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चुनाव 2017: बिगड़ने लगा है गोवा के लोगों का स्वास्थ्य

रिया कोलासो,

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गोवा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के रजिस्ट्रेशन काउंटर के बाहर मरीजों की कतार। पिछले एक दशक से गोवा में एनीमिक महिलाओं और कमजोर बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है। कुछ शहरी इलाकों में तो लिंग अनुपात देश के बाकी राज्यों की तुलना में यहां सबसे खराब है।

 

आकार के अनुसार गोवा देश का सबसे छोटा और आबादी अनुसार चौथा सबसे कम आबादी वाला राज्य है। जब यहां के लगभग 15 लाख लोगों के स्वास्थ्य की बात आती है तो, गोवा की स्थिति ज्यादातर भारतीय राज्यों की तुलना में बेहतर है और चुनावी जंग के लिए तैयार पांच राज्यों में सबसे बेहतर है। यह जानकारी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा किए गए एक विश्लेषण में सामने आई है।

 

आर्थिक प्रगति के लिए स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण कारक है। इसलिए चुनाव के मद्देनजर यह छह भागों वाली श्रृंखला का चौथा लेख है। जिसमें हम उत्तर प्रदेश, मणिपुर, गोवा, पंजाब और उत्तराखंड में स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति पर चर्चा करने के लिए नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों पर बात कर रहे हैं।

 

गोवा की कुछ खास विशेषताएं इस प्रकार हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार यह देश का पांचवा सबसे साक्षर राज्य है। यहां 93 फीसदी पुरुष, 82 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 (एनएफएचएस-4) के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 94 फीसदी महिलाएं घरेलू फैसलों में भाग लेती हैं। बच्चों पर वर्ष 2013-14 के रैपिड सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, 99.5 फीसदी जन्म अस्पताल में होते हैं। इस संबंध में राषट्रीय औसत 79 फीसदी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय, राष्ट्रीय औसत की तुलना में चार गुना है। चिकित्सा सुविधाएं बेहतर हैं और हेल्थ प्रोफेशनल्स की कमी नहीं है। लिंग अनुपात अच्छा है और लगातार बेहतरी की ओर है। राज्य का शिशु मृत्यु दर भारत में सबसे बेहतर है। सउदी अरब के बराबर और ब्राजील से बेहतर ।

 

इसके बावजूद जब हमने इन आंकड़ों की नए सिरे से व्याख्या की तो इस समृद्ध राज्य के माथे पर चिंता की कई लकीरें मिलीं-

 

  • भारत में सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली इसी राज्य में है। इसके बावजूद  गोवा के लोग निजी स्वास्थ्य सेवा का इस्तेमाल करते हैं और भुगतान के लिए घरेलू बचत या उधार के पैसे का इस्तेमाल कर रहे हैं।
  • ग्रामीण गोवा के बड़े हिस्से में भारत का सर्वश्रेष्ठ लिंग अनुपात है, लेकिन कुछ शहरी क्षेत्रों का लिंग अनुपात अब भी देश के बद्तर लिंग अनुपात वाले क्षेत्रों की तरह ही है।
  • गोवा में जन्म लिए बच्चों की जीवित रहने की संभावना बेहतर होती है, लेकिन वेस्टिंग (कद की तुलना में कम वजन) बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है। साथ ही महिलाओं में खून की कमी या एनीमिक होने की संख्या में भी वृद्धि हुई है।
  • मोटापे की समस्या बढ़ रही है और इसके साथ ही जीवन शैली से जुड़ी बिमारियों में भी वृद्धि हो रही है।

एक बार फिर नए सिरे से हम इन मुद्दों की गहराई में गए तो हमें कुछ जवाब भी मिले-

 

सरकार और नागरिक दोनों खर्च कर रहे हैं पैसे

 

गोवा में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय प्रति व्यक्ति 2,439 रुपए है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार यह आंकड़े राष्ट्रीय औसत का चार गुना, उत्तर प्रदेश का पांच गुना और उत्तराखंड का दोगुना है।

 

यहां तक कि ग्रामीण गोवा में, अस्पताल में प्रति भर्ती होने वाले रोगियों का औसत चिकित्सा व्यय भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटीएस) से दोगुना है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 के अनुसार, गोवा में सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और उप स्वास्थ्य केन्द्रों ( एसएचसी) में नर्सिंग स्टाफ की कमी नहीं है। ऐसे में गोवा में उच्च औसत चिकित्सा व्यय के लिए एक स्पष्टीकरण की जरुरत है।

 

गोवा में स्वास्थ्य व्यय

Source: National Sample Survey, 71st Round; Ministry of Health and Family Welfare, 2016

 

सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बुनियादी ढांचे भारत में सबसे बेहतर, लेकिन पर्याप्त विशेषज्ञ नहीं

 

चूंकि स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च काफी अधिक है, गोवा में पीएचसी और सीएचसी पर चिकित्सा प्रणाली और तकनीक ज्यादातर राज्यों की तुलना में बेहतर प्रतीत होता है। सर्वेक्षण किए गए गोवा के 94 फीसदी गांवों के 3 किमी के अंदर एक एसएचसी था और 82 फीसदी गांवों में 10 किमी के भीतर एक पीएचसी था।

 

इन केन्द्रों पर नर्सिंग स्टाफ की अधिक संख्या के साथ किसी पीएचसी में डॉक्टर, लैब तकनीशियन या फार्मासिस्ट की कमी नहीं थी। यह जनकारी ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2016 में सामने आई है।

 

हालांकि, वहां सीएचसी में विशेषज्ञों, जैसे कि सर्जन, प्रसूति, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, बाल रोग चिकित्सकों की कमी पाई गई है। शायद यही कारण है कि ज्यादा पैसे खर्च होने के बावजूद गोवा के लोग निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर जा रहे हैं।

 

अपने बचत के पैसे या उधार के लेकर लोग जा रहे हैं निजी स्वस्थ्य सुविधाओं की ओर

 

मोटे तौर पर शहरी और ग्रामीण गोवा में अस्पताल में भर्ती होने वाले रोगियों में क्रमश: 45 फीसदी और 60 फीसदी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का उपयोग करते हैं और यह आम तौर पर मुफ्त है। हालांकि, काफी हद तक घरेलू बचत या ऋण के साथ के लिए भुगतान किए जाने वाले निजी स्वास्थ्य देखभाल से निजी स्वास्थ्य खर्च को बढ़ावा मिलता है।

 

वर्ष 2016 में जारी किए गए एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार, गोवा में 16 फीसदी परिवार ऐसे हैं, जिनके कम से कम एक सदस्य का स्वास्थ्य बीमा द्वारा कवर है। हम बता दें कि गोवा में दो जिलों के बीच बीमा कवरेज में लगभग 14 प्रतिशत अंक का अंतर है।

 

गोवा में प्रति बीमार व्यक्ति के इलाज के लिए औसत खर्च ग्रामीण और शहरी दोनों भारत के लिए औसत 50 रुपए के आसपास ही है। हालांकि, ग्रामीण गोवा में प्रति गंभीर रुप से बीमार व्यक्ति के इलाज के लिए औसत कुल चिकित्सा व्यय (टीएमई) सार्वजनिक अस्पताल में औसत खर्च का 17 गुना है। शहरी गोवा में यह चार गुना है।

 

इससे साफ पता चलता है कि गोवा के लोग निजी अस्पतालों को अच्छा-खासा भुगतान करता है।

और निजी स्वास्थ्य के लिए आकर्षण किसी बच्चे के जन्म के समय से ही शुरु हो जाता है।

 

किसी बच्चे के जन्म में अधिक खर्च की वजह सीजेरियन प्रसव

 

ग्रामीण गोवा में बच्चे के जन्म एवं देखभाल के लिए औसत कुल चिकित्सा व्यय 16,351 रुपए है। यह आंकड़े ग्रामीण भारत के औसत से करीब तीन गुना हैं। शहरी गोवा के लिए यह आंकड़ा 19,477 रुपए है।

 

बच्चे के जन्म पर औसत कुल चिकित्स व्यय

Source: National Sample Survey, 71st Round

 

सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के व्यय अनुसार, प्रसव देखभाल पर होने वाले खर्च से यह स्पष्ट होता है कि प्रसव पर उच्च व्यय इसलिए होता है क्योंकि गोवा के लोग निजी स्वास्थ्य देखभाल का अक्सर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन फिर भी एक निजी अस्पताल में प्रसव इतना महंगा क्यों है?इसका जवाब दो शब्द का है-सीजेरियन सेक्शन।

 

नवीनतम उपलब्ध एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में, गोवा में सीजेरियन जन्मों में 22 फीसदी की वृद्धि हुई है। निजी क्षेत्र में करीब 40 फीसदी संस्थागत जन्म होते हैं लेकिन उन 40 फीसदी में से करीब आधे सीजेरियन होते हैं। हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र में सीजेरियन प्रसव कम होते हैं, करीब 19 फीसदी। फिर भी यह आंकड़े इस तरह के प्रसव के आदर्श दर से ज्यादा हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आदर्श दर 10 से 15 फीसदी है।

 

शहरी उत्तरी गोवा में, निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य संस्थानों में कुल 62 फीसदी जन्म सीजेरियन प्रसव के माध्यम से हुए हैं। जबकि शहरी दक्षिण गोवा के लिए यह आंकड़ा 54 फीसदी हैं।

 

गोवा में सीजेरियन प्रसव के माध्यम से होने वाले जन्म

Source: National Family Health Survey, 2015-16

 

इस तरह के प्रसव में ऐनस्थीश़, एक ऑपरेशन थियेटर, एक सर्जन की जरुरत होती है और साथ ही लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है। इससे लागत में वृद्धि होती है। दूसरे शब्दों में, कुछ अध्ययन संकेत देते हैं कि कई बारजरूरत न भी होने पर सीजेरिन प्रसव रहे हो हैं।

 

गोवा में लिंग अनुपात विसंगति, कम उम्र में विवाह और कमजोर बच्चे

 

ग्रामीण और शहरी गोवा में, एनएफएचएस 2005 में 851 और 1,048 के अनुमान से पिछले पांच वर्षों में, जन्म लिए बच्चों के लिए जन्म के समय लिंगानुपात ( प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या ) में सुधार हुआ है। हालांकि, 2015 में ग्रामीण दक्षिण गोवा का लिंग अनुपात भारत में सबसे बेहतर रहा है। ये आंकड़े प्रति 1,000 लड़कों पर 1,409 लड़कियों का रहा है। जबकि शहरी दक्षिण गोवा का लिंग अनुपात 792 था। यह देश के बद्तर लिंग अनुपात में से है। ये आंकड़े वर्ष 2005 में शहरी उत्तर प्रदेश के लिंग अनुपात से भी बद्तर हैं।

 

एनएफएचएस 4 के आंकड़ों के अनुसार गोवा में शिशु मृत्यु अनुपात में सुधार हुआ है। ये आंकड़े प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 13 शिशु मृत्यु का रहा है जो सऊदी अरब के आंकड़ों के बराबर है। लेकिन पोषण पर बात करें तो फिर बच्चों के खराब स्वास्थ्य की बात आ जाती है।

 

पांच वर्ष की आयु के बच्चों में स्टंड (उम्र की तुलना में कम कद) बच्चों के अनुपात में गिरावट हुई है। वर्ष 2005 में ये आंकड़े 26 फीसदी थे, जो 2015 में गिरकर 20 फीसदी हुए हैं। लेकिन इसी अवधि के दौरान वेस्टिंग (कद की तुलना में कम वजन) बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है। यह आंकड़े 14 फीसदी से बढ़ कर 22 फीसदी हुए हैं। एनएफएचएस 3 और 4, 2005-06 और 2015-16 के बीच 10 वर्षों में, उम्र के अनुसार कम वजन के बच्चों के अनुपात एक से अधिक प्रतिशत अंक कम नहीं हुआ है।

 

गोवा में स्टंड बच्चों की संख्या

Source: National Family Health Survey, 2015-16

 

हालांकि, पिछले एक दशक में, ग्रामीण गोवा में पांच साल से कम आयु के वेस्टेड बच्चों का प्रतिशत 17 से गिरकर 12 हुआ है। लेकिन शहरी गोवा में, वर्ष 2005 के बाद से ऐसे बच्चों का अनुपात दोगुना हुआ है। ग्रामीण उत्तरी गोवा की तुलना में शहरी दक्षिण गोवा में वेस्टेड बच्चों का प्रतिशत पांच गुना ज्यादा है।

 

पिछले दो एनएफएचएस सर्वेक्षणों के बीच  वेस्टिग बच्चों की संख्या में वृद्धि की प्रवृति पूरे देश में पाई गई है । हालांकि, इसी अवधि के दौरान गोवा में वेस्टेड बच्चों के प्रतिशत में वृद्धि रष्ट्रीय स्तर की तुलना में कम हुई है।

 

गोवा में वेस्टेड बच्चों की संख्या

Source:  National Family Health Survey, 2015-16

 

पिछले 10 वर्षों से 2015 तक, गोवा के कम वजन वाले बच्चों के प्रतिशत में एक प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है। हालांकि, इसके पीछे का कारण गोवा के वेस्टेड और स्टंड बच्चों के प्रतिशत में उतार-चढ़ाव का औसत प्रभाव हो सकता है लेकिन गोवा के कम शिशु मृत्यु दर, स्वच्छता सुविधाओं में सुधार के उच्च अनुपात (78 फीसदी) और 88 फीसदी टीकाकरण कवरेज को देखते हुए वेस्टेड बच्चों की संख्या में वृद्धि का कारण स्पष्ट नहीं है।

 

इस देश में पोषण हमेशा एक पहेली है…

 

क्या गोवा के पोषण संकेतक, गोवा में बढ़ते रुग्णता को प्रतिबिंबित कर सकता है? विकासशील देशों में, रुग्णता में वृद्धि का अनुभव करने के लिए देशों में कम आईएमआर की प्रवृति होती है, जैसे कि दस्त और मलेरिया जैसी बीमारियों से बच्चे बच जाते हैं लेकिन पोषण का स्तर निम्न रहता है।

 

हालांकि वर्ष  2005 के बाद से गोवा के आईएमआर में गिरावट सीमांत रहा है। 10 वर्षों में, शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों 15 से 13 हुआ है।

 

एक संबंधित मुद्दा बच्चों का एनीमिक होना है। गोवा में पांच वर्ष की आयु से कम करीब आधे बच्चों में खून की कमी है यानी एनीमिक हैं। हालांकि, मणिपुर को छोड़ कर सभी राज्य, जहां वेस्टिंग बच्चों की संख्या में गिरावट हुई है, वहां एनीमिक बच्चों का अनुपात गोवा के बराबर या ज्यादा है।

 

एक दूसरी व्याख्या संभवत: गोवा में माताओं की खराब स्वास्थ्य हो सकता है। हालांकि, संख्या एकदम विपरीत हैं। वर्ष 2005 से 2015 के बीच एनीमिक गर्भवती महिलाओं के अनुपात में 10 प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है। एनएफएचएस-4 के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में ये आंकड़े 32 फीसदी रहे हैं। हांलाकि, शहरी गोवा में वेस्टिंग के आंकड़े बद्तर रहे हैं । फिर भी एनीमिक गर्भवतती महिलाओं के मामले में ग्रमीण इलाकों से ज्यादा गिरावट शहरी क्षेत्रों में देखा गया है।

 

वर्ष 2005 के बाद से, ग्रामीण और शहरी गोवा में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) वाली महिलाओं के अनुपात में भी गिरावट पाई गई है।

इसी तरह गोवा में प्रसव पूर्व देखभाल (एएनसी) में भी है अंतर है।दक्षिण गोवा में पूर्ण एएनसी प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या उत्तरी गोवा की तुलना में आधे से भी कम है।
 

गोवा में प्रसव पूर्व पूर्ण देखभाल प्राप्त करने वाली महिलाएं

Source: National Family Health Survey, 2015-16

 

जीवन शैली बीमारियां या समृद्धि का बोझ

 

वर्ष 2015 में, भारत ने एक संयुक्त राष्ट्र समझौते पर हस्ताक्षर किया था। इस समझौते में 17 सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) निर्धारित किए गए थे। एसडीजी संकेतक के तहत हृदय रोग, कैंसर और मधुमेह जैसी जीवन शैली बीमारियों से होने वाली मृत्यु दर पर निगरानी करना है।

 

गोवा की समृद्धि बोझ बन रही है, ऐसा लोग इसके स्वास्थ्य को देखकर कह रहे हैं। दक्षिण गोवा में 33 फीसदी बच्चे वेस्टेड हैं, 25 किग्रा / एम 2 से अधिक बीएमआई के साथ दक्षिण गोवा में 33 फीसदी महिलाएं मोटापे की शिकार हैं। सामान्य बीएमआई 18.5 से 24.9 किग्रा / एम 2 के बीच होनी चाहिए। शहरी उत्तरी गोवा में मोटापे के शिकार पुरुषों और महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। पुरुषों और महिलाओं के लिए यह आंकड़े आबादी का 36 फीसदी और 39 फीसदी हैं। वर्ष 2005 से वर्ष 2015 के बीच, गोवा में मोटापे के शिकार पुरुषों की संख्या दोगुनी हुई है।

 

उच्च रक्त शर्करा या मधुमेह भी एक मुद्दा प्रतीत होता है। महिलाओं की तुलना में अधिक पुरुष इससे ग्रस्त होते हैं। ग्रामीण दक्षिण गोवा में 12.5 फीसदी पुरुषों में सामान्य से ज्यादा रक्त शर्करा स्तर पाया गया है। जबकि कुल मिलाकर, 7.3 फीसदी पुरुषों और 5.2 फीसदी महिलाओं में इस तरह  के रक्त शर्करा स्तर पाए गए हैं।

 

छह लेखों की श्रृंखला में से यह चौथा लेख है। इससे  पहले के लेख आप एक, दो और तीन आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

(कोलासो ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ के स्वास्थ्य पहल के साथ जुड़े शोधकर्ता हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 03 फरवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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