

यह जम्मू-कश्मीर के बाद सबसे सख्त कानून था। तब से गाय संरक्षण कानून लागू है और इसमें 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संशोधन किया गया है। सिक्किम को छोड़कर इनमें से 10 राज्यों में सख्त दंड देने की सिफारिश की गई है । कानून में संशोधन के समय इन राज्यों में से 9 में भाजपा की सरकार थी।

 

12 राज्यों में गौ हत्या पर 2 से 14 साल तक की जेल

 

गुजरात में हालिया संशोधन से पहले जम्मू-कश्मीर जैसे मुस्लिम-प्रभुत्व वाले राज्य में गौ हत्या के खिलाफ सबसे सख्त कानून मौजूद था। कानून 1932 में रणबीर दंड संहिता के तहत लागू किया गया था, जो डोगरा शासक रणबीर सिंह के शासनकाल के दौरान तैयार किया गया था। यह कानून अब भी जम्मू-कश्मीर में लागू है।

 

कानून के तहत गौ हत्या एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है। कानून तोड़ने के जुर्म में 10 साल तक की जेल और पशु की कीमत से पांच गुना तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। जम्मू-कश्मीर में गाय की कीमत कई लाख तक हो सकती है।

 

इस अपराध की गंभीरता के मामले में हरियाणा तीसरे स्थान पर है। वर्ष 2015 में अधिनियमित हरियाणा गौवन्श संरक्षण और गौसंवर्धन अधिनियम ने गौ की हत्या को एक संज्ञेय और गैर जमानती अपराध के रुप में परिभाषित किया गया है। अपराध का अधिकतम दंड दस साल तक की जेल और एक लाख रुपए तक के जुर्माने के रुप में हो सकता है।

 

झारखंड गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम 2005 में 10 साल की सजा और 10 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। उत्तराखंड में भी गौ हत्या पर 10 वर्ष की कारावास की अधिकतम सजा तय है।

 

इसके विपरीत, केरल और सिक्किम में गौ हत्या पर प्रतिबंध सबसे नरम है। केरल में  केरल पंचायत (वध घर और मांस स्टालों) नियम, 1964 और शहरी इलाकों में 1976 के सरकारी आदेश के अनुसार ग्रामीण इलाकों में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया गया है, लेकिन यदि पशु  की आयु 10 वर्ष है तो इसकी अनुमति दी जाती है। अपराधियों पर 1,000 रुपए का जुर्माना है। इसी तरह 2008 सिक्किम पुलिस अधिनियम केवल सार्वजनिक स्थानों पर ही गाय हत्या पर प्रतिबंध की अनुमति देता है। यहां केवल विनाशकारी वध के लिए मौद्रिक दंड का प्रावधान है।

 

‘सेंट्रल डिपार्टमेंट ऑफ एनिमल हज्बन्ड्री, डेरीइंग एंड फिशरीज’ (डीएएचडी) के इस दस्तावेज के अनुसार चार राज्यों -अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड और लक्षद्वीप के संघ शासित क्षेत्र में गौ हत्या से संबंधित कानून नहीं है।

 

दस्तावेज के अनुसार डीएएचडी को पूरे देश में गौ हत्या पर रोक लगाने और गाय को भारत के राष्ट्रीय पशु के रूप में घोषित करने के लिए भारी संख्या में आवेदन मिलते रहे हैं।

 

जबकि अंडमान निकोबार द्वीपसमूह, दादर एवं नगर हवेली और त्रिपुरा में गाय वध पर प्रतिबंध लगाया गया है, जैसा कि डीएएचडी दस्तावेज में बताया गया है। हालांकि  वहां इस कानून के बारे में सार्वजनिक रूप से सीमित जानकारी उपलब्ध है।

 

मणिपुर में गौ हत्या के खिलाफ कानून महाराज चुराचंद सिंह के शासनकाल के दौरान 1936 में घोषित दरबार संकल्प पर आधारित है। हालांकि इस कानून की रूपरेखा अस्पष्ट है।

 

(सलदनहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 अप्रैल 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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