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पेरिस जलवायु वार्ता : विश्व और भारत के लिए मुसीबत

जीबीएसएनपी वर्मा,

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विश्व ने दो-तिहाई तक अपना कार्बन स्पेस इस्तेमाल कर लिया है, 35 फीसदी जीवाश्म ईंधन के भंडार की खपत एवं और वैश्विक जंगलों का एक तिहाई हिस्सा काट दिया है।

 

यह कुछ मुद्दे हैं जिन पर पेरिस में 30 नवंबर और 11 दिसंबर 2015 के दौरान 190 देशों के जलवायु वार्ताकारों बीच चर्चा की जा रही है। कार्बन उत्सर्जन को सीमित करना पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

 

जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के पांचवें मूल्यांकन रिपोर्ट ( AR5 ) के अनुसार विश्व में 1,000 गीगा टन कार्बन डाइऑक्साइड ( GtCO2e ) है – जिसे कार्बन स्पेस कहा जाता है जो पूर्व औद्योगिक स्तर से वातावरण में 2 डिग्री सेल्सियस तक तापमान वृद्धि को सीमित करने के बराबर है।

 

विशेषज्ञों के मुताबि, इसके उपर तापमान में वृद्धि होना खतरनाक है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।

 

नागराज अदवे, भारत जलवायु न्याय के एक सदस्य के अनुसार, भारत को तीसरी दुनिया के देशों के साथ सहयोग करना चाहिए ( जो हमारे स्वाभाविक सहयोगी हैं ) और अमेरिका , यूरोपीय संघ और चीन को अपनी प्रतिबद्धताओं को बढ़ाने के प्रति दबाव बनाना चाहिए साथ ही सशर्त अपनी प्रतिबद्धताओं को बढ़ाने के लिए की पेशकश करनी चाहिए।

 

सागर धरा, हैदराबाद में स्थित एक पर्यावरण इंजीनियर और ऊर्जा विशेषज्ञ के अनुसार, “ जबकि वैश्विक नेता पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करने के लिए मिले हैं,  कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी-21) बचे हुए कार्बन स्पेस एवं किसे कितना स्पेस मिलता है, इस पर संकेन्द्रित है।”

 

यही सारी दुनिया में चिंता का कारण बना हुआ है।

 

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Source: IPCC’s Fifth Assessment Report

 

बढ़ता तापमान, परेशान लोग

 

धरा ने “कीप द क्लाइमेट, चेंज का इकोनोमी” में लिखा है कि 18वीं सदी के मध्य से औद्योगिक क्रांति के शुरु होने के बाद से, पारंपरिक जीवाश्म ईंधन भंडार के 1,700 GtCO2e का 35 फीसदी उपयोग करते हुए एवं वैश्विक जंगलों के 60 मिलियन वर्ग किमी का एक-तिहाई काटते हुए विश्व पहले से ही वातावरण से 2,000 GtCO2e बाहर निकाल चुका है।

 

परिणाम: औद्योगिक क्रांति के बाद से तापमान में 0.85 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि, जो पहले से ही बेतुकी मौसम , प्रजातियों प्रवास और विलुप्त होने, खाद्य और जल सुरक्षा और संघर्ष के संदर्भ में लोगों एवं पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो रहा है।

 

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Source: IPCC Working Group I

 

पेरिस सम्मेलन बेहद महत्वपूर्ण है जैसा कि तमाम देशों के वर्तमान दायित्वों 2020 में बंद हो जाएंगे। आगे के कार्य स्पष्ट हैं: खतरे को टालने के लिए भविष्य में उत्सर्जन पर एक समझौता कर हल निकालना है।

 

यहां मुख्य प्रश्न यह है कि किसे कितना हिस्सा मिलेगा एवं वित्तीय लागत कौन वहन करेगा।

 

दिसंबर 2014 में आयोजित सीओपी 20 के अंत में तमाम देशों ने जलवायु लड़ाई के लिए लीमा में उत्सर्जन लक्ष्य सहित जलवायु कार्रवाई की योजनाएं प्रस्तुत की थीं, जिसे इंटेंडेड नेश्नली डीटरमाइंड कॉंट्रीब्यूशन( INDCs ) के रूप में जाना जाता है।

 

इंडियास्पेंड ने उत्सर्जन के वादे के बारे में यहां लिखा है; अब तक किए गए वादे की प्रस्तुतियां आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

पेरिस सम्मेलन: क्यों होंगी प्रतिज्ञाएं थोड़ी और क्यों होगी देरी

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु सहयोग की शुरुआत 1997 में हुई थी।गरीब देशों को जलवायु संकट को अंत में छोड़ते हुए, इस संबंध में हुई प्रगति, समस्या के पैमाने के साथ परस्पर-विरोधी हैं।

 

1997 मे, क्योटो, जापान में हस्ताक्षर किए गए क्योटो प्रोटोकॉल के अनुसार 43 विकसित देशों के बीच ग्रीन हाउस गैसों ( जीएचजीएस ) पर लगाम लगाने पर समझौता किया गया – इसे अनुबंध 1 ( ए 1 ) पार्टीज़ कहा जाता है एवं इसमें तत्कालीन सोवियत संघ भी शामिल था – 2008 से 2012 के बीच, परिवहन उत्सर्जन को छोड़कर , 1990 के स्तर की तुलना में 32 GtCO2e एवं जीएसजीएस में 5 फीसदी की कटौती।

 

विकासशील देश दायित्वों से मुक्त थे। 1990-2012 के दौरान, क्योटो प्रोटोकॉल की अवधि में विकसित देशों ने उत्सर्जन में 16 फीसदी या 32 GtCO2e कटौती की है।

 

धरा ने इंडियास्पेंड से बातचीत के दौरान बताया कि कहानी में मोड़ यह है कि उत्सर्जन में कटौती अवास्तविक है। पहली बात यह कि उत्सर्जन पर हिसाब उन्हीं देशों से लिया जाता है जो उत्पादन करते हैं या सेवाएं देते हैं। बीते दो दशक में विकसित देश पूरी तरह से विकासशील देशों, खास तौर से भार एवं चीन, के उत्पादों और सेवऔं के उत्पादक बन गए हैं।

 

धरा बताते हैं कि, “इससे विकसित देशों को कम कीमत पर अपने उच्च खपत का स्तर बनाए रखने में मदद मिली है।” मतलब विकासशील देश उस गड़बड़ी की कीमत चुका रहे हैं जो उन्होंने की ही नहीं है।

 

इसके अलावा, कनाडा, जापान , ऑस्ट्रेलिया, पश्चिमी और पूर्वी यूरोप में आर्थिक गतिविधियों के लचीला होने से भी उत्सर्जन कटौती में योगदान रहा है।

 

धारा की गणना के अनुसार, विकसित देशों की शुद्ध व्यापार उत्सर्जन, क्योटो प्रोटोकॉल में घोषित लक्ष्य की तुलना में 40 फीसदी अधिक थे।

 

सबसे बुरे पर्यावरणीय दुर्दशा का अनुभव करने को तैयार भारत

 

धरा कहते हैं कि, “अब जब देश अपने उत्सर्जन हिस्सा शपथबद्ध कर दिया है, तो सारा मामला कार्बन स्पेस को भरने एवं किसके हिस्से कितना आता है, उसको लेकर ही है।”

 

धरा के गणना के अनुसार बचा हुआ कार्बन स्पेस शपथबद्ध द्वारा 2040 तक भर जाएगा और बिना शपथबद्धता के 2035 तक।

 

पहले की तरह ही वर्तमान वार्ता में विकासशील देश विकास स्पेस के लिए बात रखेंगे जबकि विकसित देश ” अनधिवासी अधिकार ” का दावा करेंगे।

 

धरा कहते हैं कि भारत और अन्य विकासशील देशों के मामले में यहां तक ​​कि इक्विटी के लिए मांग एक कमजोर तर्क है।

 

धरा आगे कहते हैं कि 1750 के बाद से विकसित देशों ने  ऐतिहासिक उत्सर्जन का 65 फीसदी के आसपास उत्सर्जित किया है और उनकी ऐतिहासिक उत्सर्जन प्रति व्यक्ति 1,200 टन है जोकि हरेक भारतीयों की तुलना में 40 गुना अधिक है।

 

धरा के मुताबिक यदि सम्पूर्ण कार्बन स्पेस भी तीसरी दुनिया के लोगों को दे दी जाए तो भी वे विकसित दुनिया के जैसा जीवन स्तर प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

 

वाक्लाव स्मिल,  कनाडा के मनीटोबा विश्वविद्यालय में विशिष्ट प्रोफेसर के अनुसार, हमें देखना चाहिए कि किस प्रकार चीन में तेजी से विनाशकारी आर्थिक विकास किया गया है।

 

इंडियास्पेंड के साथ एक ई -मेल साक्षात्कार में कहा स्मिल ने कहा कि “यदि यह माना जाए कि भारत का लक्ष्य हाल ही में हुए चीन के विकास राह पर चलना है तो इसका मतलब हुआ कि जीवमंडल के हर पहलू को प्रभावित करते हुए देश, इतिहास में सबसे भीषण पर्यावरण क्षरण का अनुभव करने के लिए तैयार है।”

 

धरा कहते हैं कि यह सब मिलकर भारत जैसे ही तीसरी दुनिया के देशों को एक साथ बांधते हैं।

 

वे कहते हैं कि “यदि सीओपी 21 में विकासशील देश, विकसित देशों के साथ स्वयं के उत्सर्जन में कटौती के मामले में अपनी बात रखने में सफल नही हुए तो वे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आसानी से शिकार बनेंगे क्योंकि आर्थिक और भौगोलिक रूप से यह सबसे कमज़ोर हैं। यदि विकासशील देश उत्सर्जन कटौती को स्वीकार करते हैं, तो उनका स्वंय का विकास प्रभावित होगा एवं विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच के अंतर में वृद्धि होगी।”

 

लेकिन एक सत्य यह भी है कि उत्सर्जन शपथबद्धता से भी अधिक फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन का मानना है कि कुछ नहीं से कुछ होना बेहतर है।

 

INDCs की कुल प्रभाव पर जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन से एक रिपोर्ट से पता चलता है कि इस सदी के अंत तक तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी, न की 2 डिग्री, जिसके परे होने से वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थिति भयावह हो सकती है।

 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के उत्सर्जन गैप रिपोर्ट 2010 एक सवाल खड़ा करती है – क्या कोपेनहेगन समझौते का वायदा 2 डिग्री या 1.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज करने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए पर्याप्त हैं ?

 

एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि , व्यवसाय के रूप में हमेशा की तरह अनुमानों के तहत , 12 GtCO2e के अंतराल को छोड़ते हुए वैश्विक उत्सर्जन में 2020 में 56 GtCO2e ( 54-60 GtCO2e की सीमा ) तक पहुंच सकता है।

 

धरा का कहना है कि 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ लाइन में रहने के लिए, 2020 तक उत्सर्जन चरम पर पहुंचना चाहिए एवं फिर गिरना चाहिए जो मौजूदा रुझान के साथ एक सुदूर संभावना प्रतीत होता है।

 

( वर्मा आंध्र प्रदेश स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वर्मा विज्ञान पर लिखते हैं एवं जलवायु विज्ञान , पर्यावरण और पारिस्थितिकी में इनकी विशेष रुची है। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 1 दिसंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 


 

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