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सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में बढ़ता भारी संकट

अमित भंडारी,

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इंडिया स्पेंड के द्वारा संकलित दिसंबर 2014 की तिमाही के वित्तीय परिणाम  , भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के  बिगड़ते संकट की ओर  इंगित करते हैं।

 

यह संकट जो कि  उन  क्षेत्रों से बढ़ते बकाया ऋणों के फलस्वरूप पैदा हुआ है जिनसे  भारतीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की अपेक्षा थी , केवल फिलहाल जारी आर्थिक संकट का सूचक ही नहीं है , अपितु एक चेतावनी है कि  पुनरुद्धार के साधन भी  क्षतिग्रस्त होते जा रहे हैं।

 

खराब ऋण, जिन्हें  अनर्जक परिसंपत्ति (एनपीए)  भी कहा जाता है ,  मार्च 2014 में पहले से ही उच्च स्तर पर था  , भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में  (नीचे दी गई तालिका देखें)इनमे पिछले नौ महीनों में 20% तक बढ़ोतरी आई है और यह  भारत के कुल वाणिज्यिक ऋण का  72%  भाग है ।

 

इंडिया स्पेंड ने पहले भी इस विषय पर प्रकाश डाला था और तब से अब स्टॉक यह समस्या और भी बिगड़ गई है।

 

सकल एनपीए, या ऋण जिनका लौटना संदिग्ध हो, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए कुल 2.73 लाख करोड़ रुपये ($ 44 बिलियन ) हैं।

 

यह तस्वीर और बुरी हो सकती थी यदि कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन (सीडीआर) की प्रक्रिया नहीं होती जिसके अंतर्गत आमतौर पर अस्थायी वित्तीय संकट में कंपनियों की मदद के लिए ब्याज दरों और पुनर्भुगतान की अवधि के साथ छेड़छाड़ की जाती है । सीडीआर के तहत दिया गया ऋण एनपीए के साथ शामिल नही किया जाता है।

 

सीडीआर के अंतर्गत दिए गए कुल ऋण का मूल्य दिसंबर में 2.72 लाख करोड़ रुपये ($ 43.9बिलियन ) था। सीडीआर के तहत अधिकांश बकाया ऋण, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से हैं।

 

एनपीए और सीडीआर दोनों की कुल मिला कर  राशि  5.45  लाख करोड़ रुपये ($ 87.9 बिलियन )है ।

 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए सितंबर में उनके  कुल बकाया ऋण का 5.33% था। एनपीए का मूल्य उसके बाद से और अधिक हो गया है, अतः यह अनुपात भी और खराब हो जाना चाहिए था।

 

सरकार का कहना है कि आधारिक संरचना (बिजली, दूरसंचार, हवाई अड्डों, सड़कों, बंदरगाहों और रेल सहित),   लौह एवं इस्पात, कपड़ा, खनन और वैमानिकी ने प्रभाविक उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए, मार्च 2013 – दिसम्बर 2014

(करोड़ रुपए)

 

Source: Bank financial statements, IndiaSpend research  

 

 सरकार के अनुसार ,एनपीए में वृद्धि के कारणों में से कुछ इस प्रकार हैं “पिछले कुछ समय के दौरान घरेलू विकास दर (इसी प्रकार से ) में सुस्ती, वैश्विक अर्थव्यवस्था के सुधार में मंदी, वैश्विक बाजार में अनिश्चितता,बाह्य कारकों में खनन परियोजनाओं पर प्रतिबंध, पर्यावरण संबंधी परमिट में देरी जिनसे बिजली, लौह एवं इस्पात क्षेत्र प्रभावित हुए,प्राप्तियों की वसूली में देरी और अच्छे समय के दौरान बैंकों द्वारा आक्रामक उधार देने की प्रवृत्ति “।

 

वर्तमान में पांच क्षेत्रों -अवसंरचना, लौह एवं इस्पात, बिजली, कपड़ा और निर्माण -में सीडीआर के तहत दिए गए सभी ऋणों का कुल 64% भाग के लिए ज़िम्मेदार हैं।

 

क्यों खराब ऋणों की बहुतायत (प्रचुरता) एक बुरा संकेत है

 

एनपीए का उच्च स्तर यह इंगित करता है कि भारत की अर्थव्यवस्था अच्छे हालात में नहीं है, और भारत की जीडीपी विकास दर में आए संशोधित उछाल को  सावधानी पूर्वक (संशय के साथ ) देखना चाहिए।   

 

सार्वजनिक क्षेत्र के   ऋणदाताओं की  कमजोर बैलेंस शीट यही दर्शाती है कि उनकी ऋण देने की  क्षमता कम हो रही है और यह राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक सुधारों  को भी प्रभावित करती है ।

 

26 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (राष्ट्रीयकृत बैंकों और भारतीय स्टेट बैंक समूह) ने अपनी  19 नवीनतम तिमाही में 5% या उससे अधिक का सकल एनपीए (नीचे दी गई तालिका देखें) दिखाया है ।

 

निजी क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए, मार्च 2013 – दिसम्बर 2014

(बकाया ऋण की %)

 

Source: Bank financial statements, IndiaSpend research

 

इसकी तुलना में निजी क्षेत्र के बैंकों ने जोखिम प्रबंधन के लिए बहुत अच्छा काम किया है : सितंबर में सभी निजी क्षेत्र के बैंकों की सकल सकल एनपीए  2.05% थी। दिसंबर तिमाही के लिए, छह सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंकों की एनपीए की रेंज  0.42 से लेकर 3.4% तक रही है। (नीचे दी गई तालिका देखें)।

 

निजी क्षेत्र ऋणदाता उन्ही आर्थिक कारकों के तहत उसी तरह  कार्य करते हैं जैसे की सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की तरह । उनके जोखिम प्रबंधन के तरीकों की नकल सरकारी बैंकों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

 

निजी क्षेत्र के बैंकोंका सकल एनपीए , मार्च 2013- दिसम्बर 2014

(बकाया ऋण का %)

 

Source: Bank financial statements, IndiaSpend research

 

ये खराब ऋण तीन स्तरों पर भारत की  वित्तीय हानि का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

सबसे पहले, खराब ऋण शेयरधारकों के लिए वित्तीय नुकसान के सूचक होते हैं; भारत सरकार इन सभी बैंकों में बहुमत शेयरधारक है, इसलिए, यह सभी नागरिकों के लिए एक तरह से अप्रत्यक्ष नुकसान है।

 

दूसरे , बैंक  इस तरह के व्यापार घाटों जैसे की इस तरह के एनपीए को अवशोषित करने के लिए पर्याप्त पूंजी बनाए रखते हैं । उच्च एनपीए के स्तर बैंकों की पूंजी खत्म कर देते हैं और उनकी अतिरिक्त ऋण देने की सीमा सीमितहो जाती है।

 

तीसरे , विकसित होने  के लिए, बैंकों को ताजा पूंजी जुटाने की जरूरत होती  है। एनपीए के उच्च स्तर का अर्थ है कमजोर मूल तत्त्व और शेयर बाजार में कमज़ोर   मूल्यांकन जिससे से उनकी विकास के लिए धन जुटाने की  क्षमता को चोट (नुक्सान पहुंचता ) पहुंचती है । और फिर से, इस कारण से भी उनके पास अतिरिक्त ऋण देने के लिए  अपर्याप्त पूंजी रहती है ।

 

यदि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की आसानी से उधार देने की क्षमता में कमी आती है तो बड़े मायनों में अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है , जो विकास को बढ़ावा देने के लिए निजी और सार्वजनिक खर्च के एक बड़े दौर के लिए कमर कस रही है।

 

वे देश जिन्होंने उधार ले कर और खर्च करते हुए कठिन समय से बाहर आने की कोशिश की है उनके यह महंगे प्रोत्साहन के प्रयास विफल रहे हैं, जैसा की अर्थशास्त्री रूचिर शर्मा ने अपनी इस चेतावनी से समझाने  की कोशिश की है।

 

“एक प्रोत्साहिक मानसिकता किसी सख़्त सुधार मानसिकता के विपरीत होती है, और सरकारें शायद ही कभी दोनों कर पाती हैं जैसा की 1990 के दशक के  विषम अनुभव में हमने देखा था ,” शर्मा लिखते हैं। “उस दशक के अंत तक, सबसे उभरते देशों के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं था, किसी ऋणदाता के पास वे नहीं  जा सकते थे । उन्हें मजबूरन दोषनिवृत्ति करनी पड़ी , खराब ऋण से मुक्ति और कंपनियों को और अधिक प्रतिस्पर्धी बंनाने के लिए ज़ोर लगाना पड़ा ।

 

(अमित भंडारी, एक मीडिया, अनुसंधान और वित्त पेशेवर हैं । उन्होंने आईआईटी-बीएचयू से बी-टेक और आईआईएम-अहमदाबाद से एमबीए किया है । आप amitbhandari1979@gmail.com पर उनसे सम्पर्क कर सकते हैं)

 
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