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पंजाब की खेतों की आग से दिल्ली की हवा होगी खराब

रोहिणी पांडे और अनीश सुगथन,

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चंडीगढ़ में फसल की भूसी जलाता एक किसान

 

सितंबर 2015 से, आग पर नियंत्रण न पा सकने के कारण इंडोनेशिया में एक पारिस्थितिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा बन गई है। हर शरद ऋतु में, ऐसी आग से इलाके में धुंध फैलती है। इस वर्ष भी यह केवल तीव्रता की दृष्टि से ही अलग है। चीन और अमरीका को पीछे छोड़ते हुए इंडोनेशिया का दुनिया की सबसे बड़ी कार्बन उत्सर्जन वाला देश के रुप में उपर आने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है।

 

उत्तर भारत, विशेष कर दिल्ली में भी वर्तमान में स्वास्थ्य आपदा बन गई है। पूरी दिल्ली में पूर्ण रुप से सर्दी पड़ते ही PM2.5 प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनिवार्य सुरक्षित स्तर से नियमित रुप से 20 गुना उपर हो जाएगा। अक्टूबर और नवंबर में, पंजाब एवं हरियाणा के किसान अपने खेतों को जला देते हैं क्योंकि फसल के बाद खेतों से खूंटी या अवशेष साफ करने का सबसे आसान और सस्ता तरीका है। 1980 के मध्य के बाद यंत्रीकृत कटाई के आने बाद से ही इस अभ्यास में लगातार वृद्धि हुई है।

 

पूरे इलाके में, विशेष कर दिल्ली में हवा के ज़रिए हर जगह यह धुआं फैलता है। कुछ हफ्ते पहले ही नासा ने इससे बनने वाले धुंए के उपग्रह चित्र जारी किया है।

 

हाल ही के एक लेख में, एविडेंस फॉर पॉलिसी डिज़ाइन के हमारे सहयोगी ने दिखाया है कि किस प्रकार  दिन-ब-दिन दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है एवं पैटर्न में गिरावट हो रही है। लेख में बताया गया है कि अक्टूर के महीने में ( जब किसान धान के खेतों को जलाते हैं ) दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है।

 

उच्च गुणवत्ता वाले उपग्रह चित्र से इसकी बारीकी से जांच की जा सकती है। नीचे दिखाए गए पहले फिगर-1 में उपर के दो पैनल में ,यह जांचने के लिए कि दिए गए सप्ताह में औसत प्रदूषण और दिल्ली ( टॉप पैनल ) एवं पंजाब ( मध्य पैनल ) के वार्षिक औसत प्रदूषण में कितना अंतर होता है, उपग्रह चित्रों का प्रयोग किया गया है।

 

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Figure 1: Punjab farm fires and percentage change in pollution from annual mean levels in Punjab and Delhi (based on data from 2003–2015)

 

फिगर के सबसे नीचले पैनल में नासा द्वारा जारी किए गए उपग्रह चित्रों का इस्तेमाल करते हुए पंजाब में फसलों की आग का मासिक वितरण बताया गया है। एक साल के दौरान, अक्टूबर के पहले सप्ताह से लेकर नवंबर के तीसरे सप्ताह तक कुल फसलों को जलाने के मामलों में से धान की खूंटी जलाने की हिस्सेदारी 40 फीसदी रही है। इसके साथ, वार्षिक औसत की तुलना में दिल्ली के प्रदूषण स्तर में करीब डेढ़ गुना वृद्धि हुई है एवं अक्टूबर के अंतिम दो सप्ताह में पंजाब में प्रदूषण स्तर दोगुना बढ़ा है। इसके विपरीत, गर्मियों में गेहूं की फसल के बाद जलाए गए खूंटी से कम प्रदूषण फैलता है। इसका एक कारण मानसून वर्षा एवं हवा से वायु का साफ हो जाना हो सकता है।

 

पिछले महीने, फसलों के जलाने की ओर नीति सक्रियता देखी गई है। 4 नवंबर को राष्ट्रीय सरकार न्यायधिकरण ने दिल्ली एवं आस-पास के इलाकों में फसलों के जलाने पर प्रतिबंद की घोषणा की है और इसका उल्लघंन करने पर जुर्माना लेने की घोषणा भी की गई है। लेकिन इन नीतियों का कार्यान्वन किस प्रकार करना है, इस संबंध में ध्यान नहीं दिया गया है। यह स्पष्ट है कि फसलों के जलने पर पूरी तरह से नज़र रख पाना किसी भी राज्य सरकार के लिए संभव नहीं है।

 

इसलिए हमें और अधिक सूक्ष्म नीतियों की आवश्यकता है। पहली बात, सरकार को आंकड़ों की बुनियादी ढ़ांचे में निवेश करना चाहिए ताकि प्रबंधकर्ताओं के लिए बेहतर जानकारी उपलब्ध हो सके। इस लेख में जिस तरह के उपग्रह आंकड़े इस्तेमाल किए गए हैं उससे हमें फसल जलाए जाने वाले एवं वैसे इलाके जहां सबसे अधिक फसल जलाए गए हैं, वह जानने में सहायता मिलेगी।

 

नीचे दिखाए गए फीगर -2 में भी, पंजाब में दोनों मौसम के दौरान फसलों को जलाने के मामले जानने के लिए उसी उपग्रह चित्र का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि यह अभ्यास पूरी तरह फैला हुआ एवं विकेन्द्रीकृत है लेकिन धान एवं गेहूं के खेतों में आग के वितरण में स्पष्ट भौगोलिक अंतर है।

 

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Figure 2: Autumn and spring farm fires in Punjab (based on data from 2003–2015)

 

60 फीसदी के अधिक धान के खेत में आग के मामले संगरुर, फिरोज़पुर, मोगा, लुधियाना एवं पटियाला, इन छह ज़िलों में ही हैं। इन छह ज़िलों में सबसे अधिक चावल उत्पादन होती है। इसके विपरीत गेहूं के खेत में आग के मामले एक समान वितरित हैं। इस संबंध में फिरोज़पुर एक अपवाद है जिसकी अकेले ही कुल गेहूं के खेतों में आग में एक-छठे भाग की हिस्सेदारी है।

 

क्षेत्रिय भिन्नता, उच्च घटना वाले ज़िलों में लक्षित हस्तक्षेप से उच्च प्रतिलाभ की ओर इशारा करती है। लेकिन इस हस्तक्षेप को असरदार बनाने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह ये स्वीकार करें एवं व्यक्तिगत प्रोत्साहन मिले। जबकि इस अभ्यास से होने वाले बाहरी असर का सामना किसी और को करने पड़ेगा, ऐसी सोच के साथ किसी के लिए इस अभ्यास को बंद करना मुश्किल है।

 

पंजाबी किसान को निश्चित तौर पर धुएं में हीं सांस लेना पड़ता है – लेकिन केवल कम समय के लिए और खेतों की सस्ती दामों में खेतों की सफाई के मुकाबले यह छोटी कीमत देना लोगों के लिए कुछ नहीं है। इनके इस अभ्यास से होने वाले नकारत्मक असर से दिल्ली एवं आस-पास के इलाकों के लाखों लोगों पर होता है जहां धुएं से होने वाले वायु प्रदूषण लोगों के लिए खतरनाक साबित हो रही हैं।

 

प्रबंधकर्ताओं को नीति बनाने एवं लागू करने की आवश्यकता है जिससे होने वाले नकारत्मक असर को कम किया जा सके। यदि जुर्माने का इस्तेमाल करें, अधिकारियों को उन्हें लागू करने के लिए आवश्यक संसाधनों का निवेश करने के लिए तैयार रहना होगा – जैसे कि उद्हारण के तौर पर उपग्रह चित्रण के साथ स्थानीय एजेंटों के साथ उन्हें बड़े अपराधियों को लक्षित करने की अनुमति देगा।

 

हमें यह भी पहचानने के आवश्यकता है कि यदि छोटे किसान द्वारा अधिक संख्या में छोटे खेतों पर आग लगाई जाए तो ऐसे में छोटे जुर्माने लगाना राजनीतिक रुप से अव्यवहार्य और प्रशासनिक रुप से लागू करना असंभव हो जाएगा।

 

ऐसी परिस्थिति में दिल्ली जैसे इलाकों में फसल के अवशेष जलाने से उच्च स्वास्थ्य लागत, लागत की कुछ कल्पना के लिए सरकार के लिए एक स्पष्ट आर्थिक मामला लागत बन जाता है – उद्हारण के लिए खेतों की सफाई के लिए क्लिनर तरीके के सब्सिडी से एवं कृषि अवशेष को ईंधन के रुप में लाभदायक बनाना। कुछ वास्तविक सबूत हैं जहां कुछ मामलों में ऐसी नीतियों ने काम किया है लेकिन हमें इससे अधिक की आवश्यकता है।

 

अंत: पंजाब के सभी किसान बराबर रुप से फसलों के जलाने पर निर्भर नहीं रहते हैं। मोगा, फिरोज़पुर और संगरुर के मुकाबले लुधियाने एवं पटियाला के किसान फसल जलाने पर कम निर्भर रहते हैं। क्या इस पर नीति बनाई जा सकती है? उद्हारण के लिए ज़िले के औसत फसल जलने के आंकड़े से कम होने पर उस ब्लॉक को पुरस्कृत करने जैसी सामाजिक प्रोत्साहन देने के साथ नीति निर्माता पायलट परियोजनाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।

 

आज की तारीख में दैनिक उपग्रह आंकड़ों के आगमन के साथ इन नीतियों के प्रभाव का मूल्यांकन करना एवं नज़र रखना संभव है। नीति डिजाइन की आवश्यकता की पहचान करने की जरूरत है जो सामाजिक लाभ के साथ किसानों का प्रोत्साहन संरेखित करे और तब इन नीतियों को लागू करने के लिए आवश्यक डेटा बुनियादी ढांचा बनाए।

 

( पांडे हार्वर्ड केनेडी स्कूल में एविडेंस फॉर पॉलिसी डिज़ाइन के सह-निर्देशक हैं। पांडे पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर भी हैं। सुगथन आईआईएम अहमदाबाद में व्यापार नीति के सहायक प्रोफेसर हैं एवं हार्वर्ड केनेडी स्कूल में स्थिरता विज्ञान कार्यक्रम में सहयोगी हैं। )

 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 24 नवंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 


 

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