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महिलाओं के लिए रोजगार: क्या भारत सोमालिया से भी बदतर है

प्राची साल्वे और सौम्या तिवारी,

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जैसे जैसे महिला दिवस निकट आ रहा  है  और भारतीय महिलाओं पर हर तरफ विभिन्न चर्चायें हो रही हैं -जैसे कि उसकी भूमिका, शिक्षा, स्वतंत्रता, जिम्मेदारियों और काम की सम्भावनाएँ -एक बात स्पष्ट है: भारत के कार्यबल में महिलाओं की प्रतिशत घट रही है।

 

भारत में महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी ब्रिक्स देशों के बीच सबसे कम है। जबकि बहरीन, मलेशिया और यहां तक ​​कि सोमालिया (37%) जैसे देशों में यह यह ज्यादा बेहतर है।

 

2011 में महिलाओं की  कुल कार्यबल भागीदारी दर (डब्ल्यूपीआर) 25.5% थी, जिसमें ग्रामीण भारत में महिलाओं  की (डब्ल्यूपीआर) कार्यबल भागीदारी दर  30% और शहरी भारत में 15.4% थी।  इसके विपरीत, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पुरुषों के लिए (डब्ल्यूपीआर) कार्यबल भागीदारी दर   क्रमश: 53% और 53.8% थी ।

 

अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री कार्यबल में महिलाओं की कम और  जैसा कि  हम पाएंगे  निरंतर गिरती दर के लिए ,आगे की शिक्षा छोड़ देना, बच्चों का लालन पालन और पारिवारिक दबाव सहित कई कारणों का हवाला देते हैं।

 

अर्थशास्त्री विनोज इब्राहीम ने अपने दो अध्ययनों में यह निष्कर्ष निकाला  है कि  जो बाकि बची हैं उनमें से अधिकांश के पास अन्य कोई विकल्प नहीं है।

 

अब्राहम आर्थिक और राजनीतिक साप्ताहिक में लिखते हैं ” जो महिलाएँ  इस श्रम  बाज़ार में आती हैं और अक्सर  प्रभावहीन अनौपचारिक प्रदत्त श्रमिक के रूप में कार्य करती  हैं वे अक्सर कमज़ोर परिवारों की महिलाएँ होती  हैं  जिसके कारण देश के इस अनिश्चित श्रम बाजार का स्त्रीकरण हो रहा है।

 

डाटा इस शोध की पुष्टि करता है ।

 

ग्रामीण और शहरी भारत में महिलाओं की कार्यबल भागीदारी दर

 

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Source: National Sample Survey Organisation (68th Round 2011-12)

 

ग्रामीण कार्यबल में महिलाओं की  प्रतिशत और वास्तविक संख्या 11 वर्षों में , वर्ष 1999-2000 से 2011-12 के बीच ,  2004-05 में 36% की  एक संक्षिप्त वृद्धि के साथ, 35% से 30 % तक गिर गई। वास्तविक संख्या में 106 मिलियन से 104 मिलियन तक गिरावट आ गई।

 

इन 11 वर्षों में, शहरी कार्यबल में महिलाओं का प्रतिशत समान ही रहा : 20%, हालाँकि वास्तविक संख्या में 19 मिलियन से -29 मिलियन तक बढ़ गई।

 

अर्थशास्त्री विनोज अब्राहम के अध्ययन के अनुसार यह वृद्धि, विशेष रूप से शहरी भारत में 1999-2000 और 2004-05 के बीच तीव्र आर्थिक वृद्धि होने  के कारण हुई,  जब विकास दर, प्रति वर्ष 6.9% पर थी।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रमिक अधिकतर (80%)  कृषि के क्षेत्र में काम करते हैं। विनिर्माण बहुत कम लेकिन  7.5% पर दूसरी पसंद है उसके बाद निर्माण (5.2%) और फिर सेवाएं (7%) हैं ।

 

शहरी महिलाओं का सबसे बड़ा नियुक्तिकर्ता , 39% पर,”अन्य सेवाओं” का क्षेत्र है जिसमे घरेलू कार्य भी शामिल है उसके उपरांत 27% के साथ विनिर्माण है।

 

भारत में  काफी हद तक  महिला श्रमिक असंगठित श्रम के रूप में शामिल हैं , और इस असंगठित अनौपचारिक क्षेत्र में कम वेतन पाने वाले निर्वाह श्रमिकों के रूप में कृषि के क्षेत्र में, जो की वैसे भी आर्थिक झटकों के प्रति अतिसंवेदनशील बाज़ार है , ये एक विशाल संख्या में  शामिल  हैं ।

 

दशक की दूसरी छमाही में महिला रोजगार में आई  गिरावट, कृषि क्षेत्र, असंगठित क्षेत्र और स्वरोजगार क्षेत्र  में उनकी गिरती  संख्या का एक प्रतिबिंब है।

 

विभिन्न क्षेत्रों में कर्मचारियों की संख्या में महिलाओं का प्रतिशत (%)

 

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Source: Confederation of Indian Industry

 

शहरी भारत में ज्यादातर उद्योगों में  महिलाएँ अल्पसंख्या में हैं, यहां तक की सेवा क्षेत्र में भी जहां वे अधिक भूमिकाओं में दिखाई देती हैं।

 

कोर इंजीनियरिंग और ऑटोमोबाइल क्षेत्रों में महिला श्रमिकों की सबसे कम भागीदारी रही है  क्रमश: 16% और 18% को ही रोजगार मिला है।

 

महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा फार्मास्यूटिकल्स और स्वास्थ्य सेवा में हैं: 42.4%। इस स्थिति से मुख्य रूप से यह तथ्य प्रकाश में आता है कि शहरी क्षेत्रों में काम कर रही अधिकांश महिलाएँ कौशलता प्राप्त श्रमिक नहीं हैं ।

 

 गरीब, हताश और रूढ़िबद्ध

 

एक तिहाई शहरी महिला श्रमिक निरक्षर हैं जबकि तुलना की जाए तो यह संख्या पुरूषों के लिए 11% है।

 

शहरी क्षेत्रों में महिलाऐं  मुख्य रूप से  लोक प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, घरेलू श्रमिकों जैसी सेवाओं में कार्यरत हैं उसके उपरांत व्यापार और विनिर्माण के क्षेत्र आते हैं ।

 

लिंग आधारित असमानता तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण में देखने को मिलती हैं जहाँ   लड़कियों का नामांकन माध्यमिक स्तर पर सिर्फ 7% है वह भी कुछ रूढ़िवादी  पाठ्यक्रमों तक केंद्रित है जैसे नर्सिंग और सिलाई।

 

शहरी क्षेत्रों में,  2.9% महिलाएँ तकनीकी रूप से शिक्षित हैं जिसकी तुलना में यह संख्या पुरुषों के लिए सिर्फ 7% है।

 

उच्च शिक्षा के लिए  विभिन्न कार्यक्रमों में नामांकन, 2012-13 (%)

 

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Source: AISHE Portal

 

ऊपर दी गई तालिका इंगित करती है कि 73% महिलाओं ने स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया, जबकि 27% ने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। पुरुषों की तुलना में कम संख्या में महिलाओं ने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया है।

 

स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में, 14.7%, अन्य पाठ्यक्रमों (पीएचडी, एमफिल, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स) में नामांकित हैं।

 

इंडिया स्पेंड के पहले विश्लेषण में, हमने पाया था कि  कई राज्यों में यहाँ तक कि  केरल और गुजरात जैसे अमीर राज्यों में भी  महिलाएँ  उच्च शिक्षा कार्यक्रमों को छोड़ रहीं थी ।

 

इस प्रवृत्ति से  एप्लाइड मैनपावर और अनुसंधान संस्थान (आईएएमआर) द्वारा किए गए अध्ययन जो कहते हैं कि तकनीकी शिक्षा में भागीदारी की कमी और उच्च शिक्षा से उच्च ड्रॉप आउट दर ,कार्यबल में  महिला की भागीदारी को प्रभावित ककरती है वे सही साबित होते हैं।

 

प्रजनन भूमिका, घर के कार्य और  देखभाल की ज़िम्मेदारी, सांस्कृतिक प्रतिबंध और पितृसत्तात्मक पदानुक्रम एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। शिक्षा चालू न रख पाना और शादी के बाद स्थानान्तरण भी श्रम बल से महिलाओं की वापसी का कारण हैं।

 

आईएएमआर का  एक अध्ययन कहता है कि  “महिला रोजगार में तेज गिरावट ने लैंगिक समानता, महिलाओं के सशक्तिकरण, और महिलाओं की आजीविका की कार्यनीति के संगर्भ में नीति निर्माताओं में   चिंता पैदा की है,” । “महिलाओं का रोजगार उनके आर्थिक सशक्तिकरण और समाज में उनकी समग्र स्थिति का  एक महत्वपूर्ण कारक है।”

 

(प्राची साल्वे और सौम्या तिवारी इंडिया स्पेंड के साथ  नीति विश्लेषकों के रूप में कार्यरत हैं)

 

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